A Dark Secret326 / 536

A Dark Secret – Chapter 326

7 min read November 6, 2026

"वह औरत कौन थी?"

"वही, जिसका नाम कभी बोला नहीं गया," रामदीन ने कहा। "मैंने उसे हवेली की तस्वीरों में देखा है।"

"बाबू हरनाम की…?"

"मैंने कहा न, नाम कभी नहीं बोला। मत पूछ।" उसने मेरे काग़ज़ को फिर जेब से निकाला और उसे अपनी उंगली से सहलाया। "यह पन्ना जिसने भेजा है, वह जानता है कि तू क्या ढूँढ रही है। और यह जानना खुद ख़तरे की बात है।"

मेरा फोन बजा। रिया।

"माँ, स्कूल में शालिनी की कुर्सी खाली है। मैडम कह रही हैं कि ऐसी कोई बच्ची एडमिशन में ही नहीं थी। मैंने कहा उसका नाम लिस्ट में था, तो मैडम मुझे ऐसे देख रही हैं जैसे मैं झूठ बोल रही हूँ।"

मैंने गाड़ी स्टार्ट की। रामदीन मेरी तरफ़ देखने लगा।

"तीसरा नाम," मैंने कहा। "आज सुबह।"

"तीसरे को जाने दे।"

"क्यों?"

"क्योंकि तीसरा सबसे पहले जाता है।" उसने मेरी गाड़ी के डैशबोर्ड पर पड़ी पीली पुड़िया की तरफ़ देखा। "जब एक नाम जाता है तो वह दीवार पर तीन दिन लिखा दिखता है। चौथे दिन वह उस घर के लोगों के अंदर से निकल जाता है — बेटी भूलती है, पड़ोसी भूलता है। तेरी बेटी ने सबसे पहले भूला। यही असली सफ़ाई है।"

"तो अब?"

"तो अब तेरी बेटी को तेरे हाथ की ज़रूरत है, मेरे मुँह के नहीं।" वह उठ खड़ा हुआ, पहली बार आज। "जा।"

मैं स्कूल पहुँची तो रिया गेट के अंदर छज्जे के नीचे खड़ी थी, बैग बगल में। उसकी आँखें लाल थीं, पर वह रो नहीं रही थी। वह कक्षा की हाज़िरी की कॉपी हाथ में लिए थी।

"माँ, देख," उसने कहा, और कॉपी खोली। यह सब्ज़ रंग का पन्ना था, जिस पर नामों की कुछ कतारें थीं। "यहाँ," उसने उँगली रखी। वहाँ एक ख़ाली जगह थी जहाँ नाम होना चाहिए था, पर रबर से मिटाया नहीं गया था — वह जगह साफ़ सफ़ेद थी, दूसरे नामों से भी ज़्यादा साफ़। "देखो, यहाँ शालिनी था। सोलह से ऊपर। दो महीने।"

"अब?"

"अब कुछ नहीं। और मैंने मैडम से पूछा कि यह रोल नंबर किसका है, तो उन्होंने कहा 'वह दिल्ली चली गई होगी।' माँ, इस क्लास में कोई नहीं जाता। हमारे स्कूल से कोई दिल्ली नहीं जाता।"

मैंने उसकी डेस्क-टीचर मिसेज़ देसाई को ढूँढा। वह स्टाफ़ रूम में बैठी थी, चश्मे के ऊपर से मेरी तरफ़ देख रही थी।

"मीरा जी, आपकी बेटी कुछ ठीक नहीं लग रही है। दो दिन से वह एक बच्ची का नाम ले रही है।"

"उस बच्ची का नाम हाज़िरी में था।"

"हमारी हाज़िरी में सिर्फ़ वे नाम होते हैं जो हमें विद्यालय ने दिए।" उसने चश्मा उतार दिया। "और मैंने अपनी सूची में देखा है। वहाँ ऐसी कोई छात्रा नहीं है।"

मैं स्टाफ़ रूम से बाहर आई। रिया अब गेट के पास चली गई थी। वह अपने बैग को सीने से लगाए खड़ी थी।

"माँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पतली थी। "मैं अभी ज़ोर लगा रही हूँ। उसका चेहरा। मुझे याद है, पर टूट रहा है। जैसे किसी ने फोटो को धूप में रख दिया हो। मैं जब उसका नाम बोल रही हूँ तो मुझे कुछ महसूस हो रहा है — हाथ में कुछ गरम-सा — पर नाम बोलते ही मुझे लग रहा है कि मैं किसी और बच्ची का नाम बोल रही हूँ।"

मैंने उसके कंधे पकड़े। "रिया, मेरी तरफ़ देख।"

वह मेरी तरफ़ देखने लगी, और तब पहली बार उसने खुद को मेरे सीने से लगा दिया। उसके शरीर की हड्डियाँ मेरी बाहों में महसूस हो रही थीं।

"माँ, मैं उसे भूलने लगी हूँ।"

मैंने उसका सिर सहलाया। मैंने उससे वह बात नहीं कही जो रामदीन ने कही थी — कि तीसरा नाम सबसे पहले जाता है। मैंने बस उसका हाथ पकड़ा और गाड़ी की तरफ़ चलाई।

तभी मेरी नज़र स्कूल के गेट के बाहर सड़क के उस पार पड़ी। एक काली गाड़ी खड़ी थी, और उसके बोनट पर बैठा था भैरों। वह एक फाइल हाथ में लिए बैठा था, फाइल खुली नहीं थी, और हमारी तरफ़ देख रहा था। उसके चेहरे पर कुछ था जो मैंने आज तक उस पर नहीं देखा — मुस्कान। बहुत हल्की, बहुत स्थिर।

मैं रुक गई।

"रिया, गाड़ी में बैठ।"

"माँ—"

"गाड़ी में बैठ।"

वह बैठ गई। मैंने दरवाज़ा बंद किया और सड़क पार करके उसकी तरफ़ गई। मैंने उससे चार फुट दूर जाकर बात की।

"क्या चाहिए?"

उसने फाइल उठाई। "मैडम ने कहा था कि तुम्हें यह देना।" उसकी आवाज़ भारी थी। "कह रही थीं कि तुम्हारी मुलाक़ात शाम सात बजे है, पर यह याद रखना कि तुम्हारा नाम अभी तय नहीं। जो नाम तय नहीं वह बोला नहीं जाता। और जो बोला नहीं जाता, उसकी रक्षा होती है।"

"मैंने कहा था मुझे—"

"और उन्होंने कहा कि यह फाइल तुम्हारे पास से नहीं है। इसे उसने दिया है जो तुम्हारा नाम वापस चाहता है।"

मैंने फाइल ली। उसका रंग हल्का पीला था, कोने फटे हुए थे, और उस पर कोई नाम नहीं लिखा था। मैंने उसे वहीं, उसके सामने खोला। अंदर एक काग़ज़ था, और उस पर कुछ नामों की कतारें थीं — सब मिटी हुईं, सब धुँधली, सिर्फ़ उनकी जगह का हिसाब बाकी। और उन सबके नीचे, अंतिम कतार में, ताज़ी स्याही से — मेरा नाम। 'मीरा जोशी'। और उसके बगल में एक आधी लिखी कतार, जिसमें सिर्फ़ अक्षर शुरू था।

वह चला गया। मैं गाड़ी में लौटी और फाइल अपनी गोद में रखकर बैठ गई।

"क्या है, माँ?" रिया ने पूछा।

"रिया, एक काम कर।" मैंने गाड़ी स्टार्ट की। "तू मेरी नोटबुक ले और मुझे उसमें वह नाम बोल जो हमने बद्री प्रसाद वाले पन्ने पर लिखा था।"

"कौन सा?"

"रीना नायक। शांति विहार फेज़ दो।"

वह देर तक देखती रही। "माँ, मुझे याद नहीं।"

मेरा पैर ब्रेक पर चला गया।

"क्या?"

"मैंने देखा था तेरे पास। पर अब देखने पर भी नाम ऐसा लग रहा है जैसे कोई परिचित नाम हो, जो मैंने कहीं सुना हो।" वह डर गई थी। "मैंने यह नाम पढ़ा था? या मैं सोच रही हूँ कि पढ़ा था?"

मैंने गाड़ी रोकी। मैंने नोटबुक उसके हाथ से ली और खोली। वह पन्ना, जिस पर रीना नायक की लाइन थी, अब धुँधला था। और उसके ऊपर बद्री प्रसाद वाली लाइन भी हल्की पड़ रही थी। मेरे अपने हाथ की लिखाई जैसे पानी से फैल गई हो।

"मैंने वह नाम आज ही लिया था," रिया ने धीरे से कहा।

मैंने नोटबुक बंद की। रामदीन की बात याद आई — जो नाम लिखा जाता है वह घर नहीं छोड़ता। मैंने लिखा, और लिखने की यह कीमत थी? रिया ने एक काग़ज़ पर एक मरती हुई बच्ची का नाम लिखा था, और नाम चलता फिरता था, एक हाथ से दूसरे हाथ में।

मैंने नोटबुक वापस खोली और उसने अपनी जेब से एक पेंसिल निकाली। मैंने रिया के हाथ में पेंसिल पकड़ाई और अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।

"फिर से लिख।"

"माँ, वह मिट रहा है।"

"मैं जानती हूँ। फिर से लिख। अब मैं तेरी आवाज़ सुन रही हूँ। तू नाम बोलती रह, मैं लिखती रहूँगी। हम दोनों मिलकर इसे ज़िंदा रखेंगे।"

उसने नाम लिखा — रीना नायक, शांति विहार फेज़ दो, गली सात। और उसके नीचे मैंने अपने हाथ से लिखा — आवाज़: अधूरी। जिस पल रिया ने पेंसिल हटाई, उस पल पूरी गाड़ी में एक महक फैल गई। थोड़ी फँसी हुई, थोड़ी मीठी — स्याही और गोंद की महक। रिया ने नाक सिकोड़ी। "माँ, यहाँ से क्या बदबू आ रही है?"

मैंने अगला सांस रोक लिया। यह वही महक थी। मैंने अपनी शर्ट के कॉलर की तरफ़ देखा, जहाँ सुबह मैंने चाय गिराई थी — वहाँ कुछ नहीं था। मैंने फिर से लिखा, और महक बढ़ गई।

"यह स्याही की महक है," मैंने कहा।

"यह तो तेरे नोटबुक से आ रही है," रिया ने कहा।

मैंने काग़ज़ के फाइल को देखा, उस काग़ज़ को देखा जो भैरों देकर गया था — उसका कोना मेरी उँगली से चिपक रहा था, जैसे कोई इसे आज ही लिखकर भेजा हो।

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