A Dark Secret – Chapter 319
मैंने गाड़ी पुराने बाज़ार की तरफ़ मोड़ी।
पीली दीवारें दूर से दिखने लगीं। हवेली का गेट लोहे का था, टीन के पत्तों से मढ़ा हुआ, ऊपर एक पुराना ताला। दीवार पर जगह-जगह फफूँद और उखड़ा प्लास्टर। मैंने गाड़ी सामने वाली सड़क पर खड़ी की और बाहर बैठ गई। तीन घर दूर एक चाय की दुकान थी। ठेले वाला मुझे देखकर मुस्कुराया।
“मेमसाब, किसी को ढूँढ रही हैं?”
“नहीं। बस आराम कर रही हूँ।”
वह समझ गया कि झूठ बोल रही हूँ, पर कुछ नहीं बोला। मैंने उसकी कुर्सी उधार ली और दीवार के सहारे बैठ गई।
दस मिनट बाद एक खिड़की जली। ऊपर की मंज़िल की, दीवार के कोने पर — ट्यूबलाइट की सफ़ेद रोशनी, झिलमिलाती। खिड़की के परदे में एक आदमी की परछाई दिखी। फिर बुझ गई।
मैंने नोटबुक निकाली। “हवेली — ऊपर की मंज़िल — ट्यूबलाइट — कोने की खिड़की।” फिर पेंसिल रखी और देखती रही।
ग्यारह बजे मेरे फोन पर एक नंबर आया। अनजान। मैंने उठाया।
“मीरा जी?” आवाज़ मुलायम थी, सधी हुई। “मैं मनोहर बोल रहा हूँ।”
“कौन?”
“मनोहर। हरनाम मैडम का मुंशी।” एक छोटी सी हँसी। “आपसे मिलना नहीं हुआ अभी तक — पर मैडम आपकी तारीफ़ करती रहती हैं।”
“अच्छा।” मैंने कुर्सी पर सीधी होकर बैठी।
“देखिए, मैडम ने आपकी बेटी के स्कूल के लिए स्कॉलरशिप फ़ॉर्म भेजा है। पूरे साल की फीस, किताबें, सब। बच्ची तेज़ है, आगे बढ़ेगी। आप सिर्फ़ साइन कर दें।”
“फ़ॉर्म मेरे पास कहाँ है?”
“घर पर। आपके दरवाज़े के नीचे से डाल दिया गया है।”
मैंने गाड़ी से बाहर देखा। दोपहर की धूप में सड़क खाली थी। मेरे घर के दरवाज़े के नीचे कुछ नहीं पड़ा था — जब मैं निकली थी, तब नहीं। इसका मतलब किसी ने हमारी गैरहाज़िरी में दरवाज़ा देखा था।
“मनोहर जी,” मैंने कहा धीरे से, “फ़ॉर्म वापस ले जाइए।”
“मैडम —”
“और मैडम से कहिए — जो देखा है, वो भूला नहीं जाता।”
दूसरी तरफ़ पूरा एक पल चुप्पी। फिर वही सधी आवाज़, थोड़ी धीमी — “मैडम, कुछ चीज़ें भूलना ही अच्छा होता है। बच्ची की भलाई के लिए कह रहा हूँ।”
“रिया की भलाई मेरे हाथ में है,” मैंने कहा। “आपके हाथ में सिर्फ़ आपकी फाइलें हैं।”
फोन कट गया। मैंने मोबाइल जेब में रखा। मेरे हाथ काँप नहीं रहे थे, बस ठंडे थे।
चाय वाला मेरी तरफ़ आया। “मेमसाब, कुछ ठीक नहीं?”
“ठीक है। सिर्फ़ एक बात पूछनी है।” मैंने हवेली की तरफ़ इशारा किया। “इस घर में कौन रहता है?”
“हरनाम परिवार। बड़े लोग।”
“कोई और?”
“अब तो बस… मैडम। काजल मैडम। और कभी-कभी उनके आदमी आते हैं — वो फाइल वाला, और वो बड़ा सा।”
“भैरों?”
उसका चेहरा सख़्त हुआ। “आप उन्हें जानती हैं?”
“नाम सुना है।”
“मेमसाब, मेरी बात मानिए, इस गली में देर तक मत बैठिए। शाम को यहाँ सन्नाटा होता है और… और कभी-कभी यहाँ से कोई बाहर आता-जाता दिखता नहीं है, फिर भी पता चल जाता है कि आया था।”
“कैसे?”
“गेट का ताला। सुबह खुला मिलता है।”
मैं कुछ देर देखती रही। “तुम यहाँ कब से हो?”
“बीस साल से। बाप के ज़माने से ठेला। पर मैं कभी अंदर नहीं गया। कभी ज़रूरत नहीं पड़ी।” उसने अपना पीपा उठाया। “और आगे भी नहीं पड़ेगी।”
वह चला गया।
दोपहर में मैंने एक और गली से होकर हवेली के पीछे पहुँचने की कोशिश की। पीछे एक छोटी सी खिड़की थी जिस पर साये का परदा लगा था। नीचे ज़मीन पर बड़ी सी तिजोरी के रखे होने के निशान थे — पैरों के गड्ढे, पत्थर पर खुरचन।
मैंने फोटो खींचने के लिए मोबाइल निकाला। तभी पीछे किसी के चलने की आहट आई। मैं मुड़ी। भैरों खड़ा था — गली के मोड़ पर, हाथ जेब में।
हम दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर वह बोला — पहली बार, पूरा वाक्य। “यहाँ ज़्यादा मत घूमिए।”
“क्यों?”
“बुरी गली है।”
“अच्छी गली कौन सी है?”
उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस मुड़कर निकल गया।
घर लौटी तो रिया स्कूल से आ चुकी थी। उसने दरवाज़ा खोला और सीधे मेरे हाथ में थमा दिया — एक लिफ़ाफ़ा, साफ़, सील बंद।
“दरवाज़े के नीचे पड़ा था।”
मैंने देखा। ऊपर मेरा नाम था, अंग्रेज़ी में नहीं, हिंदी में, साफ़ स्याही से — मीरा जोशी। नीचे कोई पता नहीं। मैंने खोला। एक ही पन्ना था। उस पर छोटी सी लाइन —
“स्कॉलरशिप का फ़ॉर्म कल तक साइन कर दीजिए। रिया का भविष्य दाँव पर है। — काजल हरनाम।”
मैंने पन्ना मोड़ा और जेब में रखा।
“क्या लिखा है?” रिया ने पूछा।
“कुछ ख़ास नहीं।”
“झूठ।” वह सीढ़ी पर बैठ गई, ठुड्डी घुटनों पर। “आप हर बार ऐसे ही कहती हैं।”
मैं उसके पास बैठ गई। “देख, यह काग़ज़ कहता है कि तेरी फीस माफ़ हो जाएगी अगर मैं एक फ़ॉर्म साइन कर दूँ।”
“तो साइन कर दीजिए।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“माँ, हमारे पास पैसे नहीं हैं। मुझे पता है।” उसकी आवाज़ बहुत सीधी थी। “अगर वो फीस माफ़ कर रहे हैं तो क्यों नहीं?”
“क्योंकि फीस माफ़ नहीं हो रही। कुछ और लिया जा रहा है।”
“क्या?”
“यही तो पता नहीं।” मैंने उसकी पीठ पर हाथ रखा। “पर जो मुफ़्त में मिलता है, वह सबसे महँगा होता है। यह मैंने अपनी नौकरी में सीखा है।”
वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “माँ, आप मान गईं तो नहीं?”
“नहीं।”
“तो वो फिर भेजेंगे।”
“भेजेंगे।”
“और फिर?”
मैंने उसके बाल में हाथ फेरा। “फिर हम भेजने वाले को रोकेंगे।”
रात दस बजे मेरी ड्यूटी शुरू हुई। अस्पताल का इमरजेंसी वार्ड खाली था — सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी बेंच पर सो रहा था और दो नर्सें ड्यूटी रजिस्टर पर झुकी थीं। मैंने चाय का कप उठाया और रामदीन की बेंच की तरफ़ देखा। वह नहीं था।
मैं बाहर निकली। अस्पताल के पिछले हिस्से में जहाँ कचरा-पात्र रखे रहते हैं, वहाँ वह बैठा था — भूरी जैकेट, पान मसाला होंठों में। मैं उसके पास बैठ गई।
“चाचा, काग़ज़ मिला।”
“बोल।”
“निशा वर्मा — छब्बीस मार्च। और उसके नीचे मेरा नाम — मीरा जोशी। कोई तारीख़ नहीं। स्याही काली, पुरानी — पर सूखी नहीं। और उस पर तेरा नाम नहीं है।”
वह कुछ देर चुप रहा। फिर उसने उँगली उठाई और पास के पत्थर पर एक लकीर खींची। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
“पहली लकीर — तारीख़ नहीं है। मतलब तेरा नाम उस काग़ज़ पर बाद में आया। किसी ने बाद में लिखा।”
“कौन?”
“जिसने लिखा, वो तेरे नाम के साथ तारीख़ भी लिखता। पर नहीं लिखी। मतलब वो तारीख़ अभी तय नहीं हुई। तेरा नाम डाला गया है, दिन नहीं।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए। “इसका मतलब?”
“मतलब, तेरा नाम उस रजिस्टर में है पर तेरी बारी अभी तय नहीं। कोई उसे आगे खिसका रहा है। महीने-दर-महीने। और जो खिसका रहा है, वो चाहता है कि तू ज़िंदा रहे — पर डरी हुई। डरी हुई औरत अंदर जाती है, लड़ती नहीं।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — न डर, न पछतावा। बस थकान, चालीस साल की।
“दूसरी लकीर — स्याही पुरानी है, पर सूखी नहीं। यह स्याही उस काग़ज़ पर बनी नहीं। यह कहीं और से आई।”
“कहाँ से?”
“पीतल की कलम से।” उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा। “वो कलम कभी सूखती नहीं। जिस काग़ज़ पर लग जाए, वहाँ लिखा हुआ कभी पूरा नहीं होता — बस बढ़ता रहता है।”
“और तीसरी लकीर?”
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