A Dark Secret – Chapter 343
"चालीस साल पहले," रामदीन ने कहा। "जब मैं जवान था। और जब वह औरत ज़िंदा थी जो अब मकान नंबर पाँच में स्याही बनाती है।"
वह फिर बैठ गया। उसने पन्ना अपनी जेब में रख लिया।
"अरे —" मैंने कहा। "वह मेरा है।"
"मेरा नहीं है, तुम्हारा भी नहीं।" उसने अपनी जेब पर हाथ रखा। "यह उसका है जिसका नाम इसमें लिखा है। इससे पहले कि यह खुद चले, मुझे इसे उस औरत के पास ले जाना है।"
"कौन सी औरत?"
वह नहीं बोला। उसने आसमान की तरफ़ देखा।
"अब मैं और नहीं बोलूँगा," उसने कहा। "बोलने का जो पैमाना है, वह आज पूरा हो गया। मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा — तुम्हारी बेटी का नाम जो आधा है, उसे पूरा करने का रास्ता उस औरत के पास है जिसने इसे आधा छोड़ा।"
"और तुम मुझे उसका नाम नहीं बताओगे।"
"नाम बताना मेरा काम नहीं।" वह उठा। "मेरा काम है याद रखना। और मैं अब शुरू कर रहा हूँ।"
वह अस्पताल के अंदर चला गया।
रिया ने मेरा हाथ दबाया।
"माँ, वह क्यों ऐसा बोल रहे हैं?"
"पता नहीं।"
"वह डर रहे हैं।"
"हाँ।"
"किससे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "अपने नाम से।"
अब मुझे अपने घर जाना था। मैंने रिया को गाड़ी में बैठाया। रास्ते में वह खिड़की से बाहर देखती रही। फिर बोली, "माँ, एक बात।"
"हाँ?"
"मनोहर ने जो पन्ना दिया — उस पर पीछे कुछ था?"
"नहीं। मैंने उलटकर देखा था।"
"फिर भी देखो।"
मैंने गाड़ी सड़क किनारे रोकी। अपनी जेब टटोली। पन्ना वहाँ नहीं था — रामदीन ने ले लिया था।
"वह रामदीन के पास है," मैंने कहा।
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। "तो चलो वापस।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे लगता है कि वह पन्ना पीछे से खाली नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुझे कैसे पता?"
"पता नहीं। बस लगता है।" उसने अपनी उँगली दिखाई — उस पर वह निशान अब भी था, हल्का, पर था। "आज सुबह उठकर मैंने अपना नाम लिखा था रसोई की दीवार पर। मिट गया। फिर मैंने रामदीन चाचा के सामने लिखा। मिटा नहीं। वह बोले — जिसके हाथ में निशान हो, उसकी लिखाई अब स्याही में टिकती है।"
"तो?"
"तो अगर मैं उस पन्ने को हाथ लगाऊँ, तो शायद जो पीछे लिखा है, वह उभरे।"
मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी। "तू और तेरी बातें।"
वह हँसी। फिर खामोश हो गई।
अस्पताल के गेट पर हम पहुँचे। रामदीन बाहर नहीं था। हम अंदर गए। वह इमरजेंसी वार्ड में था — एक स्ट्रेचर के पास खड़ा, ट्रॉली में पड़ी पुरानी फाइलों को देख रहा था। उसके हाथ में पन्ना अभी था — उसने जेब से निकाला हुआ था या बाहर रखा था, यह पता नहीं चला।
"रामदीन।"
उसने सिर उठाया।
"रिया कह रही है — वह पन्ना पलटना है।"
"क्यों?"
रिया आगे आई। "क्योंकि मेरे हाथ पर निशान है।"
रामदीन ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला। वह पन्ना ट्रॉली पर रख दिया।
"तू मत छूना," उसने कहा। "अभी।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर पीछे कुछ लिखा है और वह उभरा, तो वह तेरे नाम के बारे में हो सकता है। और मैं नहीं चाहता कि तू अपने बारे में कुछ ऐसा जाने जो तुझे अभी नहीं जानना चाहिए।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है," वह बोली। "तुम देखो, चाचा।"
रामदीन ने पन्ना उठाया। उसे बल्ब के नीचे ले गया जो वार्ड के कोने में जल रहा था। उसने धीरे से पन्ना पलटा। ध्यान से देखा।
फिर वह रुक गया। उसका हाथ काँपा।
"क्या है?" मैंने पूछा।
वह नहीं बोला। मैं उसके पास गई। पन्ने की पीछे की तरफ़ देखी।
वहाँ एक लाइन थी। छोटी, महीन। और उस लाइन में एक तारीख़ लिखी थी।
आज की तारीख़।
"रामदीन," मैंने कहा, "यह वही दिन है जो रिया के नाम के आगे था?"
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"यह तारीख़ पंद्रह है," उसने कहा। "पर यह उसके नाम के आगे नहीं है। यह नीचे है। तारीख़ तो पंद्रह है, पर जो लिखा है वह —"
वह रुक गया। उसने पन्ना मेरी तरफ़ किया।
मैंने तारीख़ के नीचे देखा। एक शब्द था, बहुत छोटा, गोल अक्षरों में।
"रखवाला।"
मेरा हाथ काँपा।
"इसका मतलब?"
