A Dark Secret344 / 536

A Dark Secret – Chapter 344

7 min read November 6, 2026

"मुझे नहीं पता।"

"तुम पूछती क्यों नहीं?"

"किससे?"

"मनोहर से।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वह मेरी तरफ़ देख रही थी, आँखों में वही चमक जो रामदीन की भी थी। मुझे लगा — वह परमात्मा मुझे रास्ता दिखा रही है, आख़िर क्या होगा… नहीं। वह मुझे रास्ता नहीं दिखा रही थी। वह मेरी तरफ़ देखकर यह देख रही थी कि मैं क्या करूँगी।

"घर चल," मैंने कहा।

घर पहुँचकर रिया सो गई। मैं रसोई में बैठी रही, गैस पर पानी रखा, जल गया तो उतार दिया। समझ ही नहीं आया कब रात हो गई। फिर दरवाज़े पर ठक-ठक हुई।

तीन दस्तक।

मैंने कुंडी नहीं खोली। "कौन?"

"मैं हूँ। मनोहर।"

"इतनी रात क्या काम है?"

"तुम्हारे पास मेरा पन्ना है?"

"रामदीन के पास है।"

"नहीं। अब जो पन्ना हुआ है, वह तुम्हारे पास है। और उसे मत पलटना। ख़ासकर रात के बारह बजे के बाद।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो पीछे है वह सामने आ जाएगा। और जो सामने आ जाता है, वह पूरा हो जाता है।"

मैंने कुंडी खोल दी। मनोहर बाहर खड़ा था, वही सफ़ेद शर्ट, वही सूखा चेहरा। हाथ में एक लिफ़ाफ़ा।

"यह क्या है?"

"तुम्हारा।" उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "अगर कल तक मेरा नाम आधा हो जाए, तो इसे रामदीन को देना।"

"तुम आधे कैसे होंगे?"

वह मुस्कुराया। पहली बार मुस्कुराया। "जो काम मैंने रिया के साथ किया, कभी तो उसका हिसाब देना पड़ेगा।"

वह मुड़ा और सीढ़ियों से उतरने लगा।

"मनोहर।"

वह रुका।

"तुमने मुझसे कहा था कि तुम सिर्फ़ काग़ज़ों के आदमी हो। तो तुम्हें कोई क्यों आधा करेगा?"

वह एक पल रुका। फिर बिना पलटे बोला, "क्योंकि मैंने एक बार किसी से वादा किया था जो मैं पूरा नहीं कर सका। और वादा पूरा न हो तो नाम पूरा कहाँ रहता है।"

वह उतर गया। मैंने दरवाज़ा बंद किया। कमरे में आई। रिया खिड़की के पास खड़ी थी, देख रही थी।

"उसे कुछ नहीं होगा, माँ," वह बोली।

"तुझे कैसे पता?"

"क्योंकि उसने जो लिफ़ाफ़ा दिया, वह मेरे नाम का नहीं है। हमारे घर के नाम का नहीं है। वह किसी ऐसे का नाम है जो अभी पूरा है — और जो पूरा है, उसे कोई आधा नहीं करता।"

मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। ऊपर कोई नाम नहीं था, सिर्फ़ एक तारीख़ — आज की। और नीचे कोने पर छोटे अक्षरों में — रखवाला।

रात ग्यारह बजकर पचास मिनट। मैं रसोई के दरवाज़े के पास बैठी थी, घड़ी देख रही थी। रिया के कमरे से बत्ती बुझी थी, पर नींद नहीं आई थी, मुझे पता था।

बारह बजे घड़ी की सुई हिली।

और तभी बिजली चली गई। पूरे मोहल्ले की।

अंधेरे में मैंने रिया की आवाज़ सुनी। "माँ।"

"हाँ, बेटा।"

"जो लिफ़ाफ़े में है, उसे निकालो।"

मैंने टेबल से लिफ़ाफ़ा उठाया। मशाल जलाकर देखा। अंदर एक चमकता पन्ना। बिना तारीख़, बिना नाम — सिर्फ़ एक लाइन आधी लिखी। और वह लाइन थी:

"आज रखवाला का नाम अधूरा रहा क्योंकि…"

पूरा नहीं। बस वहीं रुक गया। कलम के निशान के आगे एक बूँद काली स्याही सूख चुकी थी।

फिर बिजली आई। कमरा रोशनी से भर गया। और जैसे ही रोशनी आई, वह पन्ना मेरे हाथ में गरम हो गया — इतना गरम कि छोड़ दिया। वह फ़र्श पर गिरा।

रिया भागकर आई। उसने झुककर पन्ना उठाया। उसके हाथ पर वह निशान अब चमक रहा था — बहुत हल्का, बहुत धीमा, पर चमक रहा था।

"माँ," वह बोली, "एक नाम आधा है, और वह पूरा नहीं हुआ। इसका मतलब क्या है?"

मैंने उसके हाथ से पन्ना लिया। मैंने उसे उलटा करके देखा। पीछे कुछ नहीं था।

"इसका मतलब यह है," मैंने कहा, "कि आज रात किसी ने कुछ करने से मना कर दिया।"

"किसने?"

दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। इस बार एक ही।

॥

एक दस्तक। फिर कुछ नहीं। मैंने कुंडी की तरफ़ देखा, रिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। बाहर से कोई आवाज़ नहीं आई, न पैरों की, न साँस की। मैंने दरवाज़ा खोला तो सीढ़ियों पर कोई नहीं था, बस नीचे गली के मोड़ तक एक काग़ज़ पड़ा था जो हवा में हिल रहा था। मैंने उसे उठाया। उस पर सिर्फ़ एक तारीख़ लिखी थी और उसके नीचे एक लाइन — "तेरा नाम तेरे पास है, अभी।"

मैं सीढ़ियों से नीचे उतरी, गली में देखा। कोई नहीं। ऊपर आई और दरवाज़ा बंद कर दिया। रिया रसोई में खड़ी थी, हाथ में पानी का गिलास।

"कौन था?"

"कोई नहीं था।"

"तो दस्तक किसने दी?"

"यही तो सवाल है।"

मैंने घड़ी देखी। बारह बजकर बीस मिनट। आज पंद्रह है। पंद्रह पूरा नहीं हुआ, पंद्रह ख़त्म नहीं हुआ। मैंने रिया का हाथ उठाया। निशान अब भी हल्का चमक रहा था, पर पहले जैसा तेज़ नहीं।

"दर्द हो रहा है?"

"नहीं। बस गरम लग रहा है।"

"सो जा।"

"माँ।"

"सो जा, रिया। सुबह से पहले मुझे कुछ करना है।"

वह अपने कमरे में चली गई। मैंने पलंग पर बैठकर वह पन्ना दोबारा निकाला जो मनोहर के लिफ़ाफ़े में था — "आज रखवाला का नाम अधूरा रहा क्योंकि…" — और उसे उँगली से छुआ। ठंडा था, अब गरम नहीं। मैंने उसे वापस लिफ़ाफ़े में रखा और तकिये के नीचे रख दिया।

सुबह मैं उठी तो रिया के कमरे का दरवाज़ा खुला था। बिस्तर पर चादर पड़ी थी, पर वह वहाँ नहीं थी। मेरा कलेजा मुँह में आ गया। मैं दौड़कर नीचे गई, सीढ़ियों पर पैर फिसलने लगे। आँगन का दरवाज़ा खुला था।

वह आँगन में बैठी थी। पुराने चबूतरे पर, घुटनों पर एक कॉपी रखी थी और उस पर कुछ लिख रही थी। सुबह की धूप अभी पीली थी, उसके बालों में उतर रही थी। मैंने राहत की साँस ली, फिर गुस्सा आया।

"रिया।"

उसने सिर उठाया। "हाँ?"

"तू यहाँ क्या कर रही है? मैंने कितनी बार कहा है कि सुबह-सुबह अकेली आँगन में मत—"

"मैं अकेली नहीं हूँ।" उसने कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "देख।"

मैंने कॉपी छीन ली। पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में उसका नाम लिखा था, तीन बार, एक के नीचे एक। रिया जोशी। रिया जोशी। रिया जोशी।

"यह क्या है?"

"मेरा नाम।"

"मुझे दिख रहा है। क्यों लिखा है?"

"क्योंकि मुझे लगा कि मैं भूलने लगी हूँ।"

मेरा हाथ रुक गया। "क्या मतलब?"

"कल रात सपने में मैं अपना नाम भूल गई थी। उठी तो सिर्फ़ पहला अक्षर याद था — 'रि'। बस। मैंने सुबह उठकर कॉपी निकाली और तीन बार लिखा। अब याद है।"

मैं उसके सामने चबूतरे पर बैठ गई। कॉपी मेरे हाथ में थी, अक्षर साफ़ थे, पर जहाँ स्याही लगी थी वहाँ काग़ज़ थोड़ा गीला लग रहा था, जैसे अभी सूखा हो।

"रिया।" मेरी आवाज़ धीमी थी। "तू सिर्फ़ अपना नाम लिखती है। हर दिन। समझी?"

"रोज़?"

"रोज़ सुबह।"

"तीन बार?"

"तीन बार। और इससे ज़्यादा कुछ नहीं।"

वह हँसी। "तीन बार। मेरा ही नाम। कितना अजीब है न।"

"अजीब नहीं है। ज़रूरी है।"

"माँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू भी लिखती है?"

"क्या?"

"अपना नाम।"

मैंने कॉपी उसके हाथ में वापस रखी। मैंने कुछ नहीं कहा। मैं उठकर दीवार की तरफ़ मुड़ी और तभी मेरी आँख उस पर पड़ी।

आँगन की पीली दीवार पर, चबूतरे से ज़रा ऊँचाई पर, कुछ अक्षर उभर रहे थे। गीली स्याही जैसे अभी किसी ने ब्रश से खींची हो। सुबह की रोशनी में अक्षर चमक रहे थे, धीरे-धीरे गहरे हो रहे थे।

मैंने पास जाकर पढ़ा।

"मीरा जोशी, तीस साल। तारीख़ आज।"

मेरे हाथ से कॉपी छूट गई। मैंने उँगली दीवार पर लगाई। स्याही अभी गीली थी, उँगली पर लग गई — काली, थोड़ी मोटी, चिपचिपी। मैंने उसे रगड़ा तो और फैल गई।

"माँ?"

मैंने पलटकर देखा। रिया खड़ी थी, कॉपी हाथ में। उसकी नज़र दीवार पर थी।

"यह मेरी लिखाई नहीं है," उसने कहा।

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