A Dark Secret342 / 536

A Dark Secret – Chapter 342

6 min read November 6, 2026

कब्रिस्तान के अंदर मैंने दस क़दम रखे होंगे कि जेब में फोन काँपा। रिया का नाम चमक रहा था।

"माँ, वह आ गया है।"

मैं रुकी। "कौन?"

"काली गाड़ी वाला। वह गाड़ी से उतरा और सीधा मेरी खिड़की के पास आया। कह रहा है — मैडम का संदेश है। तुम्हें कब्रिस्तान में नहीं, तुलसी चौक में मिलना है। अभी।"

"तूने दरवाज़ा खोला?"

"नहीं।"

"अच्छा किया। मैं आ रही हूँ।"

मैं लौटी। लोहे का दरवाज़ा पार किया, गाड़ी के पास पहुँची। भैरों वहीं खड़ा था, हाथ जेब में, चेहरे पर वही सपाटपन।

"मैडम कह रही हैं," उसने कहा, "कब्रिस्तान में जो मिलेगा, वह तुम्हारे काम का नहीं। तुलसी चौक जाओ। वहाँ कुछ साफ़ होगा।"

"कौन साफ़ करेगा? तू?"

वह हिला नहीं। "मैं सिर्फ़ पहुँचाता हूँ।"

"कब से?"

उसने पहली बार आँखें नीची कीं। फिर गाड़ी की तरफ़ चला और बैठ गया। लाइट जलाई, बुझाई, फिर जला दी।

मैंने रिया की खिड़की पर हाथ रखा। "तू अस्पताल चल। रामदीन के पास। मैं एक घंटे में आ जाऊँगी।"

"तुम अकेली जाओगी?"

"तुलसी चौक में है। खुली जगह है। दुकानें हैं।"

"रात को?"

"चाय के ठेले वाले रात को भी बैठते हैं।"

वह मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, "अगर तुम एक घंटे में न आईं, तो मैं तुम्हारा नाम तीन बार बोलूँगी।"

"अपनी आवाज़ में बोलना। जो पहले दिन स्कूल में रोई थी, वही आवाज़।"

उसने अपना होंठ काटा और सिर हिलाया। मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा, गाड़ी से हटी, और अपनी एम्बुलेंस में बैठ गई।

तुलसी चौक तक जाने में बारह मिनट लगे। बाज़ार सुनसान था — शटर गिरे हुए, बत्तियाँ बंद, बीच में पीपल का पेड़ जो हमेशा की तरह खड़ा था। पेड़ के नीचे एक चाय की दुकान थी जिसका एक ही बल्ब जल रहा था। बेंच पर कोई बैठा था।

मैंने गाड़ी रोकी। उतरी।

वह मनोहर था। फाइलें उसके पास नहीं थीं। एक अलग नज़ारा था — बिना फाइल के मनोहर। उसने हाथ में चाय का कुल्हड़ पकड़ा हुआ था और सामने की सड़क देख रहा था।

"बैठिए," उसने कहा। मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।

मैं बैठी नहीं। मैं उसके सामने खड़ी रही।

"अच्छा, खड़ी रहिए।" उसने चाय की चुस्की ली। "मैं आपको बुलाने के लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा, क्योंकि मैंने नहीं बुलाया। मैडम ने बुलाया था। वह अब बुलाना बंद कर रही हैं, इसलिए मैंने खुद बुला लिया।"

"क्यों?"

उसने कुल्हड़ बेंच पर रखा। फिर जेब से एक तह किया हुआ काग़ज़ निकाला। पीला, मुड़ा हुआ, किनारों से थोड़ा फटा।

"यह पन्ना मुझे कल रात मिला। मैडम की तिजोरी से नहीं, उनके ड्राइंग रूम की मेज़ से। जो काग़ज़ उनके हाथ से छूट जाता है, वह मेरे पास आ जाता है। यह मेरा काम है।"

"काग़ज़ जमा करना?"

"तारीख़ें जमा करना।" उसने पन्ना खोला। "नाम मेरा काम नहीं। नाम मैडम का काम है। मैं सिर्फ़ तारीख़ लिखता हूँ और देखता हूँ कि कौन सी तारीख़ किस नाम के आगे लगी है।"

उसने पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया।

मैंने देखा। एक लाइन थी, कोरे काग़ज़ के बीचोबीच। और उस लाइन में आधा नाम लिखा था।

रि.

सिर्फ़ "रि"। पहला अक्षर साफ़, गहरा। उसके आगे ज़रा सा निशान, जैसे किसी ने लिखना शुरू किया और कलम उठा ली।

मेरा हाथ काँपा। मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा।

"यह आपको कहाँ से मिला?"

"मैंने बताया।"

"काजल ने खुद लिखा?"

"मैडम नहीं लिखतीं। वह बोलती हैं, हम लिखते हैं। पर यह लिखाई उनकी नहीं है। यह किसी और की है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार सीधे। "और मैं इसे किसी और को नहीं दिखाने वाला था।"

"तो मुझे क्यों दिखा रहे हो?"

वह खामोश बैठा रहा। चाय ठंडी हो रही थी, उसने फिर भी नहीं पी।

"क्योंकि," उसने धीरे से कहा, "कल रात मैंने अपनी कॉपी खोली और मैंने अपना नाम खोजा।"

"मिला?"

