A Dark Secret – Chapter 327
मैंने गाड़ी फिर से चलाई। "रिया, एक बात सुन।" मेरी आवाज़ अपने ही कानों में सूखी लगी। "अगर मैं कोई नाम भूल जाऊँ — मेरा मतलब, अगर मैं तुझे कभी न पहचानूँ, या तेरा नाम न बोल पाऊँ —"
"माँ।"
"सुन तो ले।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "इस स्कूल में, इस शहर में, कुछ नाम मिट रहे हैं। कुछ लोग हैं जो चाहते हैं कि मेरा नाम भी मिट जाए। पर जब मैं तुम्हारा नाम बोलूँ — रिया, तुम मुझे हर बार बोलती रहना। तुम मेरी आवाज़ याद रखना।"
रिया मेरी तरफ़ देखने लगी। उसकी आँखों में वह सवाल था जो उसने पहली बार पूछा था — माँ, हम भाग क्यों नहीं जाते? — और उसके बाद जो दूसरा सवाल था — भागने से नाम मिटता है क्या?
"माँ," उसने कहा, और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। "तेरी आवाज़ मैं भूल जाऊँगी क्या?"
"नहीं।"
"तो फिर तेरा नाम मैं बोलूँगी।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। मैंने कहा, "और मैं जब तक बोलती रहूँगी, तब तक तेरा नाम — रिया जोशी — दोनों हाथों से पकड़े रहूँगी।"
वह हँसी, हल्की-सी, थोड़ी नम। और उसी हँसी के साथ मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई।
पर कुछ दूर जाकर मेरी नज़र बैक मिरर पर पड़ी।
स्कूल के गेट के पास एक छाया खड़ी थी। नई नहीं — मैंने उसे पहले देखा था। बुढ़िया, सफ़ेद बाल, हाथ में लाठी। वही जो चौराहे पर गाड़ी रोककर मुझे इस महीने की तीसरी औरत बता गई थी। वह अब भी वहीं खड़ी थी, स्कूल के गेट। पर वह मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी। वह रिया की खिड़की की तरफ़ देख रही थी, जैसे उसके कंधे पर कोई नाम लिखा हो जो सिर्फ़ वह पढ़ सकती हो।
मैंने गाड़ी तेज़ की।
अस्पताल की पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके मैंने एक बार फिर वह फाइल खोली। उस आख़िरी कतार को गौर से देखा जहाँ मेरा नाम था। मेरे नाम के नीचे जो अधूरा अक्षर था, वह इस बार थोड़ा और पूरा लग रहा था। मैंने उँगली उस पर रखी, और वह स्याही मेरी उँगली से चिपक गई।
रिया ने मेरी तरफ़ देखा और पूछा, "यह क्या लिखा है?"
मैंने फाइल बंद कर दी। "अभी कुछ नहीं," मैंने कहा। "अभी तो बस दो अक्षर हैं।"
पर मैंने उस आधे अक्षर की शक्ल पहचान ली थी। वह 'रि' था। और मैं जानती थी कि वह अगले चौबीस घंटे में पूरा हो जाएगा।
मैंने फाइल को डैशबोर्ड पर रख दिया और गाड़ी से उतर गई। रिया पीछे-पीछे आई। अस्पताल के गलियारे में पैर रखते ही मुझे वह महक फिर से आई — स्याही और गोंद। यह अब मेरे कपड़ों से नहीं, मेरी सांस से आ रही थी।
रामदीन बेंच पर बैठा था, पर आज उसके हाथ खाली नहीं थे। उसकी गोद में एक पुराना डिब्बा था, लकड़ी का, जिसका रंग ऐसा था जैसे उसे सालों तक छुआ न गया हो।
"बैठ," उसने कहा, मेरी तरफ़ देखे बिना।
मैं बैठ गई। रिया बेंच के दूसरे सिरे पर खड़ी रही।
"तूने फिर लिखा ना," रामदीन ने कहा।
"हाँ।" मैंने काग़ज़ निकाला। "और मुझे महक आई। पहले दफ़ा नहीं, दूसरे दफ़ा ज़्यादा।"
रामदीन ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। उसका हाथ डिब्बे की ढक्कन पर टिक गया। "अभी भी पढ़ा जा सकता है," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद से बोल रहा हो। "जब पढ़ा जाता है, तब वह ज़िंदा है।" फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। "मीरा, मैं तुझे उस औरत के बारे में बताता हूँ जिसका नाम कभी बोला नहीं गया। पर बताने से पहले — तू मुझे सच बता, तूने उसका नाम लिखा था? वह औरत जो तेरे पीछे पूरे शहर में घूम रही है, वह कौन है?"
मैं चुप रही।
रामदीन ने डिब्बा खोला। अंदर एक पुरानी तस्वीर थी — सफ़ेद-काले रंग में, चार औरतें, एक बेंच पर बैठी। तीन औरतों के चेहरे साफ़ थे। चौथी के चेहरे पर किसी ने कुछ लिख दिया था — गीली स्याही से, जिससे चेहरा ही पढ़ा नहीं जा रहा था।
"ये चारों औरतें पहले घर में रहती थीं, शांति विहार। जिस घर में पहली बार दीवारें बनीं, पहली ईंट रखी गई। उनमें से तीन नाम बदलकर भाग गईं। ये चौथी — यह बरसों तक उसी घर में रही, हर रात नाम लिखती रही, और जो नाम लिखती, वह उससे दूर नहीं जा पाता।"
"पर वह मर गई?" मैंने पूछा।
"मरी तो नहीं, पर ज़िंदा भी नहीं। उसका नाम सबने मिलकर मिटा दिया। जब उसका नाम मिटा, उसे रहने की जगह छोड़नी पड़ी। इसलिए वह अब नामों में रहती है। वह बस इतना कर रही है — कोई एक और नाम उठाकर अपना सिर खोलती रहती है।"
मेरा गला सूख गया। "जैसे मेरा नाम।"
"जैसे तेरा नाम।" रामदीन ने डिब्बा बंद कर दिया। "पर सुन, तेरे पास एक बात है जो उस औरत के पास नहीं है। तेरे पास रिया है। तेरी आवाज़ है। वह औरत इसलिए हारी थी क्योंकि उसे उसका नाम कोई नहीं बुलाता था।"
तभी रिया का फोन बजा। उसने उठाकर बात की, और उसका चेहरा बदल गया। "माँ, स्कूल से मैडम का फोन। वे कहती हैं शालिनी की कुर्सी आज खाली है। और मैडम कह रही हैं कि ऐसी कोई पूरी बच्ची एडमिशन में ही नहीं थी।"
मैं उठ खड़ी हुई।
हम स्कूल पहुँचे तो बाहर दोपहर की धूप में एक सफ़ेद स्कॉर्ट और मैरून स्वेटर पहने बच्ची का बैग पड़ा था। रिया ने उसे देखकर कहा, "यह शालिनी का बैग है। यह इसी जगह रहता है।"
क्लासरूम के बाहर मैडम खड़ी थीं। उन्होंने हाज़िरी की कॉपी दिखाई। मैंने पन्ना पलटा। पिछले हफ़्ते तक होने वाली हर कतार में नाम थे, पर जहाँ शालिनी का नाम होना था — वहाँ सफ़ा था। खाली नहीं, जैसे वहाँ से कुछ मिटाया गया हो और ऊपर कुछ न लिखा गया हो। मैंने उँगली उस जगह पर फेरी तो काग़ज़ थोड़ा चिकना लगा, जैसे ऊपर से कोई तरल चीज़ पोंछी गई हो।
"लेकिन वह रोज़ आती थी," रिया ने कहा। उसकी आवाज़ तेज़ हो गई। "मैंने उसके साथ खाना खाया, टिफ़िन बाँटा, झगड़ा किया।" उसने मैडम की तरफ़ देखा। "वह मेरी दोस्त थी।"
मैडम ने सिर झुकाया। "बेटा, मुझे भी याद है कोई बच्ची थी। पर काग़ज़ पर नहीं है, और जो काग़ज़ पर नहीं, वह स्कूल में नहीं।"
रिया ने वहाँ रहकर रोना नहीं चुना। वह बाहर निकल आई। मैं उसके पीछे गई। हम खाली क्लासरूम के बरामदे में खड़े थे, जहाँ सफ़ेद दीवार पर बच्चों के बनाए चित्र टंगे थे। रिया ने उनमें एक तस्वीर की तरफ़ इशारा किया — दो लड़कियाँ, हाथ पकड़े हुए। उनके नीचे नीले रंग से लिखा था — रिया और शा।
रिया ने अपना बैग खोला और उसमें से एक पुरानी टिफ़िन निकाली। "यह उसकी थी। मैंने उसे दिया था, वह भूल गई थी।" उसने टिफ़िन खोला। अंदर सूखी रोटी और अचार था। अचार का तेल अब भी चिकना था।
"माँ," रिया ने कहा। उसकी आवाज़ पहली बार टूटी। "मैं उसे भूलने लगी हूँ।"
मैंने उसे अपने से चिपका लिया। उसका सिर मेरे कंधे पर था।
"आज सुबह मैं उसका चेहरा सोच रही थी, माँ। मुझे याद नहीं आया। सिर्फ़ नाम याद था। और अब नाम भी ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने छीन लिया।"
मैंने उसके बालों पर हाथ फेरा। "तू उसे भूल रही है क्योंकि वह खुद मिट रही है। भूलने वाली तू नहीं है।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"तू बस उसका नाम बोलती रह। नाम बोलने से नाम मज़बूत होता है।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से कहा, "शालिनी।"
दीवार पर बनी तस्वीर का नीला रंग एक पल के लिए गहरा हो गया, जैसे किसी ने उसे अभी-अभी भरा हो। रिया ने फिर कहा, "शालिनी।"
और बरामदे के कोने से एक हल्की-सी आवाज़ आई, जैसे किसी बच्ची ने अपनी सांस रोककर कहा हो — "हाँ?"
रिया का हाथ मेरी बाँह पर कस गया।
मैंने उस आवाज़ की तरफ़ देखा, पर वहाँ कोई नहीं था। बस हवा में कुछ देर तक वह महक रही — स्याही और गोंद।
"तूने सुना?" रिया ने फुसफुसाया।
"हाँ।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno