A Dark Secret – Chapter 320
“मेरा नाम नहीं है उस पर। मतलब काग़ज़ मेरे हाथ से नहीं आया। जिसने तुझे दिया, वो मेरे आसपास से आया — पर मुझ तक नहीं पहुँचा। कोई मेरे और उस काग़ज़ के बीच खड़ा है।”
“निशा की माँ?”
“नहीं।” उसने सिर हिलाया। “वो सीधी औरत है। जो सीधा हो, वो स्याही की महक नहीं समझता। वो काग़ज़ उसके हाथ में पड़ा रहा बीस दिन — पर उसे पता नहीं चला कि स्याही सूखी नहीं।”
“तो कौन?”
उसने ऊपर आसमान देखा। फिर पान मसाला थूका और खड़ा हो गया।
“चाचा —”
“कल शाम कब्रिस्तान जाएगी?”
“हाँ। पर अंदर नहीं —”
“अंदर जा।” उसने कहा। “पर अकेली नहीं।”
“किसके साथ?”
उसने मेरी नोटबुक की तरफ़ देखा। “जो नाम तूने याद रखे हैं — वो साथ ले जा। काग़ज़ साथ ले जा। पीतल की कलम साथ ले जा। और सबसे ज़रूरी — उस लिफ़ाफ़े को साथ ले जा जो कल शाम कब्रिस्तान के बाहर पड़ा मिला था।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिसने वो लिफ़ाफ़ा डाला, वो भूल गया कि लिफ़ाफ़े पर नाम नहीं लिखा। और जो नाम नहीं लिखता, वो अपना नाम भी भूलने लगता है। तेरे पास एक ऐसा सुराग है जो किसी और के पास नहीं।”
वह चलने लगा। फिर रुका।
“मीरा।”
“हाँ?”
“उस काग़ज़ पर तेरा नाम जिसने लिखा — वो तेरी माँ नहीं थी।”
मैं एक पल को सुन्न रह गई।
“मैंने कहा था कि तेरा जन्म सौदे का हिस्सा था। पर तेरा नाम बाद में जोड़ा गया। तेरी माँ ने तेरा नाम लिखवाया था — पर किसी और ने उसे आगे बढ़ाया। कोई चाहता था कि तू बड़ी हो।”
“क्यों?”
“क्योंकि बड़ी औरत का नाम उठाना आसान होता है। बच्चे का नाम उठाने से शहर हिल जाता है।”
वह चला गया। मैं वहीं बैठी रही।
रात ग्यारह बजकर चालीस पर वायरलेस पर आवाज़ आई। डिस्पैचर की आवाज़ में जल्दी थी।
“यूनिट चार — हवेली के पास की गली, पीतल गली के मोड़ पर। बेहोश आदमी पड़ा है। अभी।”
मैंने सीट बेल्ट बाँधी। “कौन बोल रहा है?”
“कोई सूचना देने वाला। नाम नहीं बताया।”
“नंबर मिला?”
“नंबर ब्लॉक है।”
मैंने गाड़ी स्टार्ट की।
पीतल गली की तरफ़ की सड़क खाली थी। मैंने गाड़ी तेज़ की, सायरन धीमा रखा — रात में आवाज़ दूर तक जाती है। अस्पताल से हवेली बारह मिनट हैं। मैं सात मिनट में पहुँच गई।
पीतल गली के मोड़ पर गाड़ी रोकी। लाइट जलाई। सड़क सूखी थी, नाली में पानी। कोई नहीं।
मैं उतरी। टॉर्च जलाई। इधर-उधर घुमाया। कुछ नहीं। कुछ भी नहीं। एक दीवार के नीचे काग़ज़ का एक पुराना टुकड़ा पड़ा था — सूखा, मुड़ा। मैंने उसे टॉर्च में देखा। स्याही का एक धब्बा उस पर। कुछ नहीं।
मैंने वायरलेस उठाया। “कंट्रोल, यहाँ यूनिट चार। जगह पर कोई मरीज़ नहीं। जगह खाली है।”
“एक मिनट — फिर से देखो।”
“देख लिया।”
“तो किसी ने झूठी सूचना दी।” डिस्पैचर की आवाज़ में थकान थी।
“पता करो कौन था।”
“मैडम, नंबर ब्लॉक है। अब क्या करें?”
