A Dark Secret330 / 536

A Dark Secret – Chapter 330

6 min read November 6, 2026

"माँ, मेरा हाथ गरम है।"

"कैसा गरम?"

"जैसे कोई पकड़े हुए हो।" उसने पेंसिल रखी और हथेली मेरी तरफ़ की।

मैंने उसकी हथेली छुई। सिर्फ़ हल्की गरम, साधारण। पर उसके पास जो कॉपी थी, उसके पीछे का पन्ना देखकर मेरा मुँह सूख गया — शालिनी शालिनी शालिनी शालिनी, दस बार, और हर बार स्याही गहरी होती गई थी, जैसे कोई नई स्याही पुरानी पर डालता जा रहा हो।

"रिया, ये कल से भी गहरी क्यों है?"

"मुझे नहीं पता। मैंने वैसे ही लिखा।"

मैंने उसकी कॉपी ली और अंदर की तरफ़ देखा। पन्ने उलटे तो पीछे की तरफ़ भी शालिनी का नाम था, उल्टा, दबा हुआ, जैसे बंद कॉपी पर ही कोई ऊपर से लिखता जा रहा हो।

रिया के हाथ से मैंने कॉपी खींची और सीढ़ियों पर बैठकर उसे ध्यान से देखा।

"तूने ये कब लिखा?"

"जब तुम अस्पताल में थीं। मैंने सोचा, लिखती रहूँ, तो वो मिटेगी नहीं।"

मैं कुछ देर चुप रही। फिर मैंने उसकी कॉपी उसके हाथ में वापस दी, और अपनी नोटबुक निकाली।

"अब मैं तुझे कुछ दिखाऊँगी।"

मैंने नोटबुक का वह पन्ना खोला जिस पर तीन घरों के उतरे पट्टों की लिस्ट थी। रिया ने उसे देखा, फिर मुझे देखा।

"ये धुँधले क्यों हो रहे हैं?"

मैंने नोटबुक को लैंप के नीचे किया। सच में, बद्री प्रसाद का नाम, तीनों घरों की लिस्ट, रीना नायक की दो बार लिखी लाइन — सब हल्के पड़ रहे थे। जैसे मैंने पेंसिल से नहीं, पानी से लिखा हो। बारह घंटे पहले की लिखाई, और अब मटमैली।

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने फोन निकाला।

रामदीन तीसरी रिंग पर उठाया।

"क्या हुआ?"

"नोटबुक में मेरी लिखाई मिट रही है।"

दूसरी तरफ़ कुछ देर चुप्पी रही। फिर उसकी आवाज़ आई, धीमी, जैसे वह बैठ गया हो।

"कैसी मिट रही है?"

"धुँधली हो रही है। जैसे काग़ज़ खा रहा हो।"

"सुन।" उसकी आवाज़ में कुछ बदला। "चालीस साल पहले मैंने एक औरत को ऐसा लिखते देखा था। वह पीतल गली में रहती थी। बाल कटे हुए, किसी से बात नहीं। रात को वह दीवार पर नाम लिखती और सुबह वह नाम मिट जाता। फिर उसे किसी ने बताया था — नाम लिखने से पहले उसे तीन बार बोलना पड़ता है।"

"तीन बार?"

"एक बार अपने लिए। एक बार उसके लिए जिसका नाम है। और एक बार शहर के लिए। फिर लिख। तभी स्याही टिकती है।"

"ये बात तुमने पहले क्यों नहीं बताई?"

"क्योंकि यह काम करता है, बोलने से वे सुन लेते हैं।" वह रुका। "पर अब जब तेरी लिखाई खुद मिट रही है, तो अब बोलना पड़ेगा। धीरे बोल। मुँह से। पूरा नाम, पूरी गली, और उसकी आवाज़ — तीनों। और तीन बार।"

मैंने फोन रखा और रिया की तरफ़ देखा। वह सीढ़ी पर बैठी सब सुन रही थी।

मैं उठी, उसे ऊपर भेजा, और रसोई में गई। दरवाज़ा बंद किया। फिर नोटबुक खोली और उसके सामने बैठ गई।

पहला नाम — बद्री प्रसाद। शांति विहार फेज़ एक। ब्लॉक बारह। उसकी आवाज़ — भारी, खाँसी वाली, जैसे गला सूखा हो।

मैंने फुसफुसाकर कहा, "बद्री प्रसाद, शांति विहार फेज़ एक, ब्लॉक बारह।" फिर अपने लिए — "मैं बोल रही हूँ।" फिर शहर के लिए — "सरोज नगर सुन रहा है।"

फिर दोबारा। फिर तीसरी बार।

तीसरी बार में मेरी आवाज़ काँप गई। मैंने रुककर गला साफ़ किया और फिर बोली। जब तीसरी बार पूरा हुआ, तब मैंने पेंसिल उठाई और नोटबुक में उसका नाम लिखा।

स्याही पहले से गहरी थी। काली। जैसे नई हो।

मैंने अगला नाम लिया — रीना नायक, शांति विहार फेज़ दो, गली सात। आवाज़ — हल्की, जल्दी बोलने वाली, बीच में हँस देने वाली।

तीन बार बोला। तीन बार लिखा। स्याही गहरी रही।

तीसरा नाम — सुनीता चौहान, शांति विहार फेज़ दो। आवाज़ — धीमी, रुक-रुक कर बोलने वाली, जैसे हर शब्द तोलकर।

यहाँ मुझे रुकना पड़ा। मुझे उसकी आवाज़ याद नहीं थी। मैंने आँखें बंद कीं, अस्पताल की पुरानी फाइल सोची, उस पर लिखा कटा-मिटा नाम। कुछ नहीं आया।

मैंने तीसरे नाम को खाली छोड़ दिया और चौथा लिया — कमला। फिर गीता। दोनों की आवाज़ मुझे याद नहीं थी। मैंने उनके आगे सवाल का निशान लगाया।

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

"माँ।"

मैंने दरवाज़ा खोला। रिया खड़ी थी, हाथ में पानी का गिलास।

"तू क्या कर रही है?"

मैंने गिलास लिया, आधा पी गई।

"शहर में कुछ लोग अपने नाम खो रहे हैं। मुझे रोकना है।"

"कैसे?"

"याद रखकर। बोलकर।"

वह कुछ देर मुझे देखती रही। फिर बोली, "मैं भी मदद करूँगी।"

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि ये तेरा काम नहीं है।"

"मेरे स्कूल में मेरी दोस्त का नाम मिट रहा है। ये मेरा काम है।"

मैंने उसके कंधे पकड़े। मेरी आवाज़ तेज़ हो गई — "तेरा काम पढ़ना है। ये सब मैं देख लूँगी। तू बस — बस मेरे पीछे मत आ।"

वह पीछे हटी। उसकी आँखें भर आईं, पर वह रोई नहीं। वह सीढ़ियों से नीचे उतर गई।

मैं रसोई में वापस आई और बैठ गई। नोटबुक खुली थी। मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने एक गहरी साँस ली और फिर से बोलना शुरू किया।

अगले घंटे में मैंने ग्यारह नाम बोले — जो मुझे याद थे। हर नाम के साथ गली, साथ में आवाज़ का एक टुकड़ा। जहाँ आवाज़ याद नहीं थी, वहाँ मैंने सिर्फ़ नाम और गली बोली, और नीचे लिखा कि आवाज़ बाकी है।

ग्यारह नामों के बाद मेरा गला सूख गया। पर नोटबुक में स्याही अब गहरी थी। मैंने उसे उँगली से छुआ — सूखी, टिकी हुई। मैंने राहत की साँस ली।

तभी फोन बजा।

स्क्रीन पर नाम नहीं था, बस नंबर। मैंने उठाया।

"मीरा जोशी?"

आवाज़ पुरुष की थी, धीमी, बिना जल्दबाज़ी।

"कौन?"

"मैं वही हूँ जो तुम्हारा नाम वापस चाहता है।" एक छोटी हँसी। "पर आज नहीं। आज मैं सिर्फ़ यह बताने के लिए फोन कर रहा हूँ कि तुमने जो अभी किया, वह सुनाई दिया। ग्यारह नाम। तुम जल्दी कर रही हो।"

मेरा हाथ ठंडा पड़ गया।

"तुमने सुना कैसे?"

"शहर सुनता है, मैडम। तुमने खुद कहा था — सरोज नगर सुन रहा है।" वह हँसा। "शाम सात बजे। हवेली। काजल मैडम तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं। और हाँ — तुम्हारी बेटी का नाम काफ़ी साफ़ लिखा जा रहा है।"

लाइन कट गई।

मैं वहीं खड़ी रही। रसोई की लाइट पीली थी, नल टपक रहा था। मैंने ऊपर देखा — सीढ़ी पर रिया की परछाई दिखी, फिर गायब हो गई।

मैं भागकर ऊपर गई। रिया अपने बिस्तर पर बैठी थी, कॉपी गोद में।

"तूने दरवाज़े पर क्यों सुना?"

"मैंने नहीं सुना।" उसने कॉपी बंद की। "मैं तो यहाँ बैठी थी।"

"तो ऊपर कौन था?"

वह चुप रही। फिर बोली, "माँ, मेरे कंधे पर कुछ है?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी कमीज़ का कॉलर हटाकर मैंने देखा — कुछ नहीं, सिर्फ़ साफ़ चमड़ी।

"कुछ नहीं है।"

"तो वो बूढ़ी औरत झूठ क्यों बोली?"

"मुझे नहीं पता।"

मैंने उसके बाल सहलाए और नीचे आ गई। घड़ी देखी — छह बज चुके थे।

मैंने जल्दी से कपड़े बदले, जीन्स और काली शर्ट पहनी, बाल बाँधे। गाड़ी की चाबी उठाई।

रिया सीढ़ी पर खड़ी थी।

"तू जा रही है?"

"हाँ। और तू अन्दर रहेगी। दरवाज़ा बंद कर। किसी को मत खोल।"

"कब तक?"

"पता नहीं।"

वह मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा। "माँ।" मैं रुकी। "ये ले।" उसने मेरी नोटबुक उठाई जो मैं मेज़ पर भूल आई थी।

मैंने उसे लिया, उसका माथा चूमा, और बाहर निकल गई।

बाहर हवा ठंडी थी। आँगन में एम्बुलेंस खड़ी थी। मैंने दरवाज़ा खोला और बैठ गई। इंजन चला, तो डैशबोर्ड पर रिया की तस्वीर हिली।

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