A Dark Secret – Chapter 324
फोन कटा। मैंने गाड़ी स्टार्ट की।
शांति विहार फेज़ एक — वह हिस्सा जो अब भी आधा बना हुआ है। कुछ घरों में लोग रहते हैं, बाकी में सिर्फ़ दरवाज़े लगे हैं। ब्लॉक बारह के सामने मैंने गाड़ी रोकी। एक सफ़ेद मकान — दरवाज़े पर ताला नहीं, पर दरवाज़ा अंदर से बंद। खिड़कियाँ बंद। मकान के बाहर नाम-पट्टा नहीं था — बस दो कीलें और उनके नीचे रंग का हल्का निशान।
पड़ोस के घर से एक आदमी बाहर आया। चालीस-पचास का, लुंगी में, हाथ में चाय का गिलास।
"क्या हुआ?"
"इस घर में कौन रहता है?"
"कोई नहीं। यह घर खाली है।"
"आवाज़ आ रही थी।"
"कैसी आवाज़? मैं पिछले एक घंटे से यहीं हूँ।" उसने चाय पी। "दो महीने पहले एक बूढ़ा रहता था, पर वह चला गया।"
"कहाँ गया?"
"कौन याद रखता है," उसने कहा, और मुड़कर अपने घर चला गया।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं। मैंने कंधा लगाया। दरवाज़ा चरमराया, फिर खुल गया।
अंदर अंधेरा। उड़ती धूल। एक कुर्सी, एक मेज़, और दीवार पर एक टंगी तस्वीर — उल्टी लटकी हुई।
मैं अंदर गई। मेरे जूतों के नीचे कुछ चरमराया। मैंने नीचे देखा।
फर्श पर गीली स्याही से कुछ लिखा था। बड़े अक्षरों में। जैसे किसी ने फ़र्श पर उँगली से लिखा हो — बिना कलम, बिना डंडी। स्याही अभी सूखी नहीं थी।
एक नाम। और नाम के नीचे एक गली का नाम। और उसके नीचे एक शब्द — "आवाज़।"
मैं झुकी।
नाम पढ़ा।
मेरी साँस रुक गई।
वह नाम था — बद्री प्रसाद। पिछले हफ़्ते मैंने इसी बूढ़े को एम्बुलेंस में बैठाया था। तीन दिन अस्पताल में रहा, फिर चला गया। और जब मैं वार्ड में उसका नाम पूछने गई थी तो नर्सों ने कहा था कि किसी को नाम याद नहीं — उसे "वह बूढ़ा जिसे लाने वाली ड्राइवर आई थी" कहकर बुला रहे थे।
मैंने गीली स्याही को देखा। फर्श पर स्याही की महक आ रही थी — वही फँसी हुई, मीठी। मैंने उँगली से छुआ। ठंडी थी।
और तभी मैंने पीछे एक आवाज़ सुनी। जैसे कोई दरवाज़े पर खड़ा हो और अपना नाम भूलने की कोशिश कर रहा हो।
मैं खड़ी हुई और मुड़ी।
दरवाज़े पर कोई नहीं था।
पर दरवाज़े की चौखट पर, बाहर से, एक गीली स्याही का छोटा निशान था — जैसे किसी ने उँगली रगड़ी हो।
मैंने अपना फोन निकाला और रामदीन को मेसेज किया। यह कहा कि शांति विहार में कोई नहीं, पर फ़र्श पर नाम लिखा है, और मुझे वह नाम पता है। फिर मैंने गीली स्याही को तस्वीर में उतारा।
मैं बाहर आई। पड़ोसी अपने दरवाज़े पर फिर खड़ा था, कुछ गुनगुना रहा था। मैंने पूछा, "यहाँ पिछले महीने किसी का नाम क्या था?"
वह रुका। "किसका नाम?"
"इस घर में रहने वाले बूढ़े का।"
उसने अपना सिर खुजाया। "मुझे क्या पता," उसने कहा, और फिर, एक लंबे पल के बाद, "बद्री… कुछ। बद्री… याद नहीं।"
"बद्री प्रसाद," मैंने कहा।
उसके चेहरे पर वही झिझक आई। वह सोचने लगा, जैसे किसी गहरी अलमारी से पुराना कपड़ा निकालने की कोशिश कर रहा हो। "हाँ," उसने कहा। "बद्री प्रसाद। और गली… यही। फेज़ एक, ब्लॉक बारह। और आवाज़…" वह रुका। "वह कैसे बोलता था?"
"धीमे," मैंने कहा। "बहुत धीमे। और बीच में रुककर।"
उसका चेहरा खुला। "हाँ! वह मेरे लिए चाय लाता था। कहता था — 'भईया बुरा मत मानना, गवर्नमेंट के पैसे हैं, बचा लेते हैं।'" उसने हँसा, फिर वह जैसे किसी नई चीज़ पर चौंका। "अरे, मुझे यह सब कैसे याद आ गया?"
"क्योंकि मैंने नाम बोला," मैंने कहा। "पूरा नाम। बद्री प्रसाद। शांति विहार फेज़ एक, ब्लॉक बारह। आवाज़ वही जो तुमने बताई।"
वह सन्न रह गया। फिर उसने अपना चाय का गिलास नीचे रखा, जैसे अब पीने का मन नहीं। "तुम क्या कर रही हो?" उसने पूछा।
"मैं नाम वापस उठा रही हूँ," मैंने कहा। "कुछ दिनों में और भी उठाने होंगे। तुम्हें याद है कि पिछले साल इस कॉलोनी से कौन गया?"
"कई गए," उसने कहा। "पर नाम…"
"अभी नहीं," मैंने कहा। "तुम सोचते रहना। कभी एक नाम चमक जाए तो याद रखना। और मुझे बताना।"
मैं गाड़ी में बैठी। दरवाज़ा खुला छोड़ आई — क्या फ़र्क़ पड़ता है, घर खाली है, और फर्श पर जो लिखा है वह अब मेरे पास है, मेरे फोन में, मेरी नोटबुक में।
फोन बजा। रामदीन।
"सुन," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अलग थी। "मैं अस्पताल पहुँच गया। बाबूलाल से मिला।"
बाबूलाल — अस्पताल का तीस साल पुराना गार्ड। मैं उसे जानती थी, हर रात आठ बजे वह गेट पर खड़ा मिलता था और कोई उसे तीन शब्द से ज़्यादा नहीं बोलता था।
"उसने क्या कहा?"
"वह कुछ जानता है," रामदीन ने कहा। "पर बोलता नहीं। पहले तेरे से मिलेगा। कहता है कि वह सिर्फ़ उस औरत से बात करेगा जिसने आज सुबह ड्यूटी रजिस्टर में तीन बार नाम लिखा था।"
मैं हँसी। "इसका मतलब उसे पता है कि रजिस्टर बदला गया।"
"हाँ। और एक बात और है।" वह रुका। "बद्री प्रसाद अस्पताल में आज सुबह आया था। चलकर। अपने पैरों से।"
"क्या?"
"तीन घंटे पहले। वह वार्ड में घूम रहा था और हर किसी से पूछ रहा था कि उसका नाम क्या है। किसी ने जवाब नहीं दिया। फिर वह चुपचाप बाहर चला गया। किसी ने रोका नहीं।"
मैंने आँखें बंद कीं।
"चाचा, वह अपना नाम भूल रहा है।"
"हाँ।"
"और अगर वह पूरा भूल गया, तो उसे कोई दोबारा याद नहीं दिला सकेगा। नाम, गली और आवाज़ — तीनों एक साथ याद रखने होंगे।"
"तो फिर वह जल्दी ढूँढ़ना पड़ेगा," रामदीन ने कहा। "और जल्दी का मतलब आज।"
मैंने गाड़ी अस्पताल की तरफ़ मोड़ी।
रास्ते में रिया का फोन आया। स्कूल की छुट्टी हो गई थी, वह घर जा रही थी। "माँ, आज मिसेज़ देसाई ने मुझे बुलाया।"
"क्यों?"
"मेरी हाज़िरी वाले पन्ने पर मेरा नाम फिर धुँधला हो रहा है। उन्होंने कहा कि वह मुझे याद रखती हैं पर रजिस्टर में नहीं दिख रहा। मैंने उन्हें अपना नाम तीन बार बोला। उन्होंने कहा — 'बेटा, तुम तो अभी से कुछ कहती हो?' फिर वह रुक गईं। उन्होंने कहा कि जब मैंने नाम बोला तो उन्हें ऐसा लगा जैसे कुछ गरम चीज़ उनकी छाती में घूम गई।"
मेरा हाथ स्टीयरिंग पर रुका।
"रिया, घर जाओ। दरवाज़ा अंदर से बंद करो। और किसी को मत खोलना।"
"माँ, क्या बात है?"
"बाद में। घर जाओ।"
मैंने फोन काटा। और तभी मुझे एहसास हुआ कि रिया ने क्या किया है — उसने नाम बोला, और सामने वाले ने महसूस किया। वही एहसास जो मुझे सुमित्रा देवी की दीवार देखकर हुआ था। नाम बोलने की ताकत। रिया में वह है।
अस्पताल के गेट पर बाबूलाल खड़ा था — वर्दी पहने, हाथ पीछे बँधे, आँखें नीची। उसने मुझे देखा और सीधा मेरे पास आया। रामदीन पीछे खड़ा था।
"तुम मीरा हो?" उसने पूछा। आवाज़ गाढ़ी थी, जैसे सालों से इस्तेमाल नहीं हुई हो।
"हाँ।"
"मुझे रोज़ रात दीवार पर नाम लिखा मिलता है," उसने कहा। "मैंने कभी किसी को नहीं बताया।"
"कहाँ?"
"टॉयलेट के पीछे की दीवार पर। जहाँ कोई नहीं जाता। हर दिन नया नाम। कभी दो नाम।"
"कौन लिखता है?"
"मैं खुद देखता हूँ," उसने कहा, "तो कोई नहीं होता। पर हर सुबह जब मैं वहाँ जाता हूँ, स्याही ताज़ी होती है। और उन नामों के नीचे एक लाइन होती है — 'आवाज़ अधूरी।'"
मैंने उसे देखा।
"तुम मुझसे क्या चाहते हो?"
"मैं तुम्हारा नाम लिखना चाहता हूँ," उसने कहा। "एक बार। सिर्फ़ एक बार।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं तीस साल से इन नामों को पढ़ रहा हूँ और मैं खुद का नाम लिख लेना चाहता हूँ। मैं बाबूलाल हूँ, बस बाबूलाल। मेरा पूरा नाम कोई नहीं जानता।"
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