मैं कुछ देर खड़ी रही। हवा में वही महक आ रही थी — थोड़ी फँसी हुई, थोड़ी मीठी, जैसे पुराने काग़ज़ पर लगी गोंद। मैंने टॉर्च दीवार पर फेरी। दीवार पर कुछ लिखा था — ताज़ी स्याही से, बड़े अक्षरों में, एक नाम। मैं करीब गई। मेरा अपना नाम था, काला और गीला — मीरा जोशी।
उसके नीचे, छोटी स्याही से, एक तारीख़ — चौदह।
मैंने कलम निकाली और नोटबुक में सब लिखा। फिर दीवार के उस नाम की तस्वीर ली।
जब मैं मुड़ी, गली के मोड़ पर एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था — सफ़ेद, साफ़। मैंने उठाया। ऊपर मेरा नाम था, उसी महीन लिखाई में — मीरा जोशी। नीचे कोई पता नहीं। मैंने खोला।
उसमें एक छोटी पर्ची थी, सिर्फ़ तीन शब्द —
“आज तुम्हारी बारी।”
मैंने चारों तरफ़ देखा। गली खाली थी। पर मुझे लगा कि किसी ने अभी-अभी मेरा नाम बोला है — दूर से, बहुत धीरे, जैसे कोई सपने में बुला रहा हो।
मैंने एम्बुलेंस की लाइट बंद की और स्टेयरिंग पर हाथ रखकर बैठ गई।
दीवार पर नाम अभी गीला था।
॥
लिफ़ाफ़ा मेरे हाथ में था और उस पर मेरा नाम सूख रहा था। मैंने उसे उसी तरह खोला जैसे किसी मरीज़ का पट्टा खोलते हैं — धीरे, एक कोना पहले।
अंदर वही स्कॉलरशिप फ़ॉर्म था जो मनोहर भेजना चाहता था। काजल के हस्ताक्षर नीचे, तारीख़ ऊपर, और मेरी जगह पर एक खाली लकीर जो अभी भरी नहीं थी। फ़ॉर्म के नीचे एक फोटो थी — पुरानी, उभरी हुई, कोने से मुड़ी।
मैंने एम्बुलेंस की छत की बत्ती जलाई और फोटो को रोशनी में पकड़ा।
पीली दीवार। घिसा हुआ फर्श। चार औरतें, सब हँस रही थीं। तीन तो मुझे नहीं पता थीं — एक मोटी, कमर तक घूँघट डाले; एक लंबी, हाथ में बच्चा; एक बहुत पतली, जिसके बाल कटे हुए थे और आँखें हँसते वक़्त भी गंभीर थीं।
चौथी मेरी माँ थी।
सुशीला जोशी। जवान, बाल अभी काले, कमर पर हाथ, और चेहरे पर वही जल्दबाज़ी — जैसे फोटो खिंचवाने के बाद उन्हें कहीं और पहुँचना हो।
पीछे की दीवार पर, धुँधला सा पर पहचाना जाने वाला, एक ताखा था और उस ताखे के नीचे दीवार पर मोटी पीली पुताई। वह हवेली की दीवार है। मुझे उस दीवार को देखे हुए दो ही दिन हुए थे, पर पहचान गई — पीले रंग पर वही उभरी हुई लकीरें, वही कोना जहाँ प्लास्टर उखड़ा था, वही ताखा जिसमें आज कोई चीज़ नहीं रखी।
मेरा हाथ काँपा। मैंने फोटो को दोनों हाथों से पकड़ा।
“माँ,” मैंने कहा। आवाज़ अजीब निकली, जैसे किसी और की हो। “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
माँ नहीं बोलीं। फोटो में सब हँस रही थीं, और मैं एम्बुलेंस में बैठी एक फोटो से सवाल पूछ रही थी। मैंने फोटो पलटी। पीछे नीली स्याही से एक तारीख़ लिखी थी — कोई बाईस साल पुरानी — और उसके नीचे चार नाम। तीन नामों के आगे स्याही फैली हुई थी, इतनी कि कुछ पढ़ा नहीं जाता। चौथा नाम साफ़ था — “सुशीला।”
तीन नाम मिटे हुए। एक नाम साफ़।
मैंने फोटो नोटबुक के बीच में रखी और नोटबुक बंद कर दी।
उसी वक़्त वायरलेस फिर बोला।
“यूनिट चार, कंट्रोल। आप लौट रही हैं?”
“लौट रही हूँ।”
“एक काम है। गेट पर कोई आपका इंतज़ार कर रहा है। कह रहा है ज़रूरी है।”
“कौन?”
“नाम नहीं बताया। बस इतना कहा कि मीरा जोशी से मिलना है।”
गाड़ी के शीशे के बाहर देखा। चौराहे पर एक पेड़ के नीचे साया खड़ा था। मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई।
वह रामदीन था। इस वक़्त उसे यहाँ नहीं होना चाहिए था। वह अस्पताल के गेट से आगे नहीं जा सकता — यह बात उसने खुद बताई थी। पर यहाँ खड़ा था, हाथ जेब में, सफ़ेद बाल हवा में।
मैंने गाड़ी रोकी और शीशा नीचे किया।
“चाचा, आप यहाँ?”
“आज कुछ अजीब हो रहा है।” उसने आसमान देखा, फिर मेरी तरफ़। “मैं स्टैंड से आगे निकला और वापस नहीं आया। सीधा यहाँ पहुँच गया।”
“मतलब?”
“मतलब यह कि सीमा टूट रही है। जो चीज़ मुझे चालीस साल से रोक रही थी, वह आज ढीली है।” उसने जेब से एक पान मसाला निकाला और मुँह में रखा। “और जब सीमा ढीली होती है, तो रखवाले को खबर हो जाती है। इसलिए तू सुन — आज रात कहीं मत जाना।”
“मेरे पास इमरजेंसी कॉल आ सकती है।”
“तो जाना। पर अकेली मत जाना।”
“रिया?”
“रिया को साथ मत ले जाना। किसी और को ले जाना।” उसने हाथ जेब से निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया। उसकी मुट्ठी में कुछ था। “यह ले। और इसे अपने पास रख।”
मैंने हाथ बढ़ाया। उसने मेरी हथेली पर एक चीज़ रखी।
वह एक छोटी, चपटी, ठंडी चीज़ थी — पीतल की एक गोली, बटन के बराबर, ऊपर एक शब्द खुदा हुआ। मैंने टॉर्च जलाकर पढ़ा।
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