A Dark Secret – Chapter 331
हवेली की गली में पहुँचकर मैंने गाड़ी रोकी। सात बजने में दस मिनट थे। गली में चाय का ठेला लगा था। ठेले वाला मुझे देखकर मुस्कुराया — वही बूढ़ा आदमी जो बीस साल से वहाँ ठेला लगाता है, जो कभी हवेली के अंदर नहीं गया।
मैं उसके पास गई।
"एक चाय।"
उसने गिलास भरा। "मैडम को बुलाया है?"
"हाँ।"
"आज हवेली का गेट खुला मिलेगा।" उसने चाय दी। "हमेशा शाम को खुला रहता है। कोई अंदर जाता है, कोई बाहर आता है। हम कभी नहीं गए।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि हमारा नाम वहाँ नहीं लिखा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और जो नहीं लिखा, वह जाता नहीं।"
वही बात। हर बूढ़ा यही बोल रहा था।
मैंने चाय पी और गिलास वापस किया। तभी हवेली का गेट खुला और मनोहर बाहर आया, हाथ में फाइल।
"मीरा जी।" उसने सिर झुकाया। "अंदर आइए।"
मैं उसके पीछे गई। हवेली के अंदर लंबा कमरा था, दीवारों पर तीन पीढ़ियों की तस्वीरें। मैंने उन्हें देखा — एक तस्वीर में चार औरतें थीं, हँसती हुईं, और उनमें मेरी माँ थी। वही फोटो जो कब्रिस्तान में लिफ़ाफ़े में मिली थी।
काजल सामने बैठी थी। आज वह सफ़ेद सूट में थी, बाल करीने से बँधे, हाथ में चाय का कप। मुस्कुराई, पर आज मुस्कान में कुछ कम था।
"बैठिए, मीरा।"
मैं नहीं बैठी।
"आपने मुझे बुलाया। बोलिए।"
उसने कप रखा। "रजिस्टर गायब है।"
"मुझे पता है।"
"और मुझे पता है कि आपने ग्यारह नाम बोले। रिया के हाथ गरम हैं और आपकी नोटबुक की स्याही नई हो गई।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मीरा, मैं आपकी दुश्मन नहीं हूँ। मैं भी इस सौदे में फँसी हूँ।"
"तो बाहर निकलिए।"
"ऐसे नहीं निकलते।" उसने अपनी उँगली उठाई। "मेरा नाम भी उसी रजिस्टर के आख़िरी पन्ने पर है। मेरे दादा ने लिखा था। वह चाहते थे कि रखवाला बना रहे — तो उसने मुझे भी बाँध दिया।"
मैं उसकी तरफ़ देखती रही। पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ सच्चा लगा।
"तो आप मेरी मदद क्यों नहीं करतीं?"
"क्योंकि अगर मैं करूँगी, तो मेरा नाम पहले उठेगा।" उसने कप उठाया, फिर रख दिया। "मैं डरती हूँ, मीरा। मैं अपना नाम नहीं खोना चाहती।"
कमरे में चुप्पी छा गई। मनोहर दरवाज़े पर खड़ा था, सिर झुकाए।
मैंने अपनी जेब से नोटबुक निकाली।
"आपको पता है ये क्या है?"
"आपकी नोटबुक।"
"इसमें ग्यारह नाम हैं। कल बारह हो जाएँगे। परसों पंद्रह। और जब ये पूरी हो जाएगी — सिर्फ़ नाम, गली और आवाज़ से — तब मैं इन्हें एक साथ बोलूँगी। और आपका नाम भी उनमें से एक है।"
काजल उठी। उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"आप मुझे धमका रही हैं?"
"नहीं। मैं आपको बता रही हूँ कि मैं क्या करने वाली हूँ।" मैंने नोटबुक बंद की। "आप चाहें तो साथ आइए। वरना रास्ते से हट जाइए।"
काजल मेरे पास आई। इतनी पास कि उसके इत्र की महक और स्याही की महक एक साथ आई।
"आपको नहीं पता कि आप किससे लड़ रही हैं।"
"मुझे पता है। एक रजिस्टर से। और उस काग़ज़ से जो आपके दादा ने लिखा।"
वह पीछे हटी। कुछ देर मुझे देखती रही। फिर उसने मनोहर की तरफ़ देखा।
"मनोहर, उसे बाहर छोड़ दो।"
मैं मुड़ी। दरवाज़े तक पहुँची। तभी मेरी नज़र दीवार पर टँगी उस तस्वीर पर पड़ी — चार औरतें, हँसती हुईं। मैंने उँगली उठाकर उस चौथी औरत की तरफ़ इशारा किया जिसका चेहरा मिटा था।
"ये कौन है?"
काजल ने देखा। उसका चेहरा बदला।
"मुझे नहीं पता।"
"आपकी हवेली में टँगी तस्वीर है, और आपको नहीं पता?"
"मैंने अपने दादा से पूछा था। उन्होंने कहा — 'वह नाम नहीं है, वह सवाल है।' और फिर कभी नहीं बताया।"
मैंने उस तस्वीर को फिर देखा। चौथी औरत के चेहरे पर गीली स्याही थी — जैसे अभी मिटाया गया हो।
मैं बाहर निकल आई। गली में हवा ठंडी थी। मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और बैठ गई।
तभी मेरा फोन बजा। रिया का नंबर।
"माँ।" उसकी आवाज़ धीमी थी।
"क्या हुआ? तू ठीक है?"
"माँ, मेरे कंधे पर…" वह रुकी। "अभी कुछ लिखा जा रहा है। मुझे महसूस हो रहा है। जैसे कोई उँगली से लिख रहा हो।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"दरवाज़ा बंद है ना?"
"हाँ। पर…"
"पर क्या?"
"दीवार पर भी कुछ लिखा जा रहा है। मेरे कमरे की दीवार पर।"
"क्या लिखा है?"
वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "मेरा नाम। रिया जोशी। और नीचे — नीचे तारीख़ है।"
"कौन सी तारीख़?"
"पंद्रह।"
फोन कट गया।
मैंने गाड़ी स्टार्ट की और सड़क पर निकल पड़ी। एम्बुलेंस की लाइट जलाई। सायरन। सड़कें खाली थीं, पर मुझे लगा सब कुछ धीमा चल रहा है। घर पहुँचकर मैं सीढ़ियों से भागी।
रिया के कमरे का दरवाज़ा खुला था। वह बिस्तर पर बैठी थी, गोद में कॉपी, आँखें सूखी।
मैंने दीवार देखी — खाली थी।
"कुछ नहीं है, माँ।" उसने कहा। "जब तुम आईं, सब मिट गया।"
मैंने उसका कंधा देखा। साफ़।
मैं उसके पास बैठ गई। मेरा साँस फूल रहा था।
"रिया।"
"हाँ।"
"कल से तू स्कूल नहीं जाएगी।"
वह उठ खड़ी हुई। "नहीं।"
"ये बहस नहीं है।"
"माँ, मेरा नाम दीवार पर लिखा जा रहा है। स्कूल में हो या घर में, फ़र्क़ नहीं पड़ता। तुम मुझे छुपा नहीं सकती।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बारह साल की बच्ची, मेरे सामने खड़ी, आँखों में आग।
"तू नहीं समझ रही।" मेरी आवाज़ धीमी थी।
"मैं समझ रही हूँ।" उसने कॉपी उठाई। "मुझे बताओ कि क्या करना है। सिर्फ़ बताओ। मैं डरूँगी नहीं।"
मैं कुछ देर चुप बैठी रही। फिर मैंने अपनी नोटबुक खोली और उसे उसके सामने रख दिया।
"यहाँ ग्यारह नाम हैं। कल बारह हो जाएँगे। हर नाम के साथ एक गली चाहिए और उसकी आवाज़।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू जो कर सकती है — स्कूल में, गली में, जहाँ भी — नाम याद रख। जो नाम लोग भूल रहे हैं, उन्हें अपनी कॉपी में लिख। गली पूछ। आवाज़ याद रख।"
"और तुम?"
"मैं उन्हें एक साथ बोलूँगी।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं।
"वादा?"
"वादा।"
वह बैठ गई और अपनी कॉपी खोली। पहला नाम लिखा, बड़े अक्षरों में — शालिनी नायक।
फिर उसने देखा, कॉपी के पन्ने पर एक और नाम उभर रहा था, जो उसने नहीं लिखा था।
"माँ?"
मैंने झुककर देखा। एक नाम आधा बना था, जैसे कोई बाहर से दबा रहा हो। पहला अक्षर साफ़, बाकी धुँधला।
"ये तूने लिखा?"
"नहीं।"
मैंने कॉपी उठाई। स्याही गीली थी। महक आई — वही। स्याही और गोंद की।
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। "ये नाम भी उठने वाला है?"
"लगता है।" मैंने कॉपी बंद की और अपने सीने से लगाया।
उस रात मैं सोई तो देर से। करवट बदलती रही। रिया अपने कमरे में जगी रही देर तक — मैंने दरवाज़े की दरार से देखा, वह कॉपी पर नाम लिख रही थी, धीरे-धीरे, बिना रुके।
नींद आई तो सपना आया।
वह बंद कमरा। दीवार। पर इस बार दीवार पर मेरा नाम नहीं था।
रिया का नाम था।
बड़े अक्षरों में। नीली स्याही से। और नीचे तारीख़ — पंद्रह।
मैं चीखना चाहती थी, पर आवाज़ नहीं आई। दीवार के सामने खड़ी होकर मैं उस नाम को मिटाने की कोशिश करती रही, पर मेरे हाथ लकड़ी की तरह जड़ हो गए थे।
नींद टूटी तो सुबह हो चुकी थी। मैं उठकर बैठ गई। माथा भारी, आँखें जल रही थीं।
मैंने अपने हाथ देखे। साफ़ थे।
मैं रिया के कमरे में गई। वह सो रही थी। धीरे से मैं उसकी तरफ़ झुकी। उसका हाथ देखा — साफ़। मैंने राहत की साँस ली और रज़ाई सहलाई।
तभी मेरी नज़र उसकी उँगलियों पर पड़ी।
दाहिने हाथ की तर्जनी पर एक छोटा स्याही का निशान था। गोल। जैसे किसी ने उँगली से दबाया हो।
मैं वहीं रुक गई।
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