A Dark Secret328 / 536

A Dark Secret – Chapter 328

7 min read November 6, 2026

"वह यहीं है?"

"वह जहाँ नाम बोला जाता है, वहीं है।"

मैंने रिया को गले से लगाया। उसके कंधे पर मेरा हाथ था, और मैं उसके कान के पास बोलती रही, "तेरा नाम रिया जोशी है। तू मेरी बेटी है। तेरे बाल ऐसे हैं, तेरी हँसी ऐसी है, तू मुझे चिढ़ाती है। तू मेरी है।"

रिया ने मेरी शर्ट पकड़ ली और मुझमें मुँह छिपा लिया। कुछ देर हम ऐसे ही खड़े रहे।

जब मैंने आँखें खोलीं, तो सामने, बरामदे के आख़िर में, स्कूल के लोहे के गेट पर एक आदमी खड़ा था।

भैरों।

उसके हाथ में एक मोटी फाइल थी, और वह मुस्कुरा रहा था। वह मुस्कान ऐसी थी जैसे किसी ने अपना काम पूरा कर लिया हो। हवा में वह महक अब और तेज़ हो गई, और मुझे लगा जैसे मेरी शर्ट की जेब में रखा काग़ज़ खुद हिल रहा हो। मैंने अपना हाथ भैरों की तरफ़ कर दिया और अंदर ही अंदर कसम खाई — इस फाइल को मैं खुद खोलूँगी, और उसमें जो भी नाम हैं, सब को आवाज़ दूँगी।

॥

भैरों ने फाइल मेरी तरफ़ बढ़ा दी। मैंने उसे नहीं लिया। मैंने रिया का हाथ पकड़ा और उसे अपने पीछे किया, फिर गेट तक चलकर उसके सामने खड़ी हो गई।

"अंदर क्या है?"

वह मुस्कुराया। पहली बार उसने मुँह खोला। आवाज़ भारी थी, जैसे किसी लोहे के पाइप में हवा भर रही हो। "मैडम ने भेजा है। आपके घर पर।" उसने फाइल मेरे हाथ में रख दी और मुड़कर चल पड़ा। काली गाड़ी का दरवाज़ा खुला था। वह बैठा, इंजन चला, और गेट से बाहर निकल गया। वह पीछे मुड़कर नहीं देख गया।

रिया मेरी कमर के पीछे से निकली। "क्या है इसमें?"

"चल, घर चलकर देखेंगे।"

गाड़ी में बैठने से पहले मैंने एक बार स्कूल के बरामदे की तरफ़ देखा। दीवार पर टँगा चित्र वहीं था, दोनों लड़कियाँ हाथ पकड़े। नीला रंग अब भी गहरा था।

घर पहुँचकर मैंने फाइल खोली। रिया सामने बैठी थी, ठुड्डी हाथों पर टिकाए। फाइल के अंदर पहला काग़ज़ एक दाखिला-फॉर्म था। ऊपर स्कूल का नाम — ग्रीन पार्क फेज़ दो का नया पब्लिक स्कूल। फॉर्म में रिया का नाम, उसकी उम्र, कक्षा आठ, और नीचे फीस की जगह साफ़ लिखा था — पूरी छूट। हर साल के लिए। साथ में एक काग़ज़ और था, जिस पर मनोहर की सीधी लिखाई थी — "मैडम ने सोचा, बच्ची की पढ़ाई में रुकावट न हो। यह कोई एहसान नहीं, बस आपके हक़ का हिस्सा।"

मैंने वह काग़ज़ मेज़ पर रखा। फिर रिया की तरफ़ देखा।

वह पढ़ रही थी। उसकी नज़र फॉर्म पर चल रही थी, लाइन दर लाइन। पढ़कर उसने काग़ज़ नीचे रख दिया। कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "यह स्कूल अच्छा है?"

"क्या मतलब?"

"सुना है, ग्रीन पार्क का स्कूल अच्छा है। बड़ा कैंपस है। लैब है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे पता है यह किसकी तरफ़ से आया है, माँ। पर सोचने में क्या हर्ज है?"

मेरे हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। मैंने कप मेज़ पर रखा। "तू यह कह रही है?"

"मैं यह कह रही हूँ कि वह मेरी फीस माफ़ कर रही है, मेरा नाम उसके काग़ज़ पर है, तो यह स्कूल भी उसी काग़ज़ का हिस्सा है। फ़र्क़ क्या पड़ता है? मैं तो पढ़ने जा रही हूँ।"

"रिया।" मेरी आवाज़ वही थी जो मैं चाहती हूँ कि न हो। "यह स्कूल तोहफ़ा नहीं है। यह एक दरवाज़ा है।"

"कौन सा दरवाज़ा?"

"वह दरवाज़ा जो बंद हो रहा है। मेरे पास एक रास्ता है — तेरा नाम बोलना, तेरा नाम याद रखना। और उनके पास एक रास्ता है — तुझे मुझसे अलग करना। यह फॉर्म इसीलिए आया है कि मैं सोचूँ, सब ठीक है, बच्ची की पढ़ाई तो चल रही है। और जिस दिन मैं सोच लूँ कि सब ठीक है, उस दिन मैं लड़ना बंद कर दूँ।"

रिया ने मुँह बनाया। "मैंने कब कहा कि तुम लड़ना बंद करो?"

"तूने नहीं कहा। तूने कहा कि सोचने में हर्ज नहीं। हर्ज है। हर चीज़ में हर्ज है।"

वह उठकर बर्तन धोने लगी। पानी का शोर बीच में आ गया। मैंने देखा वह अपनी आँखें रगड़ रही थी, पर मुँह से कुछ नहीं बोली।

मैंने वह फॉर्म उठाया और उसे डैशबोर्ड पर रखा जहाँ रामदीन की पीली पुड़िया रखी थी। फिर मैंने रामदीन को फोन किया।

चार बार की घंटी के बाद उसने फोन उठाया। पीछे से सड़क की आवाज़ आ रही थी।

"चाचा, मुझे कुछ पूछना है। जब कोई घर खाली हो जाता है, तो बाहर का नाम-पट्टा कौन उतारता है?"

वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "तू क्यों पूछ रही है?"

"क्योंकि आज फाइल में एक फॉर्म आया है और मुझे लगता है अब वे चुपचाप गलियों में काम कर रहे हैं।"

"तो जा।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "रात में जा। दिन में वे पोंछ देते हैं। रात में निशान पकड़ में आते हैं। पर मीरा — अकेली मत जाना।"

"मेरे पास रिया है।"

"रिया को साथ मत ले जाना। इस बार नहीं।"

मैंने फोन रखा। रिया का सवाल साफ़ था कि माँ कहाँ जा रही है। मैंने कहा, "अस्पताल। रात की ड्यूटी।" उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर भी बोली नहीं। मुझे पता था वह जानती थी कि मैं झूठ बोल रही हूँ, पर उसने झगड़ा नहीं किया। शायद इसलिए कि वह भी अपने सवालों के जवाब ढूँढ रही थी।

मैं रात नौ बजे निकली। एम्बुलेंस में अकेली थी। डैशबोर्ड पर रिया की तस्वीर, पीली पुड़िया, और अब वह फॉर्म भी रखा था। शांति विहार फेज़ एक की सड़कें आधी बनी थीं। कहीं सीमेंट के बोरे पड़े थे, कहीं सड़क खत्म होकर मिट्टी शुरू। नई कॉलोनी की हवा में धूल थी और कुछ घरों में बिजली की लाल बत्ती जल रही थी।

मैंने गाड़ी धीमी कर दी। मेरी जेब में छोटी नोटबुक थी और डैशबोर्ड पर वही पेंसिल जो हमेशा रहती है। पहला घर आया। ब्लॉक नौ। दरवाज़े के ऊपर लोहे का बोर्ड लगा था, पर कोई नाम नहीं। सिर्फ़ चार कीलें, और उनके नीचे प्लास्टर का टूटा हिस्सा। मैंने गाड़ी से उतरकर देखा। कीलों में ज़ंग नहीं थी। प्लास्टर अंदर से चिकना था, जैसे कल-परसों ही कोई चीज़ उखाड़ी गई हो।

मैंने नोटबुक निकाली। पन्ने के ऊपर लिखा — "ब्लॉक नौ, शांति विहार फेज़ एक, नाम नहीं।" फिर सोचकर नीचे जोड़ा — "कीलें ताज़ा।"

दूसरा घर। ब्लॉक दस। यहाँ बोर्ड टूटा हुआ था, आधा टँगा था, आधा लटक रहा था। उस पर सिर्फ़ एक अक्षर बचा था। मैंने आँखें सिकोड़कर देखा — कुछ समझ नहीं आया। पत्ते सूख चुके थे, आँगन में धूल जमी थी। पर मुझे वह घर जाना-पहचाना लगा। मैंने नोटबुक में लिखा — "ब्लॉक दस, बोर्ड आधा टूटा। एक अक्षर बाकी।"

तीसरा घर — ब्लॉक ग्यारह। यहाँ दरवाज़े पर ताला नहीं था, दरवाज़ा टेके हुए था। दरवाज़े के बगल की दीवार पर स्याही का हल्का निशान था, और उसी जगह से प्लास्टर छीला गया था — जैसे कोई चीज़ जल्दी में पोंछी गई हो। मैंने उँगली लगाई। चिकना। मुझे अपनी उँगली पर वही गोंद जैसी महक आई।

मैंने नोटबुक में लिखा — "ब्लॉक ग्यारह, स्याही का निशान, पोंछा गया।" और नीचे जोड़ा — "पर पोंछने वाला देर से आया। निशान अभी गीला है।"

मैं गाड़ी में लौटी और चौथे घर की तरफ़ चली। यह सबसे आख़िरी मकान था, ब्लॉक बारह। बद्री प्रसाद का मकान। यहाँ एक हफ़्ते पहले मैंने उसका नाम बोलकर उसे वापस दिया था। आज दरवाज़े पर ताला नहीं था, दरवाज़ा बंद था। बाहर नाम-पट्टा नहीं था, पर जहाँ पट्टा लगा था उस जगह दो साफ़ सफ़ेद धब्बे थे जहाँ प्लास्टर नया पड़ा था।

मैं गाड़ी से उतरी। हाथ में नोटबुक थी। मैं उस जगह के पास झुकी, धब्बे देखने के लिए, और नोटबुक में लिखने के लिए पन्ना उलटा। जैसे ही मेरी उँगली पन्ने पर पड़ी, वह पन्ना मेरे नीचे से खिसक गया। एक पल के लिए मुझे लगा हवा चली। पर आस-पास के सूखे पत्ते भी नहीं हिले।

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