A Dark Secret33 / 536

A Dark Secret – Chapter 33

7 min read November 6, 2026

"जिनके नाम मत लेना, बेटा। बस मत उलझना।"

फोन कट गया।

मैं काफ़ी देर आसमान देखता रहा। और मेरे कान में वही पतली आवाज़ घूमती रही — बाप का हिसाब भी साथ आया होगा।

सुबह सात बजे कबीर आया।

मैं पानी डालकर मुँह धो रहा था और उसने दूर से ही आवाज़ दी।

"अर्जुन! ओ अर्जुन!"

"आ रहा हूँ।"

वो साइकिल पर था