A Dark Secret – Chapter 325
उसकी आवाज़ में वह चीज़ थी जो मैंने रामदीन में सुनी थी — डर नहीं, थकान।
"मैं तुम्हारे साथ चलूँगी," मैंने कहा। "पर पहले एक काम है। एक नाम पीछे लौटाना है। बद्री प्रसाद। तुम उसे जानते हो?"
बाबूलाल ने देखा, और फिर उसकी आँखों में कुछ चमका। "बद्री? बद्री तो इमरजेंसी के बाहर धूप में बैठा है," उसने कहा। "पिछले एक घंटे से। किसी को नहीं पहचान रहा।"
हम तीनों चले। इमरजेंसी के बाहर की बेंच पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था, धूप में, चादर ओढ़े। उसका सिर झुका था। उसके बगल में एक औरत बैठी थी जो उसे घूर रही थी — जैसे कोई जान-पहचान वाला हो पर नाम याद न आ रहा हो।
मैं उसके सामने खड़ी हुई।
"बद्री प्रसाद।"
वह नहीं हिला।
मैंने आवाज़ थोड़ी तेज़ की। "बद्री प्रसाद। शांति विहार फेज़ एक, ब्लॉक बारह।"
उसके कंधे हिले। उसने सिर उठाया। उसकी आँखें धुँधली थीं, जैसे किसी ने उन पर पर्दा डाल दिया हो।
"मैं तुम्हारी आवाज़ जानती हूँ," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ उतारी — वही जो मैं दस साल से मरीज़ों से बोलती हूँ, वही धीमी, रुकी हुई। "तुम चाय पीते हो धीरे-धीरे, और कहते हो — 'भईया बुरा मत मानना, बचा लेते हैं।'"
उसका मुँह खुला। उसने अपने होंठ हिलाए, जैसे कुछ कहना चाहता हो, और फिर उसकी आँखें भर आईं।
"बद्री प्रसाद," वह फुसफुसाया। "बद्री प्रसाद। मैं… मैं बद्री प्रसाद हूँ।"
बगल में बैठी औरत अचानक उठ खड़ी हुई। "बद्री!" वह चिल्लाई, और फिर अपना मुँह ढक लिया। "तुम कहाँ थे? मैं तुम्हें ढूँढ रही हूँ और तुम्हें याद कर नहीं पा रही थी।" वह रोने लगी। बद्री ने उसका हाथ पकड़ा।
मैं पीछे हटी।
बाबूलाल मेरी तरफ़ देख रहा था। उसकी आँखों में कुछ सवाल था। रामदीन मुस्कुरा रहा था — पहली बार।
"यह हो गया," रामदीन ने कहा।
"यह तो महज़ एक नाम था," मैंने कहा। "और मुझे औरतों के नाम चाहिए। वे औरतें जो गईं — निशा वर्मा, रीना नायक, सुनीता चौहान, कमला, गीता।"
"तो शुरू कर," रामदीन ने कहा। "पर एक बात — हर नाम के साथ गली और आवाज़। तीनों। बद्री तो आसान था — वह यहीं था। बाकी…"
वह रुका।
"बाकी?" मैंने पूछा।
"बाकी उन जगहों पर बोलने होंगे जहाँ वे रहती थीं," उसने कहा। "और शालिनी की माँ के लिए तो शालिनी को भी साथ ले जाना पड़ेगा। सिर्फ़ तेरे बोलने से नहीं होगा। किसी का अपना भी याद करना ज़रूरी है।"
मैंने अपनी नोटबुक निकाली और उसी पन्ने पर, जहाँ बद्री प्रसाद का नाम लिखा था, एक काली लकीर खींच दी। पहला नाम वापस।
तभी गेट पर एक गाड़ी रुकी। काली, चमकदार। मैंने देखा — मनोहर उतर रहा था, हाथ में फाइल। वह सीधा मेरे पास आया।
"मीरा जी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वही शिष्टाचार था। "काजल मैडम ने याद किया है। कह रही हैं कि हवेली में जो कुछ हुआ, उस पर बात होनी चाहिए। और कह रही हैं कि रजिस्टर उन्होंने नहीं लिया।"
"किसने लिया?"
"वह खुद ढूँढ रही हैं।"
"और उन्हें मुझसे क्या चाहिए?"
वह मुस्कुराया। "एक नाम। आपका।"
मैंने उसकी फाइल देखी। वह खुली नहीं थी, पर कवर पर एक पुरानी सील थी — पीले रंग की मोम, जैसे पुराने काग़ज़ात पर लगती है।
"क्यों?"
"क्योंकि मैडम कह रही हैं कि अगर आप अपना नाम उन्हें दे दें और शहर छोड़ दें, तो वह रजिस्टर आपको लौटा देंगी।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "रजिस्टर उनके पास है।"
"नहीं है।"
"तो वह किसी के पास है।"
"हाँ।"
"किसके पास?"
वह रुका, और उसकी आँखें रामदीन की तरफ़ गईं। "यह मैडम बताएँगी। आज शाम सात बजे, हवेली।" वह मुड़ा और चला गया।
बाबूलाल ने उसके जाने के बाद थूक दिया। "यह आदमी हर नाम का हिसाब रखता है," उसने कहा। "तीस साल से। मैंने इसकी गाड़ी में एक बार झाँका था — पीछे बैठक के नीचे काग़ज़ों के बंडल हैं। सारे पुराने।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा।
"आज शाम सात बजे," मैंने कहा।
"मैं साथ नहीं जा सकता," रामदीन ने धीरे से कहा। "आज मुझे यह भी याद नहीं कि मैंने सुबह क्या खाया।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। "तो मैं तुम्हें याद दिलाऊँगी। रामदीन कुमार जोशी।"
"और मैं तेरे लिए?" उसने कहा।
"चाचा," मैंने कहा, "मेरी फ़िक्र मत करो। मैं तीन बार नाम लिखने वाली हूँ।"
मैं गाड़ी में बैठी। नोटबुक खोली। बद्री प्रसाद की लकीर के नीचे एक नई लाइन जोड़ी — रीना नायक। शांति विहार फेज़ दो, गली सात। और आवाज़… मुझे उसकी आवाज़ नहीं पता थी।
मैंने गाड़ी स्टार्ट की और शालिनी के घर की तरफ़ मोड़ी। आवाज़ पता करनी थी, चाहे कुछ भी हो।
फोन बजा। रिया।
"माँ, दरवाज़े पर कोई आया था। बोल रहा था कि वह काजल दीदी का आदमी है। मैंने नहीं खोला।"
"ठीक किया।"
"पर माँ, उसने रोटी वाला काग़ज़ दरवाज़े के नीचे से सरका दिया। उस पर लिखा है — 'तुम्हारा नाम उस काग़ज़ पर है जो तुम्हारी माँ ने ड्यूटी रजिस्टर में छोड़ा था। देख लो।'"
मेरा हाथ स्टीयरिंग पर जम गया।
ड्यूटी रजिस्टर। वह पन्ना जो मैंने कल रात चड्ढा जी को दिया था। जिस पर मेरी माँ की लिखाई थी।
"रिया," मैंने कहा, "वह रजिस्टर अब मेरे पास नहीं है। वह चड्ढा जी के केबिन में है।"
"तो फिर वहां से कौन ले गया?" रिया ने पूछा, और उसकी आवाज़ में सवाल था, डर नहीं।
मैंने आँखें बंद कीं।
"रिया, दरवाज़ा बंद रखो। मैं अस्पताल लौट रही हूँ।"
मैंने गाड़ी का रुख़ अस्पताल की तरफ़ मोड़ा, और स्टीयरिंग पर मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं — क्योंकि अगर वह पन्ना चड्ढा जी के केबिन से गया था, तो वहां से गुज़रने वाले हर इंसान का नाम अब उस गायब करने वाले की जेब में था। और उनमें सबसे ऊपर मेरा नाम था।
॥
अस्पताल के गेट के बाहर बेंच पर रामदीन बैठा था, पर आज वह अकेला नहीं था। उसके पास एक और बूढ़ा बैठा था, जिसके हाथ में एक लकड़ी की छड़ी थी और वह छड़ी से ज़मीन पर कुछ लिख रहा था। मैंने गाड़ी रोकी, उतरी, और काग़ज़ सीधे रामदीन के हाथ में रख दिया।
"यह क्या है?"
वह काग़ज़ को देखता रहा, पलटा, सूँघा। फिर उसका हाथ रुक गया। उसने उसे अपनी जैकेट की जेब में डाल लिया और उसका चेहरा वैसा हो गया जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा — वह अपनी कुर्सी से थोड़ा सरक गया, जैसे कुछ दूर जाना चाहता हो।
"कहाँ से आया?" उसकी आवाज़ खुरदरी थी।
"किसी ने मेरे घर के दरवाज़े के नीचे से सरकाया। कह रहा था कि यह उस काग़ज़ पर है जो मेरी माँ ने ड्यूटी रजिस्टर में छोड़ा था।"
रामदीन ने आसमान की तरफ़ देखा, फिर अपने साथी की तरफ़, जो छड़ी से ज़मीन खुरच रहा था।
"यह वही स्याही है," उसने कहा। "चालीस साल पहले मैंने यह स्याही पहली बार शांति विहार की ज़मीन पर देखी थी। रात में लोगों के घरों के बाहर दरवाज़ों पर, नाम-पट्टों के नीचे यही लिखाई उभरती थी। गीली, चमकदार। और जिस घर के बाहर यह लिखा जाता था, उस घर का आदमी फिर कभी वहाँ से नहीं हटता था — बाहर नहीं जाता, कोई सफ़र नहीं, कोई नई नौकरी नहीं। वह उस घर में बैठ जाता था, जैसे चीज़ हो।"
"तुमने यह किसको लिखते देखा?"
"कभी किसी को लिखते नहीं देखा। सुबह जाकर मिलता — बस स्याही।" उसने रुककर मेरे हाथ की तरफ़ देखा। "पर एक बात मैंने देखी थी। जब उन नामों का कोई हिसाब बिगड़ता था, तो पीतल गली के मकान नंबर पाँच में एक औरत के पास एक कटोरी रखी मिलती थी। काली स्याही, गोंद की तरह चिपचिपी। उसके बाल कटे हुए थे, उम्र पचास के आसपास, और वह किसी से बात नहीं करती थी।"
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