A Dark Secret – Chapter 339
“कहाँ गई?”
“पता नहीं।” उसने फाइल मेरी तरफ़ बढ़ाई। “पर उसने यह दी। और एक बात कही।”
“क्या?”
“कहा — ‘अब मीरा को बोलना पड़ेगा। वरना रिया का नाम पंद्रह को उठेगा, और यह बार नहीं टलेगा।’”
मैंने एम्बुलेंस की तरफ़ देखा। रिया खिड़की से बाहर झाँक रही थी, आँखें बड़ी।
मैंने भैरों की तरफ़ देखा।
“तू किसकी तरफ़ है, भैरों?”
वह रुका। उसने फाइल ज़मीन पर रख दी। फिर कहा, “इस शहर की तरफ़। और शहर अभी कुछ नहीं बोल रहा।”
वह अपनी गाड़ी की तरफ़ मुड़ा, दरवाज़ा खोला, बैठा। इंजन चला और गाड़ी अँधेरे में घुल गई।
मैं एम्बुलेंस के पास गई। रिया ने खिड़की खोली।
“माँ, वह नीचे कौन थी?”
“पता नहीं।” मैंने उसकी तरफ़ देखा। “पर अब पता करना पड़ेगा।”
“कैसे?”
मैंने जेब से वह पर्ची निकाली जो डस्टबिन से मिली थी — भैरों वाली। फिर भैरों की पीली फाइल खोली। उसके अंदर उसी लिखाई में एक नई लाइन जुड़ी थी, गीली स्याही में — “पंद्रह की सुबह चार बजे। कब्रिस्तान का पश्चिमी दरवाज़ा। अकेले आ।”
मैंने फाइल बंद की।
“अब घर चल,” मैंने कहा। “और आज रात तुझे कुछ याद रखना है।”
“क्या?”
“वह सब जो तूने आज देखा। हर चेहरा, हर नाम, हर आवाज़।” मैंने गाड़ी का इंजन चालू किया। “क्योंकि कल से हमें शहर के हर नाम को उसकी आवाज़ के साथ जोड़ना है।”
रिया ने मेरी तरफ़ देखा।
“और शालिनी?”
मैंने कुछ देर सोचा।
“उसका नाम सबसे पहले बोलेंगे,” मैंने कहा। “पर पहले मुझे वह औरत ढूँढनी है जिसका चेहरा तस्वीर में नहीं है।”
रिया ने खिड़की बंद कर ली। मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। पीछे हवेली की ट्यूबलाइट अब भी जल-बुझ रही थी, और उसके नीचे गली की दीवार पर कुछ लिखा दिख रहा था जो सुबह नहीं था। मैंने गाड़ी रोकी नहीं। देखा ज़रूर — दीवार पर गीली स्याही से सिर्फ़ तीन शब्द थे।
“तेरा नाम। तेरा।”
॥
मैंने दीवार पर लिखे तीन शब्द पढ़े और गाड़ी आगे बढ़ा दी। रिया पीछे बैठी थी, उसने भी देख लिया था। पर उसने कुछ नहीं पूछा। बस खिड़की से आँखें हटा लीं और सीट पर सिर टिका दिया।
घर पहुँचकर मैंने गाड़ी आँगन में खड़ी की। रिया सीधे ऊपर चली गई। मैं नीचे रुकी, पुरानी कोठी की सीढ़ियों पर बैठी और नोटबुक निकाली। उसमें उस दिन के नाम लिखे। शालिनी। रीना नायक। सुमित्रा। और एक खाली जगह छोड़ दी उस औरत के लिए जिसका चेहरा तस्वीर में मिटा हुआ था।
सुबह मैंने रिया को उठाया। वह स्कूल नहीं जाने वाली थी, पर मैं उसे अकेले घर भी नहीं छोड़ना चाहती थी। साथ ले गई। रास्ते में वह चुप रही। शांति विहार फेज़ दो के मोड़ पर उसने पहली बार मुँह खोला।
"माँ, उस घर का ताला क्यों नहीं तोड़ते?"
"क्योंकि ताला तोड़ने वाले हम नहीं हैं। जिसने ताला लगाया है, वही खोलेगा।"
"और अगर न खोले?"
"तो हम दरवाज़े के बाहर से बोलेंगे।"
वह मेरी तरफ़ मुड़ी। "बाहर से कौन सुनता है?"
"वही सुनता है जो नाम में रहता है।"
गली सात में उस घर के सामने मैंने गाड़ी रोकी। दरवाज़े पर वही नया ताला था। तीन दिन पहले लगा था। मैंने घंटी बजाई। कोई नहीं आया। मैंने दोबारा बजाई। अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आई — धीमी, झुकी हुई, जैसे कोई बूढ़ा कदम घसीट रहा हो।
दरवाज़ा खुला। वही बूढ़ा आदमी था, पैंतालीस साल से उसी गली में रहने वाला। सफ़ेद बाल, पीली आँखें, हाथ में चाय का कप।
"आप फिर आ गईं," उसने कहा।
"आपने कल कुछ बताया था। अधूरा छोड़ दिया।"
"मैंने कुछ नहीं बताया।"
"आपने कहा था कि उस घर से निकला आदमी नाम साथ ले गया। मुझे और बताइए।"
वह मुँह फेरकर अंदर जाने लगा।
"रुकिए।" मेरी आवाज़ तेज़ हुई। "उस घर में एक औरत रहती थी। रीना नायक। उसकी बेटी मेरी बेटी की दोस्त है। दो महीने पहले वह गायब हो गई। आपने उसे देखा था?"
"मैंने कुछ नहीं देखा।"
"आप झूठ बोल रहे हैं।"
वह रुका। कप उसके हाथ में काँप रहा था। उसने धीमे से कहा, "मैंने उसे देखा था। आख़िरी बार। वह दरवाज़े पर खड़ी थी और उसके हाथ में लाल चुनरी थी — नहीं, काग़ज़ था। कोई काग़ज़। वह उससे चिपकी हुई थी जैसे डर से। मैंने पूछा तो वह बोली — 'अंकल, अगर मेरा नाम मिट जाए, तो शालिनी से कह दीजिएगा मैं उसे भूली नहीं हूँ।' मुझे उसकी बात समझ नहीं आई। अगले दिन घर खाली था।"
मेरा हाथ दरवाज़े की सीमेंट पर टिका था। "और उस घर से निकलने वाला आदमी? वह कैसा दिखता था?"
"बड़ा। मोटा। कोई बात नहीं करता। मैंने उससे पूछा भी था — 'भाई, यह घर बंद क्यों है?' — तो उसने मेरी तरफ़ देखा और मैं अपनी ही गली का नाम भूल गया। बस। पाँच सेकंड। फिर वह गया और मुझे सब याद आ गया। पर अब मैं उस दरवाज़े के सामने खड़ा नहीं होता।"
"क्यों?"
"क्योंकि हर बार खड़े होने पर लगता है कि मैं भी कुछ भूल रहा हूँ।"
वह पीछे हटा और दरवाज़ा बंद कर दिया। मैंने ताला देखा। नया था, चमकदार। मेरे अंदर कुछ उबला। मैंने जेब से नोटबुक निकाली, फिर वापस रखी। टूटा ताला? ईंट से तोड़ दूँ? कुंडी उखाड़ दूँ?
"माँ।"
रिया ने मेरा हाथ पकड़ा।
"क्या?"
"मत करो।"
"ताला टूटा तो सिर्फ़ दरवाज़ा टूटेगा।"
"नहीं।" उसने मेरे हाथ पर अपनी उँगली रखी। "अगर हम ताला तोड़ेंगे तो हम भी वही हो जाएँगे जो उनके घर खोलते हैं। फिर तुम किसी को क्या कहोगी?"
मैं रुक गई। उसकी बात सही थी। मेरे पास हरनाम परिवार को दोष देने का हक़ सिर्फ़ तभी तक था जब तक मेरे हाथ साफ़ थे।
मैं वहीं दरवाज़े के सामने सीढ़ी पर बैठ गई। नोटबुक खोली। उसमें शालिनी अधूरी थी — सिर्फ़ नाम और गली, आवाज़ नहीं।
सुमित्रा की बात याद आई — "नाम लिखने से पहले तीन बार बोलना पड़ता है। अपने लिए, उसके लिए, और शहर के लिए।"
मैं उठी। गली के बीच में खड़ी हो गई। रिया मेरे पीछे रही, पीछे हटकर दीवार के पास।
मैंने साँस ली और ज़ोर से बोला, "शालिनी नायक।"
आवाज़ गली में गूँजी। मुँह से निकलते ही हवा भारी हुई।
दूसरी बार — "शालिनी नायक।"
अब सामने का दरवाज़ा हिला। धीमे से।
तीसरी बार — "शालिनी नायक। शांति विहार फेज़ दो, गली सात। आवाज़ — वह जो सवाल पूछते वक़्त थोड़ी ऊँची हो जाती है।"
गली के दोनों तरफ़ खिड़कियाँ खुलीं। कोई बूढ़ी औरत सिर निकालकर देखने लगी। एक आदमी ने बालकनी से झाँका। मैंने उनकी तरफ़ देखा भी नहीं।
तभी — ताले में आवाज़ आई।
किसी ने अंदर से चाबी घुमाई। एक बार। फिर रुक गई। फिर घुमाई। ताला हिला, चटकी की आवाज़ आई — पर खुला नहीं।
रिया मेरे पीछे आ गई और मेरी कमर से चिपक गई। मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"माँ," उसने फुसफुसाया।
"रुक।"
ताला फिर हिला। फिर रुका। जैसे अंदर कोई है, पर खोल नहीं पा रहा — या खोलना नहीं चाहता।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। "शालिनी!" आवाज़ अब भीतर तक गई। "अंदर कोई है?"
कोई जवाब नहीं। पर ताले की आवाज़ बंद हो गई। जैसे किसी ने चाबी छोड़ दी हो।
मेरी जेब में फोन बजा।
मैंने निकाला। स्क्रीन पर नाम नहीं, सिर्फ़ नंबर। मैंने उठाया।
"मीरा जी?"
आवाज़ चिकनी थी। जानी-पहचानी। मनोहर। काजल हरनाम का मुंशी।
"क्या चाहिए, मनोहर?"
"मैडम ने आपको बुलाया है। तुलसी चौक। एक घंटे बाद। सिर्फ़ आप।"
"मैं नहीं आ रही।"
"तो क्या आपकी बेटी का नाम अधूरा रहने देंगे?"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह मेरी कमीज़ का कोना पकड़े हुए थी, आँखें बड़ी।
"क्या कहा तुमने?"
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