"मिला। पर सिर्फ़ आधा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"पूरा नाम नहीं था," उसने कहा। "सिर्फ़ पहला हिस्सा। बाकी जगह खाली थी। जैसे किसी ने सोचा हो — इसे अभी रहने दो, बाद में देखेंगे।"

उसने कुल्हड़ उठाया, फिर रख दिया। "मैं तीस साल से काग़ज़ों में हूँ। मैंने सैकड़ों नाम लिखे हैं। किसी के लिए नहीं सोचा। पर कल रात सोचा — अगर मेरा नाम भी आधा है, तो कितने दिन बाकी हैं?"

"काजल से पूछ क्यों नहीं लेते?"

"मैडम वह नहीं बताएँगी जो उन्हें नुक़सान पहुँचाए। और सच यह है — वह खुद भी नहीं जानतीं। उनका नाम आख़िरी पन्ने पर है, वह पन्ना उनके पास नहीं है।"

मैंने काग़ज़ मोड़ा। अपनी जेब में रखा।

"मैं तुम पर भरोसा नहीं करती," मैंने कहा।

"मुझे भरोसे की ज़रूरत नहीं।" उसने अपनी चाय उठाई। "मुझे सिर्फ़ इतना चाहिए कि जब आप वह नाम पूरा करें, तो मेरा नाम भी अपने साथ ले जाएँ।"

वह उठा। बेंच पर पैसे रखे।

"अगर तुम्हारी बेटी का नाम पूरा हो गया," उसने कहा, "तो उसका क्या होगा — यह मैं नहीं जानता। पर मैं यह जानता हूँ — जिसका नाम आधा है, वह न पूरा ज़िंदा रहता है, न पूरा मरता है। वह बीच में अटका रहता है।"

वह चला गया। सड़क पर उसके जूतों की आवाज़ दूर तक गई, फिर ख़त्म हो गई।

मैं वहीं बैठ गई। चाय वाले ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। उसने एक कुल्हड़ भरकर रखा।

पीपल के पत्ते हवा से हिल रहे थे। मैंने काग़ज़ फिर खोला। "रि"।

उस पन्ने को मैंने उलटा। पीछे कुछ नहीं था। मैंने दोबारा पलटा। अब भी कुछ नहीं। मैंने काग़ज़ को बल्ब की रोशनी में ऊपर उठाया।

अचानक मनोहर की बात याद आई — "यह लिखाई किसी और की है।"

मैंने काग़ज़ को नीचे किया। उस पर "रि" के नीचे एक रेखा थी — वह मैंने पहले नहीं देखी थी। महीन, पेंसिल से।

मैं उठी। कुल्हड़ का पैसा रखा। गाड़ी में बैठी।

रास्ते में रिया का फोन आया — "माँ, तुम पहुँच गईं?"

"रास्ते में हूँ। तू कहाँ है?"

"अस्पताल। रामदीन चाचा के पास। वह बैठे हैं। बोल रहे हैं कुछ अपने आप से।"

"पहुँच रही हूँ।"

मैंने गाड़ी तेज़ की।

अस्पताल के बाहर बेंच पर रामदीन बैठा था। रिया उसके पास। मेरी गाड़ी देखकर रिया दौड़ी और आकर मुझसे लिपट गई।

"एक घंटा नहीं हुआ," उसने कहा। "पैंतालीस मिनट हुए हैं।"

मैंने उसका सिर सहलाया।

रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या मिला?"

मैंने पन्ना उसके सामने रखा। उसने देखा। बहुत देर तक देखा।

फिर उसने पन्ना उठाया, धीरे से पलटा, और बल्ब के नीचे किया।

"यह असली है," उसने कहा। आवाज़ भारी थी।

"मुझे पता है।"

"नहीं, तुम नहीं समझी।" उसने पन्ना मेरी तरफ़ घुमाया। "यह काग़ज़ उसी रजिस्टर का है। असली रजिस्टर का। देखो — किनारे पर जो पतली रेखा है, वह रजिस्टर की जिल्द की सिलाई है। इसे कोई फाड़कर नहीं लाया। यह अपने आप निकला है।"

मैंने पास जाकर देखा। हाँ। किनारे पर धागे के छोटे-छोटे निशान थे।

"मतलब?"

"मतलब यह कि रजिस्टर अब खुद पन्ने छोड़ रहा है। किसी ने नहीं निकाला। वह खुद दे रहा है।"

वह उठ खड़ा हुआ। बेंच से तीन क़दम आगे गया, फिर रुका।

"रामदीन," मैंने कहा, "यह सब क्या है?"

वह मुड़ा। उसने रिया की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"अब मैं तुमसे एक बात कहूँगा," उसने कहा। "और यह बात मैंने किसी से नहीं कही। काग़ज़ जब खुद पन्ने छोड़ने लगे, तो उसका मतलब यह है कि वह अपना हिसाब पूरा करना चाहता है।"

"कैसे?"

"जिसका नाम आधा है, उसे पूरा करने के लिए।" उसने फिर पन्ना उठाया। "यह पन्ना पहले पूरा था। मैं जानता हूँ। मैंने अपनी आँखों से देखा था।"

"कब?"

वह खामोश हो गया। बहुत देर तक। रिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

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