A Dark Secret335 / 536

A Dark Secret – Chapter 335

7 min read November 6, 2026

“तो उसने रिया का नाम अपनी जगह लिखवा दिया?”

“वह मेरे सामने खड़ी थी। उसने रजिस्टर उठाया, नाम लिखा, और तारीख़ खाली छोड़ दी। फिर हवेली की तरफ़ गई और बाबू हरनाम के केबिन में घुसी — तब वह ज़िंदा था। उसने उससे कहा — तारीख़ तू भर। मेरी बेटी का नाम तू नहीं उठा सकता, पर तारीख़ तेरे हाथ है। हरनाम ने तारीख़ भरी। और उस दिन के बाद से वह तारीख़ हर साल आगे खिसकती रही।”

“माँ ने ऐसा क्यों किया?”

“क्योंकि वह जानती थी कि कोई और तेरे लिए तारीख़ भर देगा। किसी को तारीख़ चाहिए थी, और तेरा नाम आसान था। उसने अपने हाथ से तेरा नाम दिया, बेटी, फिर अपनी जगह रिया का नाम दे दिया, ताकि तू खाली न रहे। जो लिखा जाता है, वह उठाया जाता है। पर जिसे तारीख़ नहीं मिलती, वह तैयार रहता है।”

मैं दीवारों को देख रही थी। उन नामों को। सैकड़ों। कुछ पेंसिल से, कुछ काली स्याही से, कुछ मिटे हुए।

“यह सब क्या है?” मैंने पूछा।

“यह मेरा हिसाब है,” सुमित्रा ने कहा। “चालीस साल में जो नाम मैंने किसी न किसी तरह सुने — पड़ोस से, हवेली के गेट से, बाज़ार से। जब कोई औरत आई कि उसका नाम उठ गया है, मैंने दीवार पर लिख लिया। जो नाम मुझे याद रहा, वह चला गया। जो नहीं रहा, वह सूख गया।”

“इनमें से कोई आवाज़ भी जानता है?” मैंने दीवार के नामों की तरफ़ उँगली उठाई।

“कुछ के पास आवाज़ लिखी है, वह भी मैंने ही लिखी। पर सब नहीं।” उसने मेरी नोटबुक की तरफ़ देखा जो मेरी जेब में थी। “तूने कितने इकट्ठे किए?”

“ग्यारह।”

“कम हैं।”

“मुझे पता है।”

“तुझे पता नहीं है,” सुमित्रा ने कहा। “कम नहीं हैं — कम पूरे हैं। आधे नाम ऐसे हैं जिनकी गली तुझे पता है, पर आवाज़ नहीं। आधे ऐसे जिनकी आवाज़ जानती है, पर गली नहीं। इससे कुछ नहीं होगा। एक भी आधा नाम बोल देगी, तो पूरा नाम कभी नहीं लौटेगा।”

मैं उसकी तरफ़ झुकी। “तुम मेरी मदद करोगी?”

सुमित्रा की आँखें मेरी आँखों से मिलीं। “मैं चालीस साल से इस शहर के नाम पी रही हूँ। मैं नहीं जानती किसका साथ देना है। पर उस औरत ने मेरा नाम बोला। उसने मेरे घर में आकर मेरी चीज़ें हिलाईं। अब मैं उसकी तरफ़ नहीं हूँ।”

“हमारी तरफ़ हो?”

“मैं सिर्फ़ नामों की तरफ़ हूँ।” उसने कहा। “अब बैठ और सब बता। कितने नाम हैं, कौन-कौन, किसकी आवाज़ पता है — सब। फिर मैं देखूँगी कौन सा नाम स्याही से बोलेगा।”

हम बैठ गए। रिया भी आकर बैठी, थोड़ी दूर, चुप। मैंने नोटबुक खोली। सुमित्रा ने उसमें पन्ने पलटे — धीरे, ध्यान से, जैसे कोई पुराना हिसाब देख रहा हो।

“बद्री प्रसाद,” उसने पढ़ा। “गली लिखी है। आवाज़?”

“गरीब, हल्की, बीच में हकलाती।”

“क्या बोला था जब तूने नाम पहली बार सुना?”

“उसने कहा था — मेरा नाम बद्री है, और मेरा मकान बारह नंबर है।”

“अच्छा।” सुमित्रा ने नोटबुक में पेंसिल से कुछ जोड़ा — छोटा सा निशान। “यह नाम अब पक्का है। चाहे जिसके हाथ में रजिस्टर हो, इसे वह निकाल नहीं सकता। अब अगला।”

हम ग्यारह नाम एक-एक करके गए। सुमित्रा हर नाम पर सिर हिलाती, कुछ जोड़ती, कुछ पर रुकती। जब सुनीता चौहान का नाम आया, तो वह एक पल रुकी।

“यह नाम काटा हुआ मिला था?” उसने पूछा।

“अस्पताल की पुरानी फाइल में।”

“मैं उसे जानती थी। स्कूल की अध्यापिका थी। उसका नाम जबसे उठा, मैं उसे देखती थी — वह चाय नहीं बनाती थी। एक दिन वह चाय बनाने लगी और अपना ही नाम भूल गई। फिर वह अपनी गली भूल गई।” सुमित्रा ने रुककर मेरी तरफ़ देखा। “सुनीता चौहान की आवाज़ मुझे याद है। मधुर। जैसे गीत के बोल।”

“तो अब कुल बारह,” मैंने कहा।

“अभी भी कम।”

“मुझे पता है।”

“तुझे कम पता है,” सुमित्रा ने सीधा देखा। “मैं तुझे रजिस्टर के बारे में एक बात बतानी है।”

“रजिस्टर कहाँ है?”

“सुन पहले।” उसने अपनी उँगली अपने होंठों पर रखी। “रजिस्टर कभी हवेली में था ही नहीं।”

मैं रुक गई। “क्या?”

“हवेली की तिजोरी में जो है, वह नक़ल है। असली रजिस्टर सातवें पन्ने से आगे कभी हवेली में नहीं गया। बाबू हरनाम लिखते थे नाम — मेरी स्याही से, अपने हाथ से। पर जब वह मरा, उसने रजिस्टर किसी और को दिया।”

“किसको?”

सुमित्रा ने मेरी तरफ़ देखा। लंबे पल। फिर बोली — “वह औरत जिसका नाम कभी बोला ही नहीं गया। जो चालीस साल से चुप है। जिसकी आवाज़ हरनाम परिवार को भी याद नहीं। और जो तेरे पास आएगी — खुद, बात करने।”

“कौन है वह?” मैंने पूछा। “तुम जानती हो, है न?”

“मैं जानती हूँ।”

“तो बता दो।”

“मैं वह नाम कभी नहीं बोलूँगी,” सुमित्रा ने कहा। “क्योंकि जो उसे बोल देगा, वह उसे खींच लेगा। और वह औरत रजिस्टर की रखवाली कर रही है। अगर उसे कुछ हो गया, तो रजिस्टर कभी नहीं खुलेगा। वह नाम मुँह में रख।”

“पर मुझे पता होना चाहिए—”

“मुझे पता है,” सुमित्रा ने कहा। “यह काफ़ी है। तू नाम लिखती जा। जब सारे नाम इकट्ठे होंगे, वह खुद आएगी।”

रिया उठी। “वह मेरे पास आई थी। मैंने उसे देखा है। वह पतली है। चलने में उसे जल्दी है।”

सुमित्रा ने रिया की तरफ़ देखा। “तूने उसका चेहरा देखा?”

“कुछ नहीं देखा। उसने कपड़ा ओढ़ा हुआ था चेहरे पर। पर उसके हाथ बड़े थे। और उसके पास एक झुर्रीदार हथेली थी।”

सुमित्रा ने कोई जवाब नहीं दिया। वह उठी और दीवार के पास गई। एक कोने में, स्याही के बर्तन के ठीक ऊपर, एक लकड़ी का डिब्बा रखा था। उसने उसे खोला। मुझे लगा उसमें कुछ और है — पर वह बस पतली पुरानी तस्वीर थी, चार कोनों से मुड़ी हुई।

“यह तेरी माँ की है,” उसने कहा। “सुशीला ने मुझे दी थी। तेरे पिता को नहीं दी, क्योंकि वह डर जाते।”

तस्वीर में चार औरतें थीं। हवेली की सीढ़ियों पर, दीवार के सहारे खड़ी। मैंने पहचाना — बायीं तरफ़, हँसती हुई, मेरी माँ। पतली, कम उम्र, बाल छोटे, हाथ में चाय का कप। दायीं तरफ़ सुमित्रा — अब जैसी है, वैसी नहीं, पहले जैसी। और पीछे खड़ी औरत, हाथ में स्याही की कलम — काजल की दादी? मैंने मन में सोचा। सिर पर काला कपड़ा।

और एक चौथी औरत, बायें से दूसरी। पतली, लंबी, चेहरा मिटा हुआ। जैसे किसी ने उँगली से स्याही रगड़ दी हो। तीन के चेहरे साफ़, उसका चेहरा गीला और मिटा हुआ।

“यह चेहरा मैंने नहीं मिटाया,” सुमित्रा ने कहा, मेरी तरफ़ देखकर। “इसे उसने खुद मिटाया है। क्योंकि वह नहीं चाहती कि कोई उसे पहचाने।”

“वह कौन है?” मैंने तस्वीर पर उँगली रखी।

“वही जो तेरे पास रजिस्टर लेकर आएगी,” सुमित्रा ने कहा। “जब तेरी बेटी का नाम पूरा मिटने वाला होगा।”

रिया ने अपना हाथ मेरे हाथ में दिया। “माँ।”

“क्या?”

“तारीख़ पंद्रह है।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

“उसने पूछा था, मैंने बताया,” रिया ने कहा। “वह काग़ज़ पर पंद्रह लिखा था। रजिस्टर के ऊपर।”

“किसने?”

“वह औरत। उसने मुझसे कहा — तेरी माँ तेरी तारीख़ बदलने नहीं देगी, तो मैं इसे आगे खिसका दूँगी। और मैंने कहा — खिसका।”

सुमित्रा ने रिया की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में पहली बार कुछ बदला, जैसे कोई हिसाब बिगड़ गया हो।

“अब मुझे कुछ समझ आया,” सुमित्रा बोली। “इसीलिए वह औरत रजिस्टर लेकर आई और इस लड़की से उँगली लगवाई। वह रिया का नाम नहीं उठाना चाहती। वह इसे आगे खिसकाना चाहती है।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “तेरी बेटी का नाम नहीं मिट रहा, मीरा। उसे मिटाया जा रहा है। और मिटाने वाला खुद वह औरत है।”

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