A Dark Secret329 / 536

A Dark Secret – Chapter 329

7 min read November 6, 2026

वह पन्ना अपने आप पलटकर खुला।

उस पर लिखाई थी — मेरी लिखाई नहीं। पतली, झुकी हुई लाइनें, जैसे किसी ने नाखून से काग़ज़ पर दबाया हो और स्याही भर दी हो।

"जो नाम तू लिख रही है, वो तेरे हाथ से जाएँगे।"

मैंने तुरंत नोटबुक बंद कर दी। पीछे की तरफ़ पन्ने देखे — वे सब खाली थे, सिर्फ़ मेरी लिखाई। फिर उस पन्ने पर लौटी। वह लाइन वहीं थी।

कुछ देर मैं वहीं खड़ी रही, नोटबुक हाथ में। फिर मैंने गले में आई ठंडी हवा पी और उसी पन्ने पर, उस लाइन के नीचे, अपनी पेंसिल से लिख दिया — "देखते हैं।"

जब मैं गाड़ी में बैठी, तो मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने गाड़ी स्टार्ट की। हेडलाइट ने सामने की खाली सड़क को सफ़ेद कर दिया। मैंने बैक मिरर में देखा, तो ब्लॉक बारह का दरवाज़ा अब भी बंद था। पर उसके सामने की दीवार पर, जहाँ सफ़ेद प्लास्टर के दो धब्बे थे, उन धब्बों के बीच कुछ उभर रहा था — धीरे-धीरे, जैसे कोई अंदर से दीवार पर उँगली चला रहा हो।

मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी। मिरर में वह दीवार पीछे छूट गई।

घर पहुँचकर मैंने गाड़ी आँगन में खड़ी की। ऊपर की बत्ती जल रही थी। रिया सोई नहीं थी। मैंने सीढ़ियाँ चढ़कर दरवाज़ा खोला। वह मेज़ पर बैठी थी, सामने खुली कॉपी, हाथ में पेंसिल।

"तूने कहा था अस्पताल।" उसने सिर उठाया। "अस्पताल से फोन आया था। अनीता दीदी ने पूछा तू कहाँ है।"

मैं कुछ नहीं बोली। चप्पल उतारी, पानी पिया, और उसके सामने बैठ गई।

"मैं शांति विहार गई थी।" मैंने नोटबुक मेज़ पर रखी। "रात में। बिना कॉल।"

रिया ने नोटबुक खोली। उसने पन्ने उलटे। जब वह उस पन्ने पर पहुँची, तो उसकी उँगली रुक गई।

उसने लाइन पढ़ी। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"यह तूने लिखा?"

"नीचे वाली लाइन मैंने लिखी। ऊपर वाली नहीं।"

वह कुछ देर उस पन्ने को देखती रही। फिर उसने पेंसिल उठाई और उस लाइन के नीचे, मेरे "देखते हैं" के नीचे, अपनी तरफ़ से लिखा — "हम देखेंगे।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "रिया।"

"क्या?"

"तूने आज दोपहर कहा था कि नया स्कूल अच्छा है।"

उसने पेंसिल नीचे रख दी। "माँ, मैं बारह साल की हूँ। मैं मूर्ख नहीं हूँ। मुझे पता है वह फॉर्म किसने भेजा। पर मैं यह भी जानती हूँ कि तू मुझे स्कूल से निकालने की सोच रही थी — हॉस्टल भेजने की।"

"मैं तुझे बचाने की सोच रही थी।"

"मुझे बचाने का मतलब मुझे दूर भेजना नहीं है।" उसकी आवाज़ पहली बार मेरे सामने कड़ी हुई। "मेरा नाम भी उस रजिस्टर में है, तूने खुद कहा था। तो मुझे दूर भेजकर तू क्या बचाएगी? मेरा शरीर? मेरा नाम वहीं रहेगा।"

मैं उसके सामने चुप बैठी रही। मैं कुछ नहीं बोल पाई, क्योंकि वह सही थी।

"मैंने आज शालिनी का नाम दस बार लिखा," रिया ने कहा। "कॉपी के पीछे। हर बार लिखते वक़्त हाथ गरम होता गया और आख़िरी बार में पेंसिल का नोक टूट गया।" उसने कॉपी मेरी तरफ़ सरकाई। पीछे के पन्ने पर दस बार एक ही नाम, हर बार थोड़ा और गहरा, थोड़ा और काला, जैसे स्याही खुद बढ़ रही हो।

"माँ, यह चीज़ मुझमें है। मुझमें भी है। मुझे भागना नहीं है।"

मैंने उसके हाथ पर हाथ रखा। उसकी हथेली गरम थी।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त है। जब मैं कहूँ कि पीछे हट, तू बिना सवाल पीछे हटेगी।"

उसने सिर हिलाया। "और जब मैं कहूँ कि रुक, तो तू रुकेगी।"

मैं हँसी। वह पहली बार हँसी थी उस दिन। "यह सौदा है?"

"नहीं," उसने कहा, "यह सौदा नहीं है।"

हम दोनों उस वक़्त साथ बैठे थे, मेज़ पर नोटबुक खुली थी, और मुझे लगा कि उस रात मेरे पास एक और वजह है — सिर्फ़ बचने की नहीं, सामने खड़े होने की।

सुबह मैं अस्पताल गई। ड्यूटी पर जाने से पहले मैंने चड्ढा जी के केबिन की तरफ़ देखा। दरवाज़ा बंद था। अनीता ने बताया वह आज नहीं आए। मैंने पूछा कि कब आएँगे, तो वह बोली कि किसी ने छुट्टी की अर्ज़ी नहीं दी, बस वे आए ही नहीं।

रामदीन बेंच पर बैठा था। मेरे पास आने पर उसने मेरे हाथ में नोटबुक देखी। "कुछ मिला?"

"तीन घरों में पट्टे उतरे हैं। कीलें ताज़ा हैं।"

"तीन?"

"तीन।"

उसने आसमान की तरफ़ देखा। फिर बोला, "तीन दिन। हर नाम को तीन दिन लगते हैं। पहले दिन वह दीवार पर दिखता है, दूसरे दिन दरवाज़े पर, तीसरे दिन — नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जिस घर के बाहर पट्टा उतरा मिले, वहाँ का नाम उस दिन उठाया जाएगा। तेरे पास तीन दिन हैं।"

"मैं नाम वापस नहीं ला सकती? जितनी तेज़ी से वे उठा रहे हैं?"

रामदीन ने अपनी जेब से पान मसाला निकाला। होंठों के नीचे दबाया। फिर धीरे से बोला, "वापस लाने के लिए तुझे नाम बोलना पड़ेगा। पर अगर तू बोलेगी, तो वे भी सुनेंगे। और वे सुनेंगे — तो वे जानेंगे कि तू क्या कर रही है।"

"तो क्या करूँ?"

"एक तरफ़ लिख, दूसरी तरफ़ चुप।" उसने मेरी नोटबुक की तरफ़ इशारा किया। "नाम लिखती जा। गली लिखती जा। सब इकट्ठा कर। जिस दिन सब एक साथ बोलेगी, उस दिन कोई नहीं रोक पाएगा।"

मैंने गाड़ी में बैठकर ओटीटी वाली सोची… नहीं, मैंने उसे झटक दिया। मैंने नोटबुक खोली और तीनों घरों के नीचे एक नई लाइन जोड़ी। फिर मैंने अस्पताल के गेट से बाहर देखा। सड़क के उस पार एक चाय का ठेला लगा था, ठेले वाला चाय बना रहा था। उसके पीछे गली में एक औरत चली जा रही थी — सफ़ेद बाल, लाठी, वही औरत जो कल स्कूल के गेट पर खड़ी थी।

मैं गाड़ी से उतरी और उसकी तरफ़ चली।

वह मुड़ी। उसने मुझे देखा, फिर मुस्कुराई। "तू अब भी यहाँ है।"

"आप क्या चाहती हैं?"

"मैं कुछ नहीं चाहती। मैं तो बस देख रही हूँ। तेरी बेटी का कंधा कल साफ़ था। आज उस पर लिखा है।"

मेरे पैर जम गए। "क्या लिखा है?"

वह हँसी। हँसी में कोई मिठास नहीं थी। "अभी अधूरा है। पढ़ा नहीं जाता। पूरा हो जाए, तब बताऊँगी।" वह लाठी टेकती हुई आगे बढ़ गई।

मैंने उसके पीछे कदम बढ़ाया। "एक बात पूछूँ?"

वह रुकी, मुड़ी।

"आपने कहा था कि आपका नाम कभी लिखा ही नहीं गया। तो आपको कैसे पता है कि मेरी बेटी के कंधे पर क्या लिखा है?"

वह मेरे पास आई। इतनी पास कि उसके बालों की सफ़ेदी और झुर्रियों के बीच मुझे एक चमकती आँख दिखी। उसने धीरे से कहा, "जिसका नाम नहीं लिखा, वह सब पढ़ सकता है।" और चली गई।

मैं वहीं खड़ी रही। सूरज पूरा चढ़ आया था, गाड़ियाँ निकल रही थीं, अस्पताल के गेट पर मरीज़ों की भीड़ थी। मैं उस भीड़ में खड़ी एक औरत थी, हाथ में नोटबुक, जिसके आख़िरी पन्ने पर मेरी लिखाई नहीं थी।

मैंने नोटबुक खोली। उस पन्ने पर वह एक लाइन वहीं थी, और उसके नीचे रिया की लिखाई — "हम देखेंगे।"

मैंने उसके नीचे अपनी पेंसिल से लिखा — "और हम बोलेंगे।"

॥

उस औरत की लाठी की आवाज़ दूर तक सुनाई दे रही थी। मैं अस्पताल के गेट पर खड़ी रही, हाथ में नोटबुक, और सोचती रही कि "जिसका नाम नहीं लिखा, वह सब पढ़ सकता है" का मतलब क्या है। सूरज चढ़ रहा था और मरीज़ों की भीड़ बढ़ रही थी। मैंने नोटबुक बंद की और गाड़ी में बैठ गई।

दिन भर ड्यूटी में मेरा मन नहीं लगा। दो कॉल आए, दोनों साधारण — एक बूढ़े आदमी को सीढ़ी से गिरकर चोट लगी थी और एक बच्चे को तेज़ बुखार। मैंने दोनों को अस्पताल पहुँचाया, फॉर्म भरे, स्ट्रेचर धकेला। जब भी कोई मरीज़ अपना नाम बताता, मैं उसे नोटबुक में लिख लेती, बिना सोचे। आदत बन रही थी।

शाम को घर लौटी तो रिया आँगन में बैठी अपनी कॉपी पर शालिनी का नाम लिख रही थी। मैंने गिना — अब दस से ज़्यादा बार। वह ऊपर देखकर मुस्कुराई, पर उसकी आँखों में कुछ और था।

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