A Dark Secret – Chapter 322
“मैं अपने साथ कोई ऐसा लाऊँगी जो तुम्हारे दादा की आवाज़ पहचानता हो।”
फिर चुप्पी। लंबी। इतनी लंबी कि मुझे लगा लाइन कट गई।
“ठीक है,” उसने कहा। “पर एम्बुलेंस मत लाना।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरी गली में एम्बुलेंस घुसते ही पूरा मोहल्ला खिड़कियों पर आ जाता है। और मैं आज कोई तमाशा नहीं चाहती।”
“फिर मैं क्या लाऊँ?”
“पैदल आ जाओ। या ऑटो से।”
मैं हँसी। पहली बार उस दिन में हँसी। “तुम एक सौ एक बार एम्बुलेंस भेजवा सकती हो और मुझसे कहती हो ऑटो से आओ।”
“हाँ,” उसने कहा, और लाइन काट दी।
मैं बेंच पर बैठी रही। फिर उठी और वार्ड की तरफ़ चली। रास्ते में चड्ढा जी मिले — फाइलें दबाए, हमेशा की तरह जल्दी में।
“मीरा।” उन्होंने रास्ता रोका। “आज रात तुम्हारी ड्यूटी किसने बदली?”
“किसी ने नहीं बदली। मेरी ड्यूटी आज रात नहीं है। कल रात है।”
“तो आज रात अस्पताल में क्यों रुकना चाहती हो? मैंने सुना तुमने छुट्टी की अर्ज़ी नहीं दी।”
मैंने उन्हें देखा। “मैं छुट्टी नहीं ले रही। मैं शाम को बाहर जा रही हूँ, शहर में — और वापस आ जाऊँगी।”
“कहाँ?”
“कुछ काग़ज़ी काम है।”
चड्ढा जी ने फाइलें थोड़ी ऊपर उठाईं, जैसे मुझे धमकाने के लिए काग़ज़ ही काफ़ी हों। “मीरा, मैं आख़िरी बार कह रहा हूँ। रामदीन से दूर रहो। वह बूढ़ा आदमी साठ साल से इस अस्पताल की हवा खा रहा है और उसके साथ क्या है, मुझे पता है।”
“तो बताइए।”
“मैं नहीं बताऊँगा। मैं तुम्हें बचा रहा हूँ।”
“मुझे बचाने के लिए मेरी फाइल से पन्ने निकालने की ज़रूरत नहीं थी।” यह मैंने धीरे कहा। “निशा वर्मा की फाइल। छब्बीस मार्च। आपने उसका आख़िरी पन्ना अपनी अलमारी में रखा था। क्यों?”
चड्ढा जी का चेहरा बदला — नहीं, नहीं बदला। थोड़ा और थका लगा। उन्होंने आँखें नीची कीं। “मैं एक नौकरी करता हूँ। मेरे दो बेटे हैं, दोनों बाहर पढ़ते हैं। मुझे पता है कि कौन रस्सी खींच रहा है। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि उस रस्सी से बँधना नहीं है।”
“तो आपने फाइल में से पन्ना क्यों निकाला?”
“क्योंकि उस पन्ने पर मेरा हस्ताक्षर था।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “और जिस दिन वह पन्ना किसी और के हाथ लगा, उस दिन मेरा नाम उस रजिस्टर में जाएगा।”
“किस रजिस्टर में?”
वह पीछे हटे। “तुम्हें पता है।”
वह चले गए। मैं वार्ड के दरवाज़े पर खड़ी रही।
शाम पाँच बजे मैं घर पहुँची। रिया मेज़ पर बैठी थी, सामने कॉपी, पेंसिल। मैंने उसके पास बैठकर कहा, “आज शाम मुझे बाहर जाना है। तू घर पर रहेगी। नीचे आंटी के पास।”
“कहाँ जा रही हो?”
“हवेली।”
वह कुछ देर मुझे देखती रही। फिर बोली, “अकेली?”
“रामदीन चाचा को साथ ले जाऊँगी।”
“वह तो गेट से आगे नहीं जाते।”
“आज जा सकते हैं। कुछ चीज़ें ढीली हो रही हैं।”
रिया ने कॉपी बंद की। “माँ।”
“हाँ।”
“तुम जब लौटो, मुझे सच बताओ। जो भी हो।”
“बताऊँगी।”
“वादा?”
“वादा।”
वह उठी और अपने कमरे में चली गई। दरवाज़े पर रुकी। “माँ, एक बात।”
“हाँ।”
“वह फोटो — जो तुम लाई हो — उसमें तुम्हारी माँ हँस रही है। मैंने देख ली। तुम बैग में रखती हो, पर बैग खुला रह गया था।” वह मुस्कुराई। “वह अच्छी लग रही है।”
दरवाज़ा बंद हुआ।
मैं मेज़ पर बैठी रही। शाम छह बजे मुझे हवेली पहुँचना था — उस औरत के सामने खड़े होना था जिसके दादा ने यह सौदा लिखा, जिसकी दादी मेरी माँ की सखी थी, और जिसके हाथ में वह रजिस्टर था जिसमें मेरा नाम था।
मैंने पीतल की गोली जेब में रखी। फिर नोटबुक। फिर फोटो। फिर वह पन्ना, जिस पर माँ की लिखाई थी — “सुशीला जोशी, अपनी बेटी के लिए।”
दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने खोला।
रामदीन खड़ा था — भूरी जैकेट, हाथ जेब में, और इस बार उसके चेहरे पर वह आम थकान नहीं थी। कुछ और था। जैसे किसी ने उसे अंदर से जगा दिया हो।
“चल,” उसने कहा। “पर एक बात सुन ले।”
“क्या?”
“हवेली में जो भी हो, मेरी तरफ़ मत देखना। मैं अंदर जाते ही वही बूढ़ा रामदीन बन जाऊँगा — जो अटकता है, जो टुकड़ों में बोलता है।” उसने मेरी आँखों में देखा। “और अगर मैं कुछ भूलने लगूँ, तो तू मेरा पूरा नाम बोल देना। ज़ोर से। रामदीन कुमार जोशी। पीतल गली।”
मैंने सिर हिलाया।
हम चल पड़े।
हवेली का गेट खुला था। भीतर आँगन में एक बत्ती जल रही थी और उसकी रोशनी में धूल के कण तैर रहे थे, जैसे किसी ने अभी-अभी झाड़ू लगाई हो।
काजल सीढ़ी के नीचे खड़ी थी — सफ़ेद कुर्ता, बाल करीने से, हाथ में कोई काग़ज़ नहीं, कोई फाइल नहीं। पहली बार उसके हाथ खाली थे।
“आ गई,” उसने कहा।
“आ गई।”
उसने रामदीन की तरफ़ देखा। एक पल के लिए उसकी आँखों में कुछ कड़ा हुआ। फिर वह मुड़ी और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ी।
“ऊपर चलो।”
“रुको,” मैंने कहा। “तुमने कहा था कि मुझे कुछ दिखाना है। पहले यह बताओ कि फोटो में तुम्हारी दादी कौन है।”
वह रुकी। मुड़ी।
“फोटो?”
“वह फोटो जो तुमने मेरे लिए लिफ़ाफ़े में भेजी।”
उसका चेहरा बदला। सच में बदला — पहली बार।
“मैंने कोई फोटो नहीं भेजी,” उसने कहा।
हवेली के आँगन में हवा रुक गई। रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और फोटो निकाली।
“यह फोटो,” मैंने कहा। “तुम्हारे हवेली के आँगन की है। पीली दीवार। चार औरतें। इसमें मेरी माँ है।”
काजल ने फोटो हाथ में ली। उसकी उँगलियाँ काँपीं। वह फोटो को देखती रही, कुछ देर तक, बहुत देर तक।
फिर उसने धीरे से कहा, “यह मेरी दादी है।” उसने बाईं तरफ़ की मोटी औरत की तरफ़ उँगली रखी। “यह मेरी दादी — बाबू हरनाम सिंह की बीवी। और यह…” उसकी उँगली अगली औरत पर गई — वह पतली, जिसके बाल कटे थे। “यह वह औरत है जिसका नाम मेरे दादा ने कभी नहीं बताया। वह हमेशा कहते थे — ‘वह औरत जो नाम नहीं बोलती, वह औरत जो सब जानती है।’”
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था — नहीं, सफ़ेद नहीं, भूरा, जैसे किसी ने उसके चेहरे का रंग छीन लिया हो।
“चाचा?” मैंने कहा। “यह वही औरत है?”
वह हिला। सिर हिलाया — न हाँ, न ना। बस हिला।
काजल ने फोटो मुझे लौटाई। उसकी आवाज़ पहले जैसी मीठी नहीं थी। “ऊपर चलो। और रामदीन चाचा, आप भी।”
हम सीढ़ियाँ चढ़े।
मैं ऊपर क्या देखने जा रही हूँ, यह मुझे नहीं पता था। पर सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरे मन में एक ही बात थी — वह फोटो किसने भेजी। काजल ने नहीं भेजी। फिर किसने?
किसी ने मेरे लिए फोटो भेजी थी। किसी ने मेरे लिए लिफ़ाफ़ा छोड़ा था। किसी ने मेरे लिए दीवार पर नाम लिखा था।
और उस किसी को पता था कि मैं शाम छह बजे हवेली आऊँगी — उसने मुझे यहाँ बुलाया नहीं, बस मेरे रास्ते में चीज़ें रख दीं, जैसे किसी ने एम्बुलेंस के लिए सड़क साफ़ कर दी हो।
हवेली की ऊपर की मंज़िल पर एक लंबा कमरा था — दीवारों पर तीन पीढ़ियों की तस्वीरें, कोने में तिजोरी, और बीच में एक मेज़ जिस पर लाल कपड़ा बिछा था। तिजोरी खुली थी। अंदर रजिस्टर नहीं था।
काजल ने मेज़ की तरफ़ इशारा किया।
मैं करीब गई। कपड़े पर एक पर्ची रखी थी। पर्ची पर चार शब्द — “तुम्हारा नाम पहले से यहाँ है।”
और उसके नीचे, उसी काग़ज़ पर, एक और लिखाई थी — पुरानी, भूरी, जल्दी में लिखी हुई — “सुशीला।”
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