रामदीन ने पन्ना अपनी जेब में रखा। फिर उसने वही किया जो वह हमेशा करता था — आसमान की तरफ़ देखा।
"इसका मतलब यह है," उसने कहा, "कि आज रात तक वह नामा पूरा होगा। और मैं उसकी याद रखने वालों में नहीं होऊँगा। यह तुम्हारा काम है।"
मैंने पन्ना उसके हाथ से खींच लिया। "यह तुम्हारा काम कैसे हो सकता है? तुम तो खुद इसी में फँसे हो।"
उसने जेब से रुमाल निकाला और माथा पोंछा। वार्ड के अंदर से एक नर्स निकली, हमें देखकर कुछ नहीं बोली, आगे बढ़ गई। रामदीन ने मेरा हाथ पकड़ा और गलियारे के कोने में खींच लिया, जहाँ बेंच थी और ऊपर एक ट्यूबलाइट बार-बार झपक रही थी।
"सुन," उसने आवाज़ धीमी करके कहा, "जब मैं जवान था, मैंने एक बार किसी का नाम मिटाया था। किसी के कहने पर। उस आदमी ने कहा था — सिर्फ़ काग़ज़ से नाम हटाना है, बाकी कुछ नहीं। मैंने मान लिया। मैंने वह नाम मिटाया और दो महीने में उस घर का चूल्हा ठंडा पड़ गया।"
"तुमने मुझे यह कभी नहीं बताया।"
"क्योंकि यह बताने की चीज़ नहीं थी। यह वह काम था जो मैंने अपने हाथ से किया और अपने मन से भुला दिया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर आज जब मैंने वह पन्ना पलटा, तो मुझे अपना काम याद आ गया। यह वही लिखाई है, मीरा। यही हाथ। मेरे जैसे किसी ने, मेरी तरह, रिया का नाम आधा छोड़ा है।"
रिया बेंच पर बैठ गई थी। उसने अपनी उँगली देखी और बोली, "चाचा, जिसने मेरा नाम आधा छोड़ा — वह मुझे क्यों नहीं जानता?"
रामदीन उसके सामने बैठ गया। घुटनों पर हाथ रखे।
"वह तुझे जानता है। तभी तो आधा छोड़ा। पूरा मिटाने की हिम्मत नहीं हुई।"
"तो वह मुझे बचाना चाहता है?"
रामदीन ने कुछ सोचा। "नहीं। वह खुद बचना चाहता है। जिसका नाम पूरा होता है, उसे करना पड़ता है जो लिखा है। जिसका आधा है, वह टालता रहता है। जिसका मिट गया, वह ख़त्म।"
"तो मनोहर का नाम भी आधा है?" मैंने पूछा।
"मनोहर का नाम अभी पूरा है। उसे डर है कि अगली बारी उसकी है।"
मैंने उसके हाथ से पन्ना फिर लिया। इस बार मैंने उसे ध्यान से देखा। काग़ज़ पुराना था, किनारों से घिसा हुआ। ऊपर की तरफ़ रिया का नाम आधा — 'रि' साफ़, 'या' अधूरा, जैसे कोई लिखते-लिखते रुक गया हो। और नीचे आज की तारीख़, और उसके भी नीचे — रखवाला।
"रखवाला किसका नाम है?" रिया ने पूछा।
"अभी किसी का नहीं," रामदीन ने कहा। "कल हो सकता है।"
"कल?"
"जो आज रात मरता है, कल उसका नाम नए काग़ज़ पर लिखा जाएगा। रखवाला उसी को कहते हैं जो नामों को संभालता है। मरे हुओं का हिसाब रखता है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया। "तो आज रात कोई मरेगा?"
रामदीन ने पन्ना मेरे हाथ से वापस लिया और जेब में रखा। "नहीं। आज रात रखवाला नहीं मरेगा। आज रात रखवाला बनेगा।"
वार्ड के अंदर से पुकार हुई — किसी का नाम। रामदीन ने सिर घुमाया, फिर मेरी तरफ़। "तुम घर जाओ। रिया को लेकर। और आज रात कोई भी दरवाज़ा तीन बार से ज़्यादा मत खोलना, तीन बार से ज़्यादा किसी का नाम मत बोलना।"
"यह कैसी बात है?"
"बस करो।" वह अंदर चला गया। दो कदम जाकर रुका। "और मीरा — वह जो मनोहर ने कहा था, तारीख़ों से मतलब? वह झूठ था। उसे सिर्फ़ तारीखें नहीं पता। उसे सब पता है। वह तुमसे सिर्फ़ आधा सच बोला।"
मैंने रिया का हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ़ बढ़ी। गाड़ी में बैठकर मैंने इंजन चालू किया, पर गाड़ी वहीं खड़ी रही।
रिया बोली, "माँ, रखवाला बनने का मतलब क्या है?"
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