A Dark Secret – Chapter 323
हवेली के गेट से बाहर निकलते वक़्त मेरी जेब में वह पर्ची थी जिस पर मेरी माँ का नाम लिखा था, और मेरे दिमाग़ में एक ही आवाज़ घूम रही थी — किसने लिखा "सुशीला"? कब लिखा? और अगर यह पर्ची मेरे लिए थी, तो रजिस्टर कौन ले गया?
रामदीन गाड़ी के पास खड़ा था और उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने उसे देखा और कुछ नहीं पूछा। कभी-कभी पूछना भी ज़रूरी नहीं होता, बस साथ खड़े रहना काफ़ी होता है।
"चाचा, गाड़ी में बैठो।"
वह बैठा। मैंने गाड़ी चालू की। सड़क पर ज़्यादा बोली नहीं। वह भी चुप रहा। बस एक बार, पीतल गली के मोड़ पर, उसने धीरे से कहा, "वह फोटो मेरे ज़माने की है।"
"कितने साल पहले?"
"चालीस। या उससे भी पहले।"
"उसमें चार औरतें हैं। तीन के नाम मिटे हैं। एक साफ़ है — सुशीला।"
वह खिड़की से बाहर देखने लगा।
"चाचा, चौथी औरत कौन है? वह पतली जिसके बाल कटे हैं?"
"वह मालकिन थी," उसने कहा। "हवेली की असली मालकिन। बाबू हरनाम उसे 'वह औरत' कहते थे।"
"नाम?"
उसकी गर्दन हिली। "नाम… नाम मुझे…" और फिर वही होने लगा जो हर बार होता था। उसके होंठ खुले, फिर बंद हो गए, फिर वह उलझने लगा।
"रहने दो," मैंने कहा। "अभी नहीं।"
उसने हाथ से अपना मुँह ढक लिया। मैंने गाड़ी रोकी और उसके कंधे पर हाथ रखा। "कल तक रुको," मैंने कहा। "हम तीनों नाम इकट्ठे करेंगे। तुम्हारा तरीक़ा है — टुकड़ों में बोलना। ठीक है। पर एक बात — तुम भूलने लगो तो मुझे बता देना। मैं तुम्हारा नाम ज़ोर से बोल दूँगी।"
"और अगर तू भूलने लगे?" उसने पूछा।
मैं हँसी। वह हँसी जो थकान से निकलती है।
"तब रिया तेरे पास बैठेगी। वह मेरा नाम ज़ोर से बोलेगी। वह डरती नहीं।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ लौटा।
मैंने गाड़ी उसके घर छोड़ी और खुद घर आई। रात के तीन बज रहे थे। रिया सो रही थी। मैंने चादर उसके ऊपर खींची और उसके बालों में उँगली फेरी। उसने नींद में कुछ बड़बड़ाया, फिर करवट बदली।
मैं सीढ़ी पर बैठ गई और वह पर्ची निकाली। माँ की लिखाई। जल्दी में लिखी हुई — जैसे लिखने वाले को पता था कि किसी को पता चल जाएगा। मैंने पर्ची को अपनी नोटबुक में रख लिया और नोटबुक को तकिये के नीचे।
उस रात मैंने सपना देखा — वही बंद कमरा। दीवार। पर इस बार दीवार पर नाम नहीं था। दीवार पर सिर्फ़ एक बड़ी सी उँगली का निशान था, जैसे किसी ने खुरचकर कुछ मिटाने की कोशिश की हो। मैंने उँगली उस निशान पर रखी। ठंडा था। बहुत ठंडा। और स्याही की वही महक आ रही थी — फँसी हुई, मीठी।
सुबह छह बजे मेरी आँख खुली। बत्ती जल रही थी। मैंने हाथ देखे — दोनों साफ़। कोई स्याही नहीं। मैंने राहत की साँस ली और फिर सोचा कि राहत किस बात की, हाथ साफ़ होना कोई अच्छी ख़बर थोड़े ना है।
अस्पताल पहुँची तो सात बज रहे थे। पार्किंग में एम्बुलेंस खड़ी करके मैं सीधे इमरजेंसी वार्ड की तरफ़ गई। ड्यूटी रजिस्टर काउंटर पर रखा था। मैंने खोला और उस तारीख़ का पन्ना देखा।
मेरा नाम नहीं था।
कल रात मैंने तीन बार लिखा था — अपनी करेक्टर मैं जानती हूँ, बाईं तरफ़ झुके हुए, बीच में थोड़ा दबाकर। आज पन्ना साफ़ था। मेरी जगह पर कोई और नाम नहीं, कोई काटा-मिटाया नहीं। बस खाली।
मैंने पन्ना पलटा। पिछला पन्ना भी खाली। और उससे पिछला भी। जैसे पूरी रजिस्टर ही नई हो।
मैं काउंटर के पीछे गई। अनीता वहाँ बैठी थी, सुबह की चाय हाथ में। उसने मुझे देखा और मुस्कुराई।
"अनीता, यह रजिस्टर कब से है?"
"यही तो है…"
"कब आया?"
"आज सुबह।"
"किसने भेजा?"
वह उलझ गई। चाय कप पर से हटाई। "मैंने सोचा चड्ढा जी ने ही भेजा होगा। सुबह पाँच बजे प्यून आया था, नया रजिस्टर रख गया।"
"पुराना कहाँ है?"
"कौन सा पुराना?"
"वह जिसमें मैंने कल रात अपना नाम लिखा था।"
उसके चेहरे पर कुछ आया — एक झिझक। फिर वही जो मैं हर जगह देख रही थी। "मीरा, तुमने कल रात लिखा था?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ में सच्चाई थी। "मुझे… मुझे ठीक से याद नहीं।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वह झूठ नहीं बोल रही थी। वह भूल रही थी।
मैंने रजिस्टर उठाया और सीधे चड्ढा जी के केबिन की तरफ़ बढ़ी। दरवाज़ा खुला था। वह कुर्सी पर बैठे थे और सामने मेज़ पर कुछ काग़ज़ फैले थे। उन्होंने मुझे देखा और मेरे हाथ में रजिस्टर देखा।
मैंने रजिस्टर उनकी मेज़ पर पटक दिया।
"यह क्या है?"
"नया रजिस्टर है।"
"मेरा नाम इसमें क्यों नहीं है?"
"तुमने लिखा था?"
"तीन बार।"
वह कुछ देर चुप बैठे रहे। उन्होंने चश्मा उतारा, मेज़ पर रखा, और फिर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो डाँटने वक्त आती है। उनकी आँखें थकी हुई थीं।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "मैं तुम्हारा नाम नहीं बदल सकता। वह मुझसे बड़ा है।"
बस इतना कहा और चुप हो गए।
मैं खड़ी रही। पूरे तीस सेकंड। फिर मैंने कुर्सी खींची और बैठ गई।
"आप जानते हैं क्या चल रहा है।"
"मैं तीस साल से यहाँ हूँ।"
"इसका जवाब नहीं है।"
"यही जवाब है। तीस साल से यहाँ हूँ और मैंने एक भी नाम नहीं बचाया। तुम पहली हो जिसने तीन बार लिखा।"
उन्होंने काग़ज़ों के ढेर में से एक पन्ना निकाला और मेरी तरफ़ सरकाया। पन्ने पर छब्बीस मार्च की तारीख़ थी और नीचे उनके हस्ताक्षर। "यह मैंने छह साल पहले किया था," उन्होंने कहा। "निशा वर्मा की फाइल पर। मुझे लगा था कि एक हस्ताक्षर से क्या होगा। उसके बाद मैंने एक भी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं किए — तुमने देखा, मैंने वह पन्ना निकाल दिया। डर के मारे।"
"आपको किसका डर है?"
"यही तो समझ नहीं आता," उन्होंने कहा, और अपने हाथ की तरफ़ देखा। "मुझे याद भी नहीं कि छब्बीस मार्च किस साल की थी। सिर्फ़ तारीख़ याद है। साल याद नहीं।"
कमरे में सन्नाटा था — पर अस्पताल का सन्नाटा कभी सच्चा नहीं होता। बाहर कोई स्ट्रेचर खींच रहा था, उसका पहिया बाईं तरफ़ खिंच रहा था, और कोई औरत गलियारे में अपने बेटे को डाँट रही थी।
तभी मेरा फोन बजा।
इमरजेंसी कंट्रोल। मैंने उठाया।
"शांति विहार फेज़ एक, ब्लॉक बारह… कोई बूढ़ा आदमी… आवाज़ आ रही है अंदर से पर दरवाज़ा बंद है।"
"आवाज़ कैसी?"
"वही दोहरा रहा है। बस 'मेरा नाम, मेरा नाम।'"
मैंने चड्ढा जी की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सख़्त हो गया। "चले जाओ," उन्होंने कहा। "और मीरा —" मैं रुकी। "— अगर वहाँ नाम लिखा मिले, तो उसे मत पढ़ो।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो नाम पढ़ता है, वह उसे याद रखता है। और जो याद रखता है, उसका नाम भी किसी के रजिस्टर में चढ़ जाता है।"
मैं बाहर निकली। रास्ते में रामदीन का फोन आया। मैंने उठाया और एक लाइन में सब बता दिया।
"मैं साथ चलता हूँ," उसने कहा।
"चाचा, तुम्हारी हालत…"
"मैं ठीक हूँ। रुकने का वक़्त नहीं है। कुछ ऐसा आ रहा है।"
"क्या?"
"पता नहीं। पर आज सुबह मैं बस स्टैंड के आगे तक चला गया। और वापस नहीं आया। मैंने थाने के सामने खड़े आदमी से रास्ता पूछा तो उसने कहा — 'कौन सा रामदीन? कुमार कौन?'"
मेरी छाती में कुछ ठंडा हुआ।
"तुम अभी अस्पताल पहुँचो," मैंने कहा। "मैं शांति विहार जा रही हूँ। और चाचा — तुम्हारा पूरा नाम बोलते रहना, रास्ते में। चलते-चलते, बस। रामदीन कुमार जोशी। पीतल गली। बोलते रहना।"
"और तू?"
"मैं भी बोलूँगी," मैंने कहा। "मीरा जोशी। तीस साल। पुरानी कोठी, बाज़ार के बीच।"
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