A Dark Secret – Chapter 338
रिया ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
“मैं नहीं बनूँगी,” वह बोली।
“नहीं बनेगी,” मैंने कहा।
“सब ऐसा ही कहते हैं,” रामदीन ने कहा। “फिर रजिस्टर खुलता है, और आदमी अपने आप इश्तिहार छापने लगता है।”
शाम पाँच बजे मैं अस्पताल के बाहर वाली बेंच पर बैठी थी। रामदीन के हाथ में अब रिया का हाथ था — वह उससे नाम याद रखने की कला सिखा रहा था। “तीन बार बोल, फिर लिख,” वह कह रहा था। “अपने लिए, उसके लिए, और शहर के लिए। देख — तेरी माँ इसी तरह करती है।”
रिया उसे ध्यान से देख रही थी, और मैंने पहली बार देखा कि वह किस तरह रामदीन के पास बैठी थी — बिल्कुल पास, जैसे बच्चा ढूँढती है रात में किसी का साया।
मुझे याद आया — भैरों का संदेश था, शाम सात बजे हवेली में। पर आज मैं वहाँ नहीं जाने वाली थी। मुझे पहले कुछ और देखना था।
मैं उठी और एम्बुलेंस की तरफ़ चली।
“कहाँ जा रही है?” रामदीन ने पूछा।
“एक काम है।”
“कौन सा?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “वह काग़ज़ जो मुझे डस्टबिन से मिला — उस पर भैरों का नाम लिखा था। पर भैरों खुद मुझे फाइल देकर गया था। दोनों बातें मेल नहीं खातीं।”
“तो?”
“तो मैं पहले यह देखूँगी कि भैरों किसकी फाइल पकड़कर चलता है। काजल की या किसी और की।”
रामदीन ने मेरी कलाई पकड़ी। “अकेले नहीं।”
“मैं अकेली नहीं हूँ।” मैंने रिया की तरफ़ इशारा किया। “वह मेरे साथ है।”
रामदीन हँसा। पहली बार।
“तेरी बेटी तेरे जैसी है,” उसने कहा। “मगर ज़्यादा समझदार।”
मैं हवेली के पीछे वाली गली में छह बजे पहुँची। वही गली जहाँ चाय का ठेला लगता था, जहाँ मैंने पहली बार काजल को देखा था। मैंने एम्बुलेंस गली के मुहाने पर खड़ी की और रिया को अंदर ही बैठाए रखा, दरवाज़ा बंद।
“कुछ हो तो हॉर्न मारना,” मैंने कहा।
“तू क्या करेगी?”
“देखूँगी।”
मैं चाय के ठेले के पास खड़ी हुई। ठेला वाला मुझसे उम्र में बड़ा था, गंदा कुर्ता, हाथ में कपड़ा। मैंने चाय माँगी।
“अकेले?” उसने पूछा।
“हाँ।”
“हवेली का पता पूछने आई हो?”
मैं चौंकी।
उसने कप भरा। “मैं यहाँ बीस साल से ठेला लगाता हूँ। सब पूछते हैं। कोई ऊपर नहीं जाता। कोई नहीं।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “तुम भी मत जाओ।”
“क्यों?”
“क्योंकि ऊपर जाकर आने वाले लोग गली में लौटते हैं, पर नाम छोड़कर।” उसने कप मेरी तरफ़ बढ़ाया। “मैंने देखा है। पहले आदमी आया, धोती-कुर्ता। वह ऊपर गया, नीचे आया, और बाद में मुझे उसका नाम याद नहीं रहा। फिर औरत आई। फिर एक लड़का। सब ऐसे ही। मैंने सोचा मुझे कोई याद नहीं—” उसने चाय उँडेल दी। “पर पिछले हफ़्ते मैं अपनी पत्नी का नाम भूल गया। बीस साल से साथ रह रहा हूँ।”
मैंने चाय नहीं पी।
“तू कौन है?” उसने पूछा।
“मीरा।”
“मीरा।” उसने दोहराया। “इस शहर में मीरा नाम की कोई औरत नहीं है।” उसने कपड़ा कंधे पर डाला। “इसलिए तुझे बचा रहा है। तेरा नाम अभी असली है।”
मेरे हाथ में चाय का कप रुक गया।
“मतलब?”
“मतलब तू अभी उसकी सूची में है, पर उसकी जेब में नहीं।” उसने आसमान की तरफ़ देखा। “देख, शाम हो रही है। हवेली का गेट छह बजे के बाद खुला मिलता है। कोई पूछता नहीं। दरवाज़ा अपने आप खुला रहता है। मैंने कभी अंदर पैर नहीं रखा।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरी माँ ने कहा था — जो हवेली के अंदर जाता है, वह बाहर आकर अपनी माँ को भी नहीं पहचानता।”
मैंने कप उसके पास रख दिया।
“और भैरों?”
वह रुका। उसने अपनी आँखें सिकोड़ीं।
“भैरों?”
“काली गाड़ी वाला। भारी शरीर। चुप्पा।”
“वह तो हरनाम का हाथ है।” उसने कपड़ा फिर उठाया। “वह रोज़ शाम गाड़ी लेकर आता है, हवेली के पीछे वाले दरवाज़े पर। कभी कुछ लाता है, कभी ले जाता है।”
“क्या?”
“पता नहीं। पर एक बार मैंने देखा था — उसके हाथ में एक पीली फाइल थी। और उस फाइल पर एक लड़की की तस्वीर थी।” उसने एक पल रुककर मेरी तरफ़ देखा। “तेरी बेटी जैसी।”
मैं हवेली के पीछे वाले दरवाज़े की तरफ़ भागी। वह दरवाज़ा पुराना, लोहे का, छोटा। पास जाकर मैंने देखा कि वह खुला है — कुंडी लगी नहीं, बस ढुलक गया है। अंदर अँधेरा था।
मैंने अंदर झाँका।
एक सीढ़ी नीचे जाती थी। दीवार पर एक ट्यूबलाइट जल-बुझ रही थी। और नीचे, सीढ़ी के आख़िर में, एक आवाज़ आ रही थी।
कोई गा रहा था। धीमे, अटके हुए स्वर में — जैसे कोई बहुत पुराना गीत याद कर रहा हो।
मैंने एक कदम आगे रखा। सीढ़ी की पहली पायदान चरमराई।
गाना रुक गया।
“कौन?” नीचे से आवाज़ आई — औरत की, खुरदुरी, सूखी। “ऊपर कौन है?”
मैं चुप रही।
“बोल,” वह फिर बोली। “वरना मैं नाम लिखना शुरू कर दूँगी।”
मेरी जेब में पीतल की कलम थी। मैंने उसे निकाला। मेरी उँगलियाँ उस पर जम गईं।
“मीरा,” मैंने कहा।
नीचे कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर वह हँसी — एक छोटी, सूखी हँसी। “आ गई।” उसकी आवाज़ में कुछ और था — जैसे हिसाब मिल गया हो। “मैं तेरी राह देख रही थी।”
मैंने सीढ़ी की तरफ़ देखा। लोहे की सीढ़ी थी, जंग लगी। नीचे अँधेरा।
“तू ऊपर आ,” मैंने कहा।
“नहीं।” उसकी आवाज़ अब गोल थी। “तू नीचे आ। यहाँ तेरा नाम लिखा है, और तारीख़ भी।”
“कौन सी तारीख़?”
“पंद्रह।”
मेरे पैर रुक गए।
“पर तुझे डरने की ज़रूरत नहीं,” वह बोली। “मैं इसे आगे खिसका दूँगी। जैसे तेरी माँ के लिए किया था। सुशीला ने मुझसे कहा था — ‘मेरी बच्ची का नाम लिख दे, पर तारीख़ मत लिख।’ मैंने लिखा। अब तू उसी काग़ज़ पर है।”
मैंने रिया को याद किया — एम्बुलेंस में बैठी, दरवाज़ा बंद।
“तू वही है,” मैंने कहा। “जो तस्वीर में है। जिसका चेहरा तूने खुद मिटाया।”
“मैंने नहीं मिटाया।” उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ पिघला। “मैंने नाम नहीं लिखवाया। बाबू हरनाम ने मुझे रखवाली दी, और बदले में मेरा नाम माँगा। मैंने दिया नहीं। इसलिए मैं अब तक हूँ।”
“तो तू रजिस्टर क्यों लेकर आई?”
“क्योंकि तेरी बेटी का नाम उसमें है, और मुझे उसका नाम चाहिए।”
“क्यों?”
नीचे सन्नाटा रहा।
“क्योंकि चालीस साल से मैं रखवाली कर रही हूँ, और अब मुझे एक नाम चाहिए जो मेरे बाद इसे संभाले।” उसकी आवाज़ अब धीमी थी, थकी। “मैं बूढ़ी हो गई हूँ, मीरा। और रखवाली करने वाले को कोई नहीं ढूँढता। मैं चाहती हूँ कि कोई हो जो मेरा नाम याद रखे। तेरी बेटी उस लायक़ है।”
“वह बारह साल की है।”
“मैं भी बारह साल की थी जब मुझे रखवाली मिली थी।”
मैंने सीढ़ी पर हाथ रखा। ठंडी थी, पर मैंने हाथ नहीं हटाया।
“अगर मैं नीचे आई,” मैंने कहा, “तो मुझे क्या मिलेगा?”
“रजिस्टर।” उसकी आवाज़ में कुछ बदला, जैसे वह जानती थी कि मैं आ रही हूँ। “और एक नाम। वह नाम जो रामदीन चालीस साल से बोल नहीं पाया।”
“किसका?”
“नीचे आ, तो बताऊँ।”
मैंने पहला कदम नीचे रखा।
तभी पीछे से हॉर्न बजा।
तीन बार। ज़ोर से।
रिया।
मैं सीढ़ी से ऊपर भागी, दरवाज़े से बाहर आई। गली के मुहाने पर एम्बुलेंस खड़ी थी और उसके सामने एक काली गाड़ी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला था।
भैरों बाहर खड़ा था, हाथ में वही पीली फाइल। पर वह मुस्कुरा नहीं रहा था।
वह डरा हुआ था।
“मैडम,” उसने कहा, और आवाज़ में वह पहली बार टूटी। “रजिस्टर मेरे पास नहीं है।”
“तो किसके पास है?”
“वह ले गई।” उसने हवेली के पिछले दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया। “वह अभी नीचे से निकली। तुमसे बात करके।”
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