A Dark Secret – Chapter 337
मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया। वह मेरी वर्दी पर रोती रही। मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा। स्याही की महक आ रही थी — हल्की — उसके हाथ से।
“तू नहीं भूलेगी,” मैंने कहा। “क्योंकि हम अब उसे ढूँढने जा रहे हैं।”
वह रुकी। आँखें साफ़ कीं।
“कहाँ?”
“उसके घर।”
शांति विहार फेज़ दो।
हम ग्यारह बजे पहुँचे। फेज़ दो की गलियाँ उस वक़्त सुनसान थीं — धूप तेज़ थी और आधे मकानों पर पर्दे गिरे थे। गली सात में रीना नायक का घर वही था — कोने पर, पीले रंग का, छोटा बरामदा, सामने नीम का पेड़।
पिछली बार आई थी तो दरवाज़े पर बाहर से नया ताला लगा था। इस बार भी लगा था। पर कुछ बदला था।
मैंने गाड़ी रोकी और उतरकर दरवाज़े के पास गई।
पहले नाम-पट्टा दीवार पर लगा था — ‘रीना नायक’ — और वह अब गिर गया था, सिर्फ़ उसकी जगह चार कीलें बची थीं। पर कीलें नई थीं — चमकदार, ज़ंग नहीं लगी थी। जैसे पट्टा उखाड़कर उसी जगह फिर से लगाया गया हो, और फिर उखाड़ दिया गया हो।
मैंने दरवाज़े के नीचे झुककर देखा। चौखट और दरवाज़े के बीच एक हल्की सी दरार थी, और उस दरार से हल्की महक आ रही थी — स्याही और गोंद की। वही महक।
रिया पीछे आकर खड़ी हो गई।
“क्या देख रही है?”
“कुछ नहीं।” मैं खड़ी हुई।
पीछे मुड़ी तो सामने वाले मकान के बरामदे में एक बूढ़ा आदमी बैठा था। सत्तर से ऊपर, चेहरा झुर्रीदार, हाथ में मटका, आँखों पर सस्ते चश्मे। वह मुझे घूर रहा था — नहीं, मेरे पीछे दरवाज़े को देख रहा था। मैंने नज़र मिलाई तो उसने नज़र नहीं हटाई। उल्टा मुझे ऐसे देखा जैसे मैं कुछ छुपा रही हूँ।
मैं उसकी तरफ़ चली।
“दादू,” मैंने कहा। “यह घर?”
“कौन?”
“यह घर। रीना नायक का।”
उसने मटका रख दिया। “तू उस घर में क्यों आई है?”
“मेरी बेटी की दोस्त यहाँ रहती थी। शालिनी।”
“शालिनी।” उसने दोहराया। उसका चेहरा नहीं बदला। पर फिर उसने गर्दन हिलाई जैसे कोई पुरानी बात याद आई हो। “वह लड़की तो बहुत पहले चली गई।”
“कितना पहले?”
“अब क्या बताऊँ।” उसने मटका फिर उठा लिया। “बच्चू, मैं यहाँ पैंतालीस साल से रह रहा हूँ। मैंने इस गली में सबको आते-जाते देखा है। जो मकान खाली पड़ा है, उसके पीछे क्या है, मुझे पता है।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “तू उस घर में मत जा, बेटी।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो उस घर से निकल गया, वो नाम भी साथ ले गया।”
मेरे हाथ रुक गए। रिया ने मेरी कलाई पकड़ ली।
“और अब वो तेरे घर की तरफ़ देख रहा है,” उसने कहा। उसकी आवाज़ अब धीमी थी, जैसे कोई पुरानी बात खुद से कह रहा हो। “मुझे नहीं पता कौन है। पर पिछले हफ़्ते एक औरत आई थी यहाँ। काली साड़ी। सिर पर लाल चुनरी। उसने दरवाज़े के नीचे कुछ डाला और चली गई। मैंने झाँका। काग़ज़ था। उस पर कुछ लिखा था।”
“क्या लिखा था?”
“मैं पढ़ नहीं सका।” उसने कंधा उचका। “पर काग़ज़ से बदबू आ रही थी। वैसी बदबू जैसी पुरानी किताब से आती है। मैंने उसे भीतर नहीं रखा। फेंक दिया।”
“किस तरफ़ फेंका?”
“उधर।” उसने डस्टबिन की तरफ़ इशारा किया, मकान के पीछे।
मैं दौड़ी। डस्टबिन गली के कोने पर था, लोहे का, जंग खाया। मैंने ढक्कन उठाया। अंदर कूड़ा — केले के छिलके, अख़बार। मैंने अख़बार उठाया। नीचे एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था, पीला, गीला। मैंने उसे निकाला।
उस पर एक ही लाइन थी, मेरे ही जैसी लिखाई में।
“जब तक तू नाम खोदती रहेगी, यह शहर अपने सबसे बड़े नाम को भूलना शुरू कर देगा। उसका नाम तू नहीं बोलेगी। वह खुद बोलेगा। भैरों।”
मैंने काग़ज़ पलटा। पीछे कुछ नहीं।
“माँ।” रिया पीछे खड़ी थी, उसने काग़ज़ पढ़ा। “यह तेरी लिखाई जैसी है।”
“नहीं है।”
“है। देख — ‘ग’ का पेट। वैसे ही मोड़ती है।”
मैंने रिया को देखा। काग़ज़ हवा में फड़फड़ाया। मैंने उसे मोड़कर जेब में रखा।
“चल।”
“कहाँ?”
“अस्पताल। भैरों से मिलने से पहले मुझे एक बात पक्की करनी है।”
अस्पताल के गेट पर बेंच पर रामदीन नहीं था। मैं उसे ढूँढती हुई अंदर गई। इमरजेंसी के बाहर बाबूलाल गार्ड खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास।
“रामदीन?” मैंने पूछा।
“तीसरी मंज़िल। पुराने स्टोर की तरफ़ गया है।” उसने चाय घूँटी। “आज सुबह से वहीं है। किसी को बोलने नहीं दे रहा। कह रहा है — मेरा नाम याद आ रहा है।”
मैं सीढ़ियों से ऊपर भागी। रिया पीछे।
तीसरी मंज़िल का स्टोर — वही बंद कमरा जिसकी चाबी अनीता के पास थी। आज दरवाज़ा खुला था। अंदर बोरे पड़े थे, फाइलों के लंबे रैक, और एक कोने में रामदीन ज़मीन पर बैठा था। उसके सामने एक खुली फाइल थी। वहाँ धूल हवा में थी, और उस धूल में कुछ और भी था — स्याही की महक।
मैंने पास जाकर देखा। रामदीन उस फाइल पर झुका हुआ था और अपनी उँगली से कुछ बोल रहा था, जैसे कोई नाम दोहरा रहा हो। बहुत धीमे।
“रामदीन।”
उसने सिर उठाया। आँखें लाल थीं। हाथ काँप रहे थे।
“मीरा,” उसने कहा। “मुझे याद आ रहा है। उसका नाम।”
“किसका?”
“वह औरत। मकान नंबर पाँच के ऊपर वाली।” उसने फाइल मेरी तरफ़ सरकाई। “यह देख।”
मैंने फाइल खोली। पीली जिल्द, ऊपर लिखा था — ‘निर्माण विभाग, सरोज नगर’। बीच में एक टेबल थी — ‘पीतल गली, मकान नंबर पाँच’। और नीचे एक आधा नाम — ‘सु’। और फाइल के पीछे हरनाम की मुहर।
“यह वही फाइल है,” रामदीन ने कहा। “जो मैंने सुमित्रा के घर में देखी थी। अस्पताल के स्टोर में भी एक कॉपी रखी थी। चालीस साल पुरानी।”
“इसमें क्या है?”
“इसमें वह लिखा है जो कोई नहीं बताता।” उसने उँगली एक लाइन पर रखी। “पीतल गली के मकान नंबर पाँच में चार औरतें रहती थीं। एक — सुमित्रा, स्याही बनाने वाली। दो — सुशीला, नई आई थी। तीन — हरनाम की बहू। और चौथी —”
वह रुका।
“चौथी कौन?”
“चौथी का नाम यहाँ नहीं लिखा। सिर्फ़ इसका काम लिखा है।” उसने आख़िरी लाइन पढ़ी। “रजिस्टर की रखवाली।”
मैंने फाइल उलटी। पीछे एक और पन्ना था, जिस पर सिर्फ़ दो शब्द थे — “नाम नहीं।”
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा।
“वह औरत खुद अपना नाम नहीं लिखवाना चाहती थी,” उसने कहा। “बाबू हरनाम ने कहा था — तू रखवाली करेगी, तेरा नाम रजिस्टर में नहीं जाएगा। तू रजिस्टर के बाहर रहेगी। और वह मान गई। क्योंकि उसे पता था कि नाम लिखने का मतलब है — एक दिन मिटना।”
मैंने स्टोर में चारों तरफ़ देखा। धूल, बोरे, फाइलें।
“रामदीन,” मैंने कहा। “तू उसका नाम जानता है।”
“जानता हूँ।”
“बोल।”
“नहीं।” उसने सिर हिलाया। “अभी नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि जब मैं उसका नाम बोलूँगा, वह सुन लेगी। और वह जान जाएगी कि मैंने चालीस साल बाद उसे याद किया।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “वह मुझे बर्दाश्त नहीं करेगी, मीरा। वह चाहती है कि मैं भूल जाऊँ। क्योंकि जो याद रखता है, वह उसकी ताकत है — और जो भूलता है, वह उसका हथियार।”
“तो मैं कैसे लड़ूँ?”
“तू बोल। मैं सुनूँगा।” उसने अपनी उँगली मेरी तरफ़ उठाई। “पर एक बात। वह तेरे घर की तरफ़ देख रही है, यह बात सही है। उसने रिया को रजिस्टर पर उँगली लगवाई। अब रिया का नाम उसके हाथ में है। और वह रिया को नहीं उठाएगी — वह रिया से कुछ और चाहती है।”
“क्या?”
“पता नहीं।” रामदीन ने फाइल बंद की। “पर अगर वह बद्री प्रसाद को भी भूलने से रोक सकती थी, तो रिया का हाथ क्यों रंगा? वह रिया को अपना हिस्सा बनाना चाहती है, मीरा। वह एक नाम नहीं माँग रही — वह एक औरत माँग रही है जो रजिस्टर के बाहर खड़ी होकर उसकी जगह ले।”
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