A Dark Secret – Chapter 340
"रजिस्टर, मीरा जी।" उसकी आवाज़ में वही मिठास थी जो काजल की बोली में होती है, पर पुरुष की आवाज़ में वह मिठास अजीब लगती है। "वह हमारे पास सुरक्षित है। और आपकी बेटी का नाम उसमें अभी पूरा नहीं हुआ है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब — अभी वह अधूरा है। रखवाले को भी नहीं पता क्यों।"
मैंने फोन कान से हटाया, फिर लगाया। "अगर नाम अधूरा है तो रखवाले को क्यों नहीं पता?"
"यही तो हम पूछना चाहते हैं।" उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ बदला, जैसे वह भी सोच रहा हो। "आप आ जाइए। बात कर लेंगे।"
"तुम बता दो, फोन पर।"
"नहीं। मैडम ने कहा है — आमने-सामने।"
वह रुका। फिर आख़िरी बात कही, धीमी आवाज़ में, जैसे किसी और के सुनने का डर हो।
"और हाँ, आपकी बेटी का नाम उसमें अभी पूरा नहीं हुआ है। रखवाले को भी नहीं पता क्यों।"
फोन कट गया।
मैंने स्क्रीन देखी। नंबर गायब हो चुका था।
रिया ने पूछा, "कौन था?"
"मनोहर।"
"वही जो काजल के साथ रहता है?"
"हाँ।" मैंने फोन जेब में रखा। "उसने तुलसी चौक पर बुलाया है।"
"तुम जाओगी?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका हाथ अब भी मेरी कमीज़ पर था, उँगलियाँ कसी हुई।
"मैं जाऊँगी," मैंने कहा, "पर अकेली नहीं।"
वह चौंकी। "मैं भी आऊँ?"
"तू साथ चलेगी। पर गाड़ी में बैठेगी। मैं जब तक न बुलाऊँ, नीचे नहीं उतरना।"
"क्यों?"
"क्योंकि वे अब तक मुझसे सिर्फ़ फोन पर बात कर रहे थे। अब सामने बात करेंगे। जब वे सामने आते हैं, तो कुछ माँगते हैं। और जो माँगते हैं, वह दिखाते नहीं — छिपाते हैं।"
"तो मैं तुम्हें अकेले क्यों जाने दूँ?"
"क्योंकि मैं तुझे छिपाने के लिए नहीं कह रही। मैं सिर्फ़ रिज़र्व रख रही हूँ।" मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "अगर मैं वापस न आऊँ, तो तू गाड़ी लेकर सीधे अस्पताल जाएगी। रामदीन के पास। बोलेगी — 'माँ ने भेजा है। तुलसी चौक।'"
"तुम वापस आओगी।"
"कोशिश करूँगी।"
"नहीं।" उसने मेरी कमीज़ छोड़ी और मेरे सामने खड़ी हो गई, हाथ कमर पर। "तुम वापस आओगी। कहो।"
मैं मुस्कुराई। "आऊँगी।"
वह गाड़ी में बैठ गई। मैंने इंजन चालू किया। शांति विहार की सड़क पकड़ी। एम्बुलेंस की छत पर लगी लाइट बंद थी — तुलसी चौक तक हम चुपचाप जा रहे थे।
रास्ते में रिया ने कहा, "माँ, उसने कहा कि रखवाले को भी नहीं पता।"
"हाँ।"
"तो रखवाले को कैसे पता नहीं?"
"यही तो मैं भी सोच रही हूँ।" मैंने स्टेयरिंग पर हाथ कसा। "हो सकता है रखवाला जानती हो और बता न रही हो।"
"या हो सकता है रजिस्टर उसके पास न हो।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्या कहा?"
"भैरों ने कहा था न — रजिस्टर उस औरत के पास है। अगर उस औरत के पास है, तो काजल मैडम के पास क्या है?"
मैं चुप हो गई। बारह साल की बच्ची वही पूछ रही थी जो मैं तीन दिन से पूछने की हिम्मत नहीं कर रही थी।
अस्पताल के मोड़ पर मैंने गाड़ी ली। दस मिनट में तुलसी चौक आ गया। यह पुराने बाज़ार का बीच का चौक था — चारों तरफ़ पुरानी दुकानें, बीच में पीपल का पेड़ और उसके नीचे पत्थर की गोल परिक्रमा। शाम को यहाँ पाँच बजे से चहल-पहल शुरू हो जाती थी, पर अभी सुबह के ग्यारह बजे थे। सिर्फ़ दो चाय के ठेले, एक फड़ पहनने वाला, और एक बंद दुकान के सामने खड़ी काली गाड़ी।
मैंने एम्बुलेंस पीपल के पेड़ के नीचे खड़ी की। रिया को खिड़की बंद करके बैठने को कहा। वह मान गई, पर मुँह बनाकर।
मैं उतरी। चौक के बीच चली। काली गाड़ी का दरवाज़ा खुला और मनोहर निकला — पचास के करीब, पतला, हाथ में हमेशा की तरह फाइलें। वह मेरे पास आया, फाइल बगल में दबाई, सिर हल्का झुकाया।
"आइए, मीरा जी। मैडम इंतज़ार कर रही हैं।"
"कहाँ?"
"पेड़ के उस पार।"
मैंने देखा। पीपल के तने के दूसरी तरफ़ एक चबूतरा था। उस पर काजल हरनाम बैठी थी — आज साड़ी नहीं, सलवार-कमीज़, बाल बाँधे, कोई पाउडर नहीं। पहली बार वह मुझे उस रूप में दिखी जिसमें वह शहर की सबसे बड़ी बिल्डर नहीं, बस एक थकी औरत लग रही थी।
मैं उसके सामने जाकर खड़ी हुई। वह उठी नहीं। बस हाथ से बगल में बैठने का इशारा किया।
मैं नहीं बैठी।
"मनोहर ने फोन पर कहा कि रजिस्टर आपके पास है।"
"है तो।" उसने अपने हाथ की तरफ़ देखा, जैसे उनमें कुछ हो। "पर पूरा नहीं।"
"क्या मतलब?"
"मतलब — जो रजिस्टर मेरे पास है, वह आख़िरी बार खुला तब आधा खुला था।" उसने आँख उठाई। "आधे पन्ने खाली हैं। जो नाम उठे थे, वे लौट नहीं रहे। बल्कि जा रहे हैं।"
मैंने मनोहर की तरफ़ देखा। वह पीछे खड़ा था, फाइल से चेहरा छिपाए हुए।
"यह स्याही का काम है," मैंने कहा। "जो स्याही बनाती थी, उसने बनाना बंद कर दिया है।"
काजल की आँखों में कुछ चमका। "तुम उससे मिली?"
"मिली।"
"और उसने क्या कहा?"
"आप बताइए, वह कौन है?"
काजल ने अपने हाथ अपनी गोद में रखे। "मुझे भी नहीं पता उसका पूरा नाम। वह हमारे परिवार में चार पीढ़ी से है। मेरे दादा की माँ उससे छोटी थी। वह स्याही बनाती है — गीली, काली, जो काग़ज़ पर नहीं सूखती। जब तक बोली न जाए, नहीं सूखती।"
"और अब उसने बनाना बंद कर दिया," मैंने कहा। "तो रजिस्टर सूख रहा है। नाम सूख रहे हैं। आप यही कह रही हैं ना?"
वह चुप रही। फिर बोली, "मेरे दादा ने उससे वादा किया था कि उसका नाम रजिस्टर में नहीं लिखा जाएगा, इसलिए वह कभी नहीं मिटेगी। पर अब लगता है वह वादे से आगे जा रही है।"
"क्यों?"
"क्योंकि वह अपनी जगह कोई और चाहती है।" काजल ने मेरी तरफ़ सीधा देखा। "वह चाहती है कि तुम्हारी बेटी रखवाला बने।"
मेरा हाथ मुट्ठी में बंद हो गया। "मैंने सुना था।"
"पर तुमने यह नहीं सुना —" काजल उठी। वह मेरे करीब आई, आवाज़ धीमी की। "कि रिया का नाम अधूरा हो गया है क्योंकि उसने खुद रिया का नाम लिखते वक़्त आधा छोड़ दिया। आधा नाम ही अक्षर है — 'रि'। बाक़ी नहीं।"
मैं सन्न रह गई।
"उसने ऐसा क्यों किया?"
"क्योंकि अगर नाम पूरा हो गया, तो रिया उस सौदे से बंध जाएगी और कभी बाहर नहीं जा सकेगी। इसलिए उसने आधा लिखा, ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी माँ ने तुम्हारा नाम लिखवाया था पर तारीख़ नहीं लिखी थी। दोनों ने एक ही तरीक़ा अपनाया — आधा नाम, आधी आज़ादी।"
"तो फिर वह रिया को रखवाला क्यों बनाना चाहती है?"
काजल ने कंधे उचकाए। "क्योंकि आधे नाम वाला रखवाला ही पूरा नहीं होता। वह रखवाली करेगी, पर बँधेगी नहीं। यह उसकी चाल है।"
मनोहर ने पीछे से कहा, "मैडम, समय।"
काजल ने उसे हाथ से रोका। "एक बात और। मेरा नाम भी आख़िरी पन्ने पर है। मैं जानती हूँ। पर अब वह पन्ना मेरे रजिस्टर में नहीं है। वह उस औरत के पास है।"
"तो आप भी बँधी हुई हैं।"
"सब बँधे हुए हैं।" वह हल्के से हँसी, एक छोटी, दबी हुई हँसी। "मैं शहर की सबसे बड़ी बिल्डर हूँ। मेरे पास पैसा है, गाड़ियाँ हैं, वकील हैं। और मैं एक बूढ़ी औरत के डर से सुबह यहाँ पेड़ के नीचे बैठी हूँ।"
"तो उससे लड़िए।"
"कैसे?"
"वह जो चाहती है — रिया को रखवाला — वह मत होने दीजिए। मेरे साथ आ जाइए। सबके नाम बोलिए। आपके भी, दादा के भी, उस बूढ़ी औरत के भी।"
काजल मेरी तरफ़ देखती रही। उसके चेहरे पर कुछ बदला — एक पल के लिए लगा कि वह मान जाएगी। फिर हवा बदली। वह पीछे हटी और मुस्कुराई। वही मिठास वाली मुस्कान जो उसके होठों पर आते ही आँखों तक नहीं पहुँचती।
"तुम अच्छी औरत हो, मीरा। पर मैं अपना कारोबार नहीं छोड़ सकती।"
"आपका कारोबार किसी के नाम पर चल रहा है।"
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