A Dark Secret – Chapter 332
रिया करवट बदलकर मुस्कुराई, आँखें बंद।
मैंने उसकी उँगली पकड़ी। निशान साफ़ था। और अंदर से, जैसे किसी ने उसे भीतर से बाहर उभारा हो।
मैंने अपनी उँगली उस पर रगड़ी। नहीं गया।
रसोई से पानी की आवाज़ आ रही थी। नल टपक रहा था। नीचे बूढ़ा जोड़ा जाग चुका था, उनके बर्तन की खनक आ रही थी।
मैंने धीरे से रिया का हाथ नीचे रखा और खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर सुबह की हल्की रोशनी थी, सड़क पर एक-दो रिक्शे निकल रहे थे।
मैंने अपनी जेब से नोटबुक निकाली और उसे खोला। ग्यारह नाम नई स्याही में चमक रहे थे।
मैंने नया पन्ना पलटा और उस पर लिखा — "रिया के हाथ पर निशान। पंद्रह की तारीख़।"
फिर मैंने पेंसिल रख दी। मेरे हाथ काँप रहे थे।
रिया के कमरे से आवाज़ आई — "माँ?"
मैंने नोटबुक बंद की। "आ रही हूँ।"
मैं उठी, पर पहले उसकी उँगली पर उभरे निशान को एक बार और देखा।
वह अब पहले से गहरा लग रहा था।
॥
रिया की उँगली पर वह निशान अब सिर्फ़ निशान नहीं लग रहा था। मैं उसे रगड़ती रही, वह फिर भी वैसा ही रहा। मैंने उसके कंधे पकड़कर हिलाया।
"रिया, उठ। उठ बेटा।"
वह करवट बदलकर बैठी, आँखें मलीं। "क्या हुआ? सुबह ही है।"
मैंने उसका दाहिना हाथ उठाकर उसकी आँखों के सामने किया। "ये क्या है?"
वह उँगली देखकर हँसी। "स्याही है। कल रात कॉपी में नाम लिख रही थी।"
"कौन से नाम? शालिनी का तो तूने खुद लिखा। बाकी क्या लिखा?"
"बस। थोड़े से नाम।" उसने हाथ खींच लिया। "माँ, तुम हर बात का बतंगड़ बना देती हो।"
मैंने उसका हाथ फिर पकड़ा। "रिया, सच बता। कल रात सपने में क्या देखा?"
वह एक पल रुकी। फिर बोली, "दीवार देखी। वही बंद कमरा जो तुम बताती हो। मैंने दीवार पर अपना नाम लिख दिया, बस मज़ाक में। फिर सो गई।"
"मज़ाक में?"
"हाँ, मज़ाक में। क्या हुआ? सपने में भी मज़ाक नहीं कर सकती?"
मैं बैठ गई उसके बिस्तर के किनारे। मेरे पैर नीचे लटक रहे थे, मुझे लगा ज़मीन हिल रही है।
"तूने किससे कहा था कि दीवार पर नाम लिखा है?"
"तुम्हें ही। अभी।" वह मुझे देखने लगी। "माँ, तुम्हारा चेहरा क्यों ऐसा है?"
मैंने उठकर उसकी नोटबुक उठाई। उसमें तीन तरफ़ शालिनी का नाम लिखा था, स्याही गहरी थी। और उसी पन्ने पर वह आधा नाम अब भी था — पहला अक्षर साफ़, बाकी धुँधला। मैंने पन्ना गौर से देखा। पहला अक्षर था — 'सु'।
मेरे हाथ ठंडे हो गए। सुशीला। माँ।
"रिया, इस पन्ने पर तूने कुछ और लिखा?"
"नहीं। यही तो मैं तुमसे कह रही थी कल।"
मैंने उसकी उँगली फिर देखी। वह निशान अब पहले से गहरा लग रहा था। मैंने अपनी उँगली उस पर रखी, कोई रंग नहीं छूटा। मेरी उँगली साफ़ रही।
"कपड़े पहन। हम रामदीन के पास जा रहे हैं।"
"अभी? स्कूल?"
"आज स्कूल नहीं।"
"माँ—"
"रिया, आज मेरी बात मान।" मेरी आवाज़ ऐसी निकली जो अपनी ही कानों में अजीब लगी। वह चुप हो गई और कपड़े पहनने लगी।
हम अस्पताल पहुँचे तो सुबह के सात बज रहे थे। पीछे की बेंच पर रामदीन बैठा था, उसके हाथ में चाय का कुल्हड़ था और वह उसे ठंडा होने दे रहा था। उसने हमें देखा और कुल्हड़ किनारे रख दिया।
"कुछ हुआ है।" उसने कहा। यह सवाल नहीं था।
मैंने रिया का हाथ आगे किया। "ये देखिए।"
रामदीन ने रिया की उँगली देखी। फिर दूसरी, फिर तीसरी। उसका चेहरा नहीं बदला, पर उसने हाथ नहीं हटाया। वह रिया की हथेली पर उलटी तरफ़ भी देखता रहा। बहुत देर तक। मुझे लगा वह बोलेगा ही नहीं।
फिर उसने हाथ छोड़ा और आसमान की तरफ़ देखा। "ये निशान बच्चों को नहीं आता।"
"मतलब?"
"मतलब — यह निशान सिर्फ़ उसी को आता है जिसका नाम किसी काग़ज़ पर पहले से लिखा हो। किसी रजिस्टर में, किसी बही में, किसी पुरानी फाइल में। जो नाम कभी लिखा ही नहीं गया, उसके हाथ पर यह नहीं उभरता।"
मैंने रिया का हाथ थाम लिया। "रिया का नाम कहाँ लिखा है?"
रामदीन ने जेब से पान मसाला निकाला, उसे मुँह में रखा, और चबाने लगा। "पहले मुझे वह औरत चाहिए।"
"कौन सी औरत?"
"जो गीली स्याही बनाती थी। चालीस साल पहले मैंने उसे देखा था, पीतल गली में। जो स्याही इस शहर में नाम उभारती है, वह उसी के हाथ की है। और वह अब भी ज़िंदा हो सकती है।"
"आप चालीस साल से उसे जानते हैं और अब बताते हैं?"
"क्योंकि चालीस साल तक उसका कोई काम नहीं आया। अब आया है। तेरी बेटी का हाथ देख।" उसने रिया की तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ पहली बार नरम हुई। "बेटा, डर मत। यह निशान डरने की चीज़ नहीं। पर यह बताता है कि किसी ने तेरा नाम कहीं लिख दिया है। और जब नाम लिखा जाता है, तो तारीख़ भी साथ लिखी जाती है।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा।
"मेरी तारीख़ कौन सी है?" उसने पूछा।
रामदीन कुछ नहीं बोला। उसने अपनी जेब से पीली पुड़िया निकाली जो पिछली बार मुझे दी थी, उसे अपनी हथेली पर रखा और देखता रहा।
"पहले पीतल गली," उसने कहा। "वह औरत पहले। तारीख़ बाद में।"
अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड रूम में अनीता मिली। तीसरी मंज़िल का स्टोर, जिसमें बोरे रखे थे और दीवार पर पीले धब्बे थे।
"चालीस साल पुरानी फाइल?" उसने सोचा। "मीरा, इतनी पुरानी फाइलें तो जल चुकी हैं कई। कुछ बची हैं बस। कीड़े लगी हैं।"
"जो बची हैं, दिखा दो।"
हमने एक-एक बोरा खोला। अनीता ने लैंप जलाया। फाइलें सीलन में भीगी थीं, कुछ के पन्ने आपस में चिपके थे। मैंने एक-एक उठाया।
तभी अनीता ने नीचे के बोरे से एक पतली फाइल निकाली। उसका रंग पीला पड़ गया था, किनारे मुड़े हुए, धागा टूटा हुआ।
"ये… इसमें कोई नाम नहीं है।"
मैंने लिया और खोला। अंदर एक ही पन्ना था। ऊपर लिखा था — 'निर्माण विभाग, सरोज नगर'। नीचे तारीख़ का खाना खाली था। बीच में बस एक पंक्ति — 'पीतल गली, मकान नंबर पाँच'।
और नीचे दाहिने कोने पर एक अधूरा सा नाम, जैसे किसी ने लिखना शुरू किया हो और बीच में रुक गया हो। पहला अक्षर साफ़ था — 'सु'।
मेरे हाथ काँपने लगे।
"यह फाइल किसने बनाई?" मैंने पूछा।
अनीता ने पन्ना पलटा। पीछे कोई नाम नहीं था, बस एक छोटी मुहर थी जिस पर सिर्फ़ 'हरनाम' पढ़ा जा सकता था।
"ये आधा लिखा नाम किसका है?" रिया ने सामने से पूछा।
मैंने उसे नहीं बताया। मैंने फाइल बंद की और अनीता से कहा, "यह मुझे दे दो।"
"मीरा—"
"यह मेरी माँ का है। मुझे पता है। इसे मुझे दे दो।"
अनीता ने मेरी आँखें देखीं और फिर फाइल मेरे हाथ में रख दी।
शाम को मैंने रिया को पड़ोस की बूढ़ी दादी के घर छोड़ा। "आधे घंटे में आऊँगी।"
"मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं। आज नहीं।"
"माँ, मेरा हाथ—"
"इसी हाथ की वजह से तू यहाँ रुकेगी।" मैंने उसका हाथ थामा। "मेरी बात मान।"
वह नाराज़ हुई, पर नीचे बैठ गई। मैंने बूढ़ी दादी को इशारा किया और गाड़ी निकाल ली।
पीतल गली में मैं पहले भी गई थी, पर काले पत्थर वाली उस गली में कभी नहीं। हवेली की पीली दीवार के साथ सटी यह गली इतनी सँकरी थी कि गाड़ी अंदर तक नहीं गई। मैंने उसे बाहर बाज़ार में खड़ा किया और पैदल चली।
गली में एक ही बत्ती जल रही थी, वह भी झूल रही थी। दरवाज़े बंद थे, कुछ पर ताले जंग खाए थे। ज़मीन पर पानी का रिसाव था, काई जमी थी।
मकान नंबर पाँच तक पहुँची तो सामने पुराना लकड़ी का दरवाज़ा था। उस पर कोई ताला नहीं था। दरवाज़ा थोड़ा खुला था।
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