A Dark Secret – Chapter 334
“यही बोली। और मैं हँसी, कहा कि बच्चों की बातें। फिर पानी लेने गई।”
ऊपर का कमरा। छोटा, पुराना, दीवार पर एक टूटी घड़ी। रिया की पीली बोतल मेज़ पर रखी थी, ढक्कन खुला। उसका बस्ता नहीं था। मैंने मेज़ के नीचे देखा, बिस्तर के नीचे देखा।
“बस्ता भी ले गई?” दादी ने पीछे से पूछा।
“बस्ता यहीं था।”
“मतलब किसी ने बुलाया। जो भागता है वह बस्ता नहीं उठाता। जो बुलाया जाता है, वह उठाता है।”
दादी की आवाज़ में वही सूखापन था जो मेरी आवाज़ में आ जाता है जब मैं डर के मारे काम पर लग जाती हूँ। मैंने खिड़की खोली। नीचे गली खाली थी। एक कुत्ता सो रहा था। दूर चाय के ठेले पर भाप उठ रही थी।
“दादी, रिया से कोई मिलने आया?”
“कोई नहीं।”
“फोन?”
“उसका फोन उसके पास नहीं है, तू जानती है।”
“कोई आवाज़? गली से किसी ने बुलाया?”
दादी ने सोचा। असली सोच, जैसे बूढ़े लोग सोचते हैं — आँख बंद करके। “एक आवाज़ आई थी,” उन्होंने कहा। “औरत की। मीठी नहीं। जैसे किसी ने लंबे समय बाद बोला हो। मैंने पूछा कौन, तो रिया ने कहा कुछ नहीं दादी, कोई नहीं। पर उसका चेहरा…”
“क्या?”
“उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसने किसी को पहचान लिया हो।”
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरी। मन में एक ही बात — पीतल गली, मकान नंबर पाँच। स्याही वाली औरत ने कहा था कि रजिस्टर काजल के पास नहीं। किसी और के हाथ में है। और वह औरत — वही औरत — हवेली की तिजोरी से रजिस्टर ले गई होगी।
दादी दरवाज़े तक आई। “मीरा। उस औरत की आवाज़ मैं भूल नहीं पा रही। जैसे मैंने उसे पहले कभी सुना हो।”
मैं गली में निकली, एम्बुलेंस लेने दौड़ी।
पीतल गली के मुहाने पर चाय का ठेला था। ठेले वाला मुझे देखकर ही सिर हिलाने लगा। “वह लड़की गई है अंदर,” उसने कहा, “दो औरतों के साथ। एक तो वही कटे बालों वाली दादी है, दूसरी… दूसरी को मैंने नहीं पहचाना। पर उसके हाथ में एक मोटी सी चीज़ थी। लाल रंग की।”
लाल रंग की। रजिस्टर।
“कब?” मैंने पूछा।
“अभी। तुम आने से दस मिनट पहले।”
मैं गली में घुसी। मकान नंबर पाँच का लकड़ी का दरवाज़ा बंद था, पर अंदर से रोशनी की पतली लकीर आ रही थी। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं। मैंने ज़ोर से खटखटाया।
दरवाज़ा खुला। स्याही वाली बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसके चेहरे पर वही सपाट भाव, पर आँखों में कुछ और था — जैसे किसी ने उसका कोई पुराना हिसाब बिगाड़ दिया हो।
“अंदर आ,” उसने कहा।
आँगन में उतरते ही मैंने देखा — सिल पर स्याही का बर्तन अब भी वहीं था, पर उसके पास एक दूसरी कुर्सी रखी थी। अभी-अभी किसी ने उस पर बैठकर उसे खिसकाया था। मिट्टी में पैरों के निशान थे — छोटे, बच्चे के।
“वह यहाँ थी,” मैंने कहा। “रिया।”
औरत ने सिर हिलाया।
“क्यों लाई?” मेरी आवाज़ फट पड़ी।
“मैं नहीं लाई। वह खुद आई।” औरत ने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया। “मेरा नाम लेकर आई। किसी ने उसे बताया कि मैं यहाँ रहती हूँ। मेरा नाम कोई जानता नहीं।”
“किसने बताया?”
“वही लाल किताब लेकर आई, मीरा। वह औरत। उसने रिया को यहाँ छोड़ दिया और चली गई। बोली — सुमित्रा, इसे तेरे पास रख रही हूँ। यह तेरी ही नातिन है।”
सुमित्रा। मैं उसे देखती रह गई।
“तेरा नाम?” मैंने पूछा।
“सुमित्रा देवी।” उसने अपना चेहरा थोड़ा उठाया। “उसने मेरा नाम ऊँची आवाज़ में बोला। चालीस साल में किसी ने नहीं बोला। मेरे घुटनों में दर्द हो गया।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा — झुर्रियाँ, छोटे सफ़ेद बाल, हाथ में स्याही लगी उँगलियाँ। चालीस साल से यही औरत हरनाम के लिए स्याही बनाती आई थी। और उसका नाम किसी कागज़ पर नहीं था।
“रिया कहाँ है?” मैंने पूछा।
“अंदर।”
मैं अंदर भागी। एक कमरा, धरती जैसी महक, दीवारों पर नाम — सैकड़ों नाम। पेंसिल से, कभी ऊपर कभी नीचे, कभी आड़े-तिरछे। किसी ने पूरी दीवार भर दी थी, फिर दूसरी दीवार, फिर कोना। नाम, गली, तारीख़। कुछ के आगे आवाज़ लिखी थी — “मीठी, धीमी,” “खुरदरी, गुस्से में,” “जैसे गला भरा हो।”
और रिया बैठी थी, फर्श पर, पैर फैलाए। हाथ में पेंसिल। और वह भी लिख रही थी। दीवार के नीचे एक खाली जगह में।
“रिया।”
वह उठी नहीं। उसने ऊपर देखा। उसकी आँखों में वह आँसू नहीं था जो मैं उम्मीद कर रही थी। उसकी आँखों में गुस्सा था। असली गुस्सा।
“तूने बताया नहीं,” उसने कहा।
“रिया—”
“तूने बताया नहीं कि मेरा नाम भी उसमें है। तूने बस कहा था, अपना ख्याल रखना। मैं तेरी बेटी हूँ, तेरा काम नहीं।”
मैं उसके पास बैठ गई। “तू कैसे आई यहाँ?”
“वह औरत आई थी। दादी के घर। उसने कहा कि तेरी माँ को कुछ पता चला है जो उसे बताना चाहिए था। मुझे आना पड़ा।”
“कौन औरत?”
“वही जिसका चेहरा किसी को याद नहीं। उसने कहा — तेरी माँ रजिस्टर ढूँढ रही है, और वह उसके पास है ही नहीं। रजिस्टर मेरे पास है।”
“तो रजिस्टर कहाँ है?”
रिया ने सिर झुकाया। “वह ले गई। बोली कि मैं इसे तुम्हें नहीं दूँगी, यह तुम्हारी माँ का काम नहीं। मैंने कहा तो किसका काम है। वह हँसी और कहा — तेरा।”
मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसका हाथ ठंडा था। मैंने उसकी उँगली देखी — स्याही का निशान। फिर नहीं, अब सिर्फ़ हल्का सा।
सुमित्रा दरवाज़े पर आ खड़ी थी। “वह खाली हाथ नहीं आई थी,” उसने कहा। “वह रजिस्टर लाई थी और मुझे दिखाया — देख, तेरा काम। देख, सब नाम। फिर उसने रिया से कहा — तू उँगली लगा।”
“तूने क्यों लगाई?” मैंने रिया से पूछा।
“क्योंकि मैं जानना चाहती थी,” रिया ने कहा। “क्योंकि तू मुझे बच्चा समझती है।”
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं उठी और सुमित्रा की तरफ़ मुड़ी।
“तुम्हारा नाम सुमित्रा है। पड़ाव गली की बूढ़ी औरत। वही जिसने मुझे पर्ची दी थी।”
“वही।” सुमित्रा ने अपनी उँगली उठाई। “और अब सुन। तूने पूछा था कि मेरा नाम क्या है, मैंने टाल दिया। अब बता रही हूँ, क्योंकि अब टालने का वक़्त नहीं। चालीस साल मैंने हरनाम के लिए स्याही बनाई। हर नया घर, हर नया नाम — उसी स्याही से। हवेली की तिजोरी से पहले यह स्याही मेरे सिल पर बनी।”
“और तुम्हारा नाम?”
“मेरा नाम कभी किसी रजिस्टर में नहीं लिखा गया।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “मैं उस सौदे का हिस्सा बनने से बच गई, क्योंकि मैंने खुद को कभी नहीं लिखवाया। पीतल गली का मकान मेरे नाम पर नहीं है। मैं किराए पर यहाँ रहती हूँ, किसी के बहाने। इसलिए मैं अब तक हूँ।”
“और तुमने रिया का नाम रजिस्टर में लिखा?”
“मैंने नहीं। सुशीला ने लिखा। मेरी स्याही थी, पर हाथ उसका था।” सुमित्रा ने कुर्सी खींची और बैठ गई। “तेरी माँ जब यहाँ आई थी, तेरे पिता से मकान खरीदा था शहर में। मेरे पास आई। बोली — सुमित्रा, मेरी बच्ची पैदा होने वाली है। मैं चाहती हूँ उसका नाम इस शहर में हो। मैंने कहा, इसकी क़ीमत पता है? उसने कहा, मुझे पता है। तू स्याही तैयार रख, नाम मैं लिखूँगी।”
“मेरा नाम,” मैंने कहा।
“तेरा नाम। पर तेरे पैदा होने से पहले। इसीलिए तेरी तारीख़ खाली थी।” सुमित्रा ने दीवार की तरफ़ देखा। “और फिर पाँच साल बाद, वह दोबारा आई। इस बार रिया के साथ। तू कहीं ड्यूटी पर थी। उसने कहा — अब तारीख़ भरने वाले हैं। मेरी बेटी का नाम खाली है, मेरी पोती का नाम पक्का करना है। मैंने कहा, यह क्या बात कर रही है। उसने कहा — रजिस्टर ने मेरे लिए तारीख़ भर दी है। मैं जानती हूँ वह मेरी तारीख़ है, पर रिया को इस शहर में रहना है। मुझे उसके लिए जगह चाहिए।”
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