A Dark Secret336 / 536

A Dark Secret – Chapter 336

7 min read November 6, 2026

मैं उठी। “मुझे रजिस्टर चाहिए।”

“अभी नहीं।” सुमित्रा ने मेरी कलाई पकड़ी। “सुन। अगर तू अभी गई, तो रजिस्टर तेरे हाथ लगेगा भी तो क्या करेगी? नाम पूरे नहीं, गली पूरी नहीं, आवाज़ पूरी नहीं। तेरा अपना नाम भी धुँधला है। पहले नाम। फिर रजिस्टर।”

“और रिया?”

“रिया यहाँ रहेगी।”

रिया ने मेरा हाथ छोड़ दिया। “मैं यहाँ नहीं रुकूँगी।”

“तू यहाँ रहेगी,” सुमित्रा ने कहा, रिया की तरफ़ न देखकर, मेरी तरफ़ देखकर। “मेरे पास कोई नहीं आ सकता। जो मेरे घर का पता नहीं जानता, वह यहाँ तक नहीं आएगा। हवेली की औरत ने यहाँ आकर मेरा नाम बोला, यह मैंने सोचा नहीं था। पर अभी तू यहाँ पहुँच गई, अब मैं तैयार हूँ।” उसने अपनी उँगली उठाई। “कुछ पूछने से पहले सोच। यह लड़की यहाँ सुरक्षित रहेगी।”

मैंने रिया की तरफ़ देखा। उसने मुझे देखा। बारह साल की उम्र में भी वह कभी-कभी माँ से बड़ी लगती है।

“मैं रुकूँगी,” उसने कहा। “पर तू रोज़ आएगी। और मुझे कुछ बताएगी।”

“बताऊँगी।”

“और माँ।” रिया ने अपना हाथ सुमित्रा की तरफ़ बढ़ाया। “इस दादी का नाम सुमित्रा है। मैंने इसे दीवार पर लिखते देखा है। सब नाम लिखती है। पर अपना नहीं।”

सुमित्रा ने पलक नहीं झपकी। “मेरा नाम लिखने का वक़्त आया तो लिखेगा। अभी नहीं।”

मैं गली में निकली। बाहर हवा में स्याही की महक फैली थी — फँसी हुई, मीठी। मैंने अपनी एम्बुलेंस की तरफ़ देखा। खिड़की पर कुछ था — एक सफ़ेद पर्ची, गीली स्याही से चिपकी हुई।

मैं दौड़ी। पर्ची पर लिखा था — “तेरी बेटी के हाथ में उँगली की जगह स्याही है। अगली बार हथेली पर होगी। फिर पूरी बाँह पर। चालीस दिन। — जो नाम कभी नहीं लिखा गया।”

मैंने पर्ची पलटी। पीछे कुछ नहीं था। सिर्फ़ स्याही की महक, और वह महक मेरे हाथ पर चिपक गई।

तभी मेरा फोन बजा। रामदीन था।

“मीरा। सुन। मुझे याद आया। वह औरत — वह चालीस साल पहले पीतल गली में रहती थी। मेरे मकान नंबर पाँच के ऊपर।” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “मैंने उसे एक बार पानी दिया था। उसने मेरी तरफ़ देखा नहीं। पर उसने कहा — तेरा नाम लिखा जा सकता है। पर तू नहीं लिखवाएगा, क्योंकि तू डरेगा।”

“रामदीन—”

“मैं उसे अब याद कर रहा हूँ,” उसने कहा। “और मैं उसका नाम बोलने से डर रहा हूँ।”

॥

रामदीन की आवाज़ फोन में सिर्फ़ साँस की तरह आ रही थी। मैंने पूछा, “कौन थी वह?” पर उसने काट दिया — “अभी नहीं।” और फोन रख दिया।

मैं एम्बुलेंस में बैठी रही। पीतल गली के मकान नंबर पाँच के बाहर। हाथ में वह पुरानी तस्वीर थी जो सुमित्रा ने मुझे दी थी — चार औरतें, एक का चेहरा मिटा हुआ। मैंने गाड़ी स्टार्ट की और सीधे घर चली आई। रिया पीछे बैठी थी, कुछ नहीं बोली। बस एक बार पूछा, “तू डर रही है?” मैंने कहा, “नहीं।” वह बोली, “झूठ।”

घर पहुँचकर मैंने रिया को खाना दिया, दूध गरम किया, और उसे सोने भेज दिया। फिर मैं नीचे के कमरे में आई, दरवाज़ा बंद किया, और तस्वीर मेज़ पर रख दी। टेबल लैंप जलाया। पीली रोशनी में तस्वीर और पुरानी लगने लगी।

चार औरतें। बाईं तरफ़ मेरी माँ — सुशीला — हाथ में चाय का कप, हँसती हुई, बाल खुले। उसके पास सुमित्रा देवी, कम उम्र, वही कटे सफ़ेद बाल। तीसरी — काजल की दादी, काले कपड़े में, हाथ जोड़े, चेहरे पर कुछ नहीं। और चौथी — पतली, लंबी, सीधी खड़ी, हाथ में एक कलम।

मैंने लैंप उसके हाथ पर सरकाया।

कलम।

पीतल की। छोटी, चपटी, नुकीली। ठीक वैसी जैसी मेरी जेब में थी — जो मुझे बेंच के नीचे से मिली थी, जिससे मैं रोज़ नाम लिखती हूँ।

मैंने अपनी कलम निकाली और तस्वीर के पास रख दी। दोनों एक जैसी। एक जैसी नहीं — एक ही। कोई अंतर नहीं था। मैंने तस्वीर को आँखों के पास लाकर देखा। उस औरत की उँगलियों में कलम का नीचे का हिस्सा कुछ ज़्यादा चमक रहा था, जैसे घिसा हुआ हो। मेरी कलम का नीचा भी घिसा हुआ था। बिल्कुल वैसा ही।

मैंने करवट बदली और खिड़की से बाहर देखा। रात के दो बज रहे थे। गली में एक कुत्ता भौंका और चुप हो गया।

मैंने तस्वीर उलटी कर दी। पीछे कुछ नहीं लिखा था। सिर्फ़ एक कोना मुड़ा हुआ। मैंने उसे सीधा किया। कोने के नीचे एक छोटा सा निशान था — स्याही का, पुराना, जैसे किसी ने उँगली दबाकर छोड़ दी हो।

मैंने उस निशान पर अपनी उँगली रखी। ठंडा नहीं था। बस चिकना था।

सुबह छह बजे मैंने रिया को उठाया। वह उठी, आँख मलते हुए बोली, “स्कूल?”

“हाँ।”

“आज भी?”

“आज भी।”

वह नहा-धोकर तैयार हुई। मैंने उसे एम्बुलेंस में बैठाया। डैशबोर्ड पर उसकी तस्वीर अब भी चिपकी थी, और उसके नीचे वह पीली पुड़िया — रामदीन वाली — रखी थी। मैंने गाड़ी पब्लिक स्कूल की तरफ़ मोड़ी।

रास्ते में रिया ने पूछा, “शालिनी आज आएगी?”

“पता नहीं।”

“उसका टिफ़िन मेरे पास है।”

“दे देना।”

“किसको? उसे तो कोई याद ही नहीं।” वह खिड़की से बाहर देखने लगी।

स्कूल के गेट पर मैंने गाड़ी रोकी। रिया उतरी। मैं पीछे-पीछे गई, क्योंकि आज मुझे अंदर जाना था। मिसेज़ देसाई क्लास के बाहर खड़ी थीं और मुझे देखते ही रुक गईं, जैसे उन्हें मेरी ही राह देख रही थीं।

“मीरा जी,” उन्होंने कहा। उनके हाथ में हाज़िरी का हरा पन्ना था।

“क्या हुआ?”

“रिया का नाम हाज़िरी में अधूरा है।”

“मतलब?”

“मतलब — सिर्फ़ ‘रि’ लिखा है। ‘रिया’ नहीं। और सिस्टम में भी यही दिक्कत आ रही है।” उन्होंने पन्ना खोला। “अगर नाम पूरा नहीं है तो उसे नए दाखिले की ज़रूरत होगी। नए सिरे से। फॉर्म, फीस, सब।”

मैंने पन्ना देखा। रिया की लाइन में सचमुच सिर्फ़ ‘रि’ था। बाकी जगह साफ़ सफ़ेद। जैसे कोई रबर से मिटाकर चला गया हो। और उस सफ़ेदी के ऊपर एक हल्का पीला दाग़ था — सूखी स्याही का।

“यह नाम आपने काटा है?” मैंने पूछा।

“मैंने नहीं काटा।”

“तो किसने काटा?”

“मीरा जी, आप समझ नहीं रहीं। इस पन्ने पर रिया का नाम कल पूरा था। मैंने खुद लिखा था। आज सुबह से अधूरा है। हमारे पास इसका कोई रिकॉर्ड नहीं कि ऐसा क्यों है। इसीलिए मैं कह रही हूँ — नया दाखिला।”

मेरे भीतर कुछ उबला। मैं चिल्लाने वाली थी। पर रिया मेरे पीछे खड़ी थी, और उसके सामने मैं नहीं चिल्लाती। मैंने बस उसका हाथ पकड़ा।

“चल,” मैंने कहा।

“माँ—”

“चल।”

हम बाहर आए। गली में स्कूल के बच्चों की भीड़ थी, कोई साइकिल पर, कोई पैदल। मैं रिया को एम्बुलेंस तक ले गई और गाड़ी में बैठा दिया। फिर बाहर खड़े होकर मिसेज़ देसाई की तरफ़ देखा। वह गेट पर खड़ी थीं, पन्ना हाथ में। मैंने कहा, बिना आवाज़ बढ़ाए, “आज से रिया स्कूल नहीं आएगी।”

“मीरा जी, ऐसा नहीं होता। बच्चे की पढ़ाई—”

“मेरी बेटी का नाम आपके पन्ने से मिट रहा है। उससे पहले मैं उसे घर नहीं छोड़ूँगी।” मैं गाड़ी में बैठ गई।

रिया ने पीछे से मेरा कंधा छुआ।

“माँ, तूने झूठ कहा।”

“क्या झूठ?”

“तूने कहा था मैं स्कूल आऊँगी।”

“मैंने कहा था आज आएगी। आज आई।”

वह हँसी। और फिर हँसते-हँसते रोने लगी।

मैंने गाड़ी साइड में रोकी। उसकी तरफ़ मुड़ी। वह दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर रो रही थी, कंधे हिल रहे थे। मैंने उसके हाथ नीचे किए।

“बता।”

“मैं शालिनी को नहीं भूलना चाहती,” वह बोली, रोते हुए। “सब भूल रहे हैं। मिसेज़ देसाई भूल गईं। क्लास की लड़कियाँ भूल गईं। पिछले हफ़्ते जो उसके साथ बैठती थीं, आज उन्होंने कहा — कौन सी शालिनी? और मैंने उन्हें बताया, वे हँसीं। माँ, मैं नहीं भूलना चाहती। अगर मैं भूल गई तो उसका नाम कौन बोलेगा?”

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