A Dark Secret341 / 536

A Dark Secret – Chapter 341

6 min read November 6, 2026

"मुझे पता है।" वह अपनी गाड़ी की तरफ़ चली। "इसलिए मैं तुम्हें रोक नहीं रही। जाओ, नाम बोलो। जो बचेगा, वह मेरा होगा। जो नहीं बचेगा —" वह रुकी, "— उसका रोना मेरे पैसे पर मत रोना।"

वह गाड़ी में बैठ गई। दरवाज़ा बंद हुआ। मनोहर ने तेज़ी से फाइल बगल में दबाई और पीछे बैठ गया। गाड़ी चली गई।

मैं चौक में अकेली खड़ी रही। पीपल के पत्ते हिल रहे थे।

एम्बुलेंस की तरफ़ लौटी। रिया ने खिड़की खोली।

"माँ?"

"चल घर।"

"क्या कहा उसने?"

"बहुत कुछ।" मैंने इंजन चालू किया। "पर एक बात कहने से रह गई।"

"क्या?"

"उसने यह नहीं कहा कि पंद्रह की सुबह कब्रिस्तान में क्या है।"

रिया चुप रही। मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। तुलसी चौक से निकलते वक़्त पीछे मुड़कर देखा। पीपल के नीचे कोई नहीं था। सिर्फ़ चबूतरे पर एक सूखा पत्ता गिरा था।

घर पहुँचकर मैंने रिया को खाना दिया। वह चुपचाप खा रही थी, बीच-बीच में मेरी तरफ़ देख रही थी। जब उसकी थाली खाली हुई, तब उसने कहा, "माँ, तुमने कहा था कि शालिनी का नाम सबसे पहले बोलेंगे।"

"हाँ।"

"तो बोलो ना। फिर से। ज़ोर से। मैं भी सुनूँ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुझे क्या लगता है, क्या होगा?"

"कुछ नहीं।" उसने कंधे उचकाए। "पर अगर कुछ होगा, तो मैं देखना चाहती हूँ।"

मैं उठी। आँगन में आई। रिया मेरे पीछे-पीछे आई।

मैंने तीन बार बोला — "शालिनी नायक। शांति विहार फेज़ दो, गली सात। आवाज़ — सवाल पूछते वक़्त थोड़ी ऊँची।"

तीसरी बार बोलते ही आँगन की दीवार पर कुछ उभरा। धूल में गीली स्याही जैसी लकीरें। रिया दौड़कर गई।

"माँ — यह शालिनी का नाम है।"

मैं पास गई। दीवार पर गीली स्याही से लिखा था — शालिनी नायक। नीचे तारीख़ नहीं, सिर्फ़ एक आधा शब्द — "ढूँ"।

"यह क्या है?" रिया ने पूछा।

"पता नहीं।" मैंने उँगली से छुआ। स्याही ठंडी थी, पर उँगली पर नहीं लगी। "कुछ अधूरा रह गया है।"

रिया ने मेरी तरफ़ देखा।

"माँ, कल पंद्रह है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"कल पंद्रह है," उसने अपने हाथ की उँगलियाँ गिनीं, "और उसने कहा था — पंद्रह की सुबह चार बजे, कब्रिस्तान का पश्चिमी दरवाज़ा।"

मैं दीवार के सामने खड़ी रही। दीवार पर शालिनी का नाम अब भी गीला था। बगल में आधा शब्द — "ढूँ"।

रिया ने धीमे से कहा, "वह हमें 'ढूँढ' रहा है, माँ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर दीवार। फिर आसमान। शाम हो रही थी। पंद्रह कल था — यानी रात बीतते ही।

मैंने रिया का हाथ पकड़ा और उसे अंदर ले गई। रास्ते में मेरी नज़र एम्बुलेंस के डैशबोर्ड पर पड़ी। पीली पुड़िया वहीं रखी थी — रामदीन वाली, जिस पर उसकी लिखाई में "मेरा नाम" लिखा था। मैंने उसे उठाया, जेब में रखा।

रिया ने देखा, पर कुछ नहीं बोली।

रात को मैंने उसे सोने को कहा। वह बिस्तर पर लेटी, पर आँखें खुली रखीं। मैं दरवाज़े के पास कुर्सी पर बैठी रही। नोटबुक खोली। पन्ने पर लिखा — "पंद्रह, सुबह चार बजे। कब्रिस्तान, पश्चिमी दरवाज़ा। अकेले।"

नीचे सवाल लिखे —

"कौन बुला रहा है?"

"वह औरत, या कोई और?"

"अकेले क्यों?"

"अगर मैं न गई, तो रिया का नाम उठेगा?"

"अगर रिया का नाम अधूरा है, तो उसे कैसे पूरा करें — या कैसे मिटाएँ?"

आख़िरी सवाल लिखते वक़्त मेरी पेंसिल रुक गई। मैंने उसे देखा। फिर समझ आया — अधूरा नाम न उठेगा, न रुकेगा। वह बीच में लटका रहेगा। रिया का सौदा न पूरा, न आधा।

मैंने नोटबुक बंद की। दीवार पर शालिनी का नाम अब भी मौजूद था। उसके नीचे वह आधा शब्द — "ढूँ"।

मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह सो गई थी, या सोने का नाटक कर रही थी। उसकी साँसें धीमी थीं। मैं उठी, उसके पास गई, उसके माथे पर हाथ रखा।

मेरी उँगली पर कोई स्याही नहीं थी। अच्छा था।

तीन बजे मैं उठी। रिया को देखा — वह करवट लेकर सो रही थी। मैंने जीन्स पहनी, जैकेट पहनी, जेब में नोटबुक, पेंसिल, रामदीन की पीली पुड़िया, और सुमित्रा की पर्ची रखी।

सीढ़ियों से नीचे उतरते वक़्त नीचे वाला बूढ़ा जोड़ा कहीं खाँस रहा था। मैं आँगन में आई। एम्बुलेंस की चाबी निकाली। इंजन चालू किया।

तभी आवाज़ आई — "माँ।"

मैं मुड़ी। रिया सीढ़ी पर खड़ी थी, चादर लिपटी हुई, आँखें आधी बंद।

"तू जाग रही है?"

"तुम्हारे बिना नहीं सोती।" वह उतरी। "मैं भी आ रही हूँ।"

"नहीं।"

"माँ —"

"रिया।" मैंने आवाज़ सख़्त की। "मैंने कहा था — अकेले।"

"उसने कहा था।" उसने मेरी आवाज़ की नक़ल की। "क्या तुम हर बात मानती हो जो पर्चियों पर लिखी हो?"

मैं उसके सामने खड़ी रही। अंधेरा बीच में था।

"अगर तू साथ चलेगी," मैंने कहा, "तो वह जो भी करेगा, मुझे तेरी फ़िक्र रहेगी। मैं ठीक से बात नहीं कर पाऊँगी।"

"मुझे गाड़ी में रखो।"

"वहाँ भी फ़िक्र रहेगी।"

"तो फिर मुझे इस कुर्सी पर बाँध दो।" उसने सीढ़ी की तरफ़ इशारा किया। "या पड़ोस की बुढ़िया के यहाँ छोड़ दो।"

मैं हँसी। बिना वजह। उसने देखा और मुस्कुराई।

"पाँच मिनट," मैंने कहा। "कपड़े पहन। पर एक बात — मैं कब्रिस्तान के अंदर जाऊँगी, तू बाहर रहेगी। दरवाज़े पर। गाड़ी में।"

"और अगर तुम न निकलीं?"

"तो तू गाड़ी लेकर सीधे अस्पताल जाएगी। यही शर्त है।"

वह चुपचाप अंदर गई। पाँच मिनट में लौटी — जीन्स, स्वेटर, जूते। बाल बाँधे हुए।

मैंने गाड़ी निकाली। सड़कें खाली थीं। शहर सो रहा था। पश्चिम की तरफ़ जाते वक़्त पुराना कब्रिस्तान दिखने लगा — चारदीवारी, ऊपर काँटेदार तार, और अंदर एक ट्यूबलाइट जो जल-बुझ रही थी।

मैंने गाड़ी दरवाज़े से थोड़ी दूर रोकी। इंजन बंद किया।

रिया ने खिड़की खोली। "माँ —"

"तू यहीं।"

"अगर तुम्हें कुछ हो —"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तो तेरे पास मेरा नाम है। वह बोलना। मैं सुन लूँगी।"

वह रुकी। फिर सिर हिलाया।

मैं उतरी। ठंडी हवा चल रही थी। कब्रिस्तान का पश्चिमी दरवाज़ा — लोहे का, जंग लगा, आधा खुला। अंदर अंधेरा था। ट्यूबलाइट चौकीदार के कमरे में जल रही थी, पर कमरा खाली था।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। रिया गाड़ी में बैठी थी, दोनों हाथ स्टेयरिंग पर। वह मेरी तरफ़ देख रही थी।

मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर कदम रखा।

तभी पीछे से आवाज़ आई — कोई गाड़ी आई और रुकी। मैं मुड़ी।

एक काली गाड़ी। दरवाज़ा खुला। भैरों उतरा। उसके हाथ में कुछ नहीं था। वह मेरे पास आया, तीन क़दम की दूरी पर रुका।

"मैडम यहाँ नहीं हैं," उसने कहा।

"तो कौन है?"

"वह है।" उसने कब्रिस्तान के अंदर इशारा किया। "वह बुला रही है। और उसने मुझे कहा कि तुम्हें अंदर जाने से पहले एक बात बता दूँ।"

"क्या?"

"जो नाम तुम बोलोगी, वह सिर्फ़ तुम्हारे हाथ से जाएगा नहीं — वह तुम्हारे अंदर से भी जाएगा। नाम बोलने वाले को अपना नाम भी याद रखना पड़ता है। वरना बोलते-बोलते वह खुद अपना नाम भूल जाएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू मुझे डरा रहा है?"

"नहीं।" उसकी आवाज़ में वह भारीपन था जो पहले नहीं था। "मैं बता रहा हूँ। मैंने खुद अपना नाम भूला था, एक बार। दो दिन लगे वापस पाने में।"

वह पीछे हटा। गाड़ी में बैठा। गाड़ी वहीं रुकी रही।

मैंने साँस ली। मैंने अपनी जेब से नोटबुक निकाली। पहले पन्ने पर अपना नाम लिखा — "मीरा जोशी। सरोज नगर, पुरानी कोठी, बाज़ार के पीछे। आवाज़ — जो ड्यूटी में सख़्त होती है और घर में धीमी।"

फिर नोटबुक जेब में रखी। और कब्रिस्तान के अंदर कदम रखा।

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