A Dark Secret321 / 536

A Dark Secret – Chapter 321

6 min read November 6, 2026

“सुशीला।”

मैंने सिर उठाया।

“यह…” मेरी आवाज़ फँस गई। “यह मेरी माँ का नाम है।”

“मुझे पता है।”

“आपके पास यह कहाँ से?”

वह कुछ देर चुप रहा। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। फिर बोला, “चालीस साल पहले जिस औरत का नाम मैं बोल नहीं पाया था — वह तेरी माँ की सहेली थी। और यह गोली उसने मुझे दी थी। कहा था — जिस दिन तू मेरा नाम बोल पाए, उस दिन यह किसी और को देना।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “मैंने आज तक नहीं बोला। आज सुबह उठा तो हथेली में यह थी, और मुझे लगा कि देना है।”

“किसको?”

“तेरे जैसे किसी को।” वह मुड़ा। “घर जा। रिया को देख। और कल सुबह अस्पताल आना — ड्यूटी रजिस्टर में अपना नाम फिर से लिखना। तीन बार।”

“तीन बार?”

“जो नाम दोबारा लिखा जाए, वह दोबारा उठता नहीं।” वह चल पड़ा। “कम से कम तीन बार तो नहीं।”

मैं गाड़ी में बैठी रही। हथेली में पीतल की गोली ठंडी थी — पर ठंडी नहीं, बस ठंडी लग रही थी। फोटो नोटबुक में थी। फ़ॉर्म लिफ़ाफ़े में। मैंने गाड़ी घर की तरफ़ मोड़ी।

घर पहुँची तो सीढ़ी की बत्ती जल रही थी। रिया जाग रही थी — मेज़ पर कॉपी खुली, पेंसिल पकड़े, सिर नीचे।

“रात के ग्यारह बज रहे हैं,” मैंने कहा।

“बारह हो गए,” उसने सिर उठाया। “मैंने देखा तुम नहीं थीं, तो सो नहीं रही।”

मैंने बैग रखा और उसके पास बैठ गई। कुछ नहीं बोली। बस उसे अपने से चिपका लिया — पूरी ताकत से, जैसे कोई चीज़ छूट रही हो और मैंने पकड़ ली हो।

“माँ?” उसकी आवाज़ मेरे कंधे में दबी थी। “तुम ठीक हो?”

“हूँ।”

“झूठ बोल रही हो।”

“हाँ।” मैंने उसके बालों में मुँह रखा। “पर अभी नहीं बताऊँगी।”

वह मेरे से अलग हुई और मेरे चेहरे को देखा।

“मैंने एक काम किया,” उसने कहा।

“क्या?”

वह मेज़ पर लौटी और कॉपी उठाई। पन्ना पलटा। उसके पीछे की तरफ़, बड़े अक्षरों में, वही नाम था — शालिनी नायक। तीन बार। नीचे-ऊपर, तीन बार, हर बार थोड़ा और गहरा।

“तीन बार?” मैंने पूछा।

“पहली बार मैंने धीरे लिखा। दूसरी बार ज़ोर से लिखा। तीसरी बार ज़ोर से बोला भी — चुपचाप, होठों से।” उसने कॉपी बंद की। “तुमने कहा था कि भूलने से नाम मिटते हैं। तो मैंने सोचा — लिखने से वापस आते होंगे।”

मेरा गला भर आया। मैंने उसे फिर अपने से लगाया।

“तुम्हारी उम्र से बड़ी बात कह दी,” मैंने कहा।

“कहने दो,” उसने कहा। “कम से कम मैंने कुछ किया।”

मैंने उसके हाथ पकड़े। उँगलियाँ — साफ़। कोई स्याही नहीं। मैंने उसकी हथेली पलटी, दोनों हाथ देखे। साफ़। मैंने अंदर ही अंदर साँस ली।

“सो जाओ,” मैंने कहा। “कल स्कूल है।”

“कल स्कूल जाऊँ?”

“हाँ।” मैंने कहा। “कल से मैं तुम्हें हर दिन स्कूल भेजूँगी और गेट पर खड़ी रहूँगी। जब तक तुम्हारा नाम पट्टे पर लौट न आए।”

“तो तुम भी कुछ कर रही हो।”

“मैं भी कुछ कर रही हूँ।”

वह सो गई। मैंने बत्ती बुझाई पर सोई नहीं। मेज़ पर बैठकर नोटबुक खोली और फोटो निकाली। फिर उसी पन्ने पर तीन लाइनें लिखीं।

“फोटो — हवेली की दीवार। चार औरतें। एक माँ। तीन नाम मिटे। कोई बाईस साल पुरानी।”

“पीतल की गोली पर ‘सुशीला’ खुदा। रामदीन ने दी। माँ की सहेली की थी। वह औरत जिसका नाम वह चालीस साल से बोल नहीं पाया।”

“रिया ने शालिनी का नाम तीन बार लिखा। तीन बार अपने आप। मेरे बिना कहे।”

मैंने पेंसिल रखी और खिड़की के बाहर देखा। सड़क पर एक कुत्ता भौंका, फिर चुप। किसी की बत्ती जली, फिर बुझी।

अगली सुबह मैं छह बजे अस्पताल पहुँची। इमरजेंसी वार्ड में तीन स्ट्रेचर खाली थे और एक पर कोई बूढ़ा सो रहा था। अनीता चाय लेकर आई।

“इतनी सुबह?”

“ड्यूटी रजिस्टर चाहिए।”

“फिर से?” उसने आँखें ऊपर कीं। “तुम्हारा नाम इसी में लिखा है।” उसने अलमारी से नया रजिस्टर निकाला — वही, जिसमें पुराने नाम नहीं थे।

“इस बार मैं नए पन्ने पर लिखूँगी।”

मैंने कलम उठाई और पहले पन्ने पर अपना पूरा नाम लिखा — मीरा जोशी, तीस साल। फिर दूसरे पन्ने पर, फिर तीसरे पर। तीन बार। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। जब तीसरा नाम पूरा हुआ, मैंने पन्ना पलटा और वहीं रुक गई।

पीछे की तरफ़ कुछ लिखा था।

पुरानी स्याही। भूरी, फैली हुई, इतनी फीकी कि नाखून से खुरचो तो उतर जाए। मैंने रजिस्टर को टेबल की बत्ती के नीचे रखा।

पहली लाइन — “जो बच्ची होने वाली है, उसका नाम यहाँ लिखना है।”

मेरा हाथ रुक गया।

दूसरी लाइन, उससे नीचे, थोड़ी अलग लिखाई में — जल्दी में लिखी, कोने की तरफ़ झुकती हुई, आख़िरी अक्षर थोड़ा ऊपर — “सुशीला जोशी, अपनी बेटी के लिए।”

मैंने स्याही पर उँगली रखी। ठंडी थी।

अनीता मेरे पीछे आई। “क्या देख रही हो?”

“यह लिखाई,” मैंने कहा। “यह मेरी माँ की है।”

“कौन माँ?”

“सुशीला जोशी।”

अनीता ने सिर हिलाया, फिर धीरे से कहा, “सुशीला जोशी?” उसके चेहरे पर वही खालीपन आ गया जो लोगों के चेहरों पर आता है जब वे किसी का नाम सुनकर भूलने लगते हैं। “मुझे… पता नहीं। नाम जाना-पहचाना लग रहा है।”

“पर लिखा तो है।” मैंने पन्ना उसकी तरफ़ घुमाया। “देखो। साफ़ लिखा है।”

“हाँ।” उसने पढ़ा। “लिखा तो है।” फिर उसने रजिस्टर बंद कर दिया, जैसे पन्ना देखना ही नहीं चाहती हो। “ड्यूटी शुरू करो। सात बजे एक कॉल थी — ग्रीन पार्क फेज़ दो में। बुज़ुर्ग को साँस की तकलीफ़। एम्बुलेंस तैयार है।”

मैं रजिस्टर वापस अलमारी में रखने लगी, फिर रुकी। मैंने जल्दी से वह पन्ना फाड़ा — नहीं, फाड़ा नहीं, उसकी फोटो ली। फिर रजिस्टर वापस रख दिया और चल दी।

कॉल सामान्य थी। बूढ़े आदमी को साँस नहीं आ रही थी, बेटा रो रहा था, बहू दवा ढूँढ रही थी। मैंने उसे स्ट्रेचर पर लिटाया, ऑक्सीजन लगाई, और अस्पताल पहुँचा दिया। रास्ते में बूढ़े ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “बेटी, तेरा नाम क्या है?” मैंने कहा, “मीरा।” उसने कहा, “मीरा। अच्छा नाम है। मेरी बेटी का नाम भी मीरा था।” फिर वह सो गया।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। बूढ़े का बेटा अपनी बीवी से कह रहा था, “पापा को क्या हुआ, पता नहीं। कल तक ठीक थे।”

मैंने खिड़की के बाहर देखा। ग्रीन पार्क फेज़ दो के घर पीछे छूट रहे थे। एक घर के बाहर का नाम-पट्टा उतरा पड़ा था और उस पर पानी गिर रहा था।

दोपहर में मैं अस्पताल के पीछे वाली बेंच पर बैठी। रामदीन वहाँ नहीं था। मैंने फोन निकाला। काजल का नंबर मेरे पास पहले से था — मनोहर ने भेजा था, स्कॉलरशिप के लिए।

मैंने कॉल मिलाई। दूसरी घंटी पर उठा।

“मीरा?” आवाज़ में वही मिठास। “क्या बात है? फ़ॉर्म साइन कर दिया?”

“नहीं।”

“तो?”

“तुम्हारी दादी मेरी माँ की सखी थीं।”

दूसरी तरफ़ चुप्पी। फिर, “किसने कहा?”

“तुमने ही कहा था। पहली बार जब तुम अस्पताल आई थीं, तब। मैंने तब ध्यान नहीं दिया। अब दे रहा हूँ।”

वह हँसी — छोटी, नपी-तुली हँसी। “हाँ, तो?”

“तो मैं आज शाम आ रही हूँ। हवेली। तुमने खुद कहा था कि मुझे कुछ दिखाना है।”

“आ जाओ।” उसकी आवाज़ में कुछ बदला — हल्का-सा तनाव। “शाम छह बजे। और मीरा?”

“हाँ?”

“अकेले आना।”

“नहीं।”

“मीरा —”

“मैं अकेली नहीं आऊँगी।”

“तो किसे लाओगी? रिया को?”

मैंने आँखें बंद कीं। “रिया को नहीं।”

“तो?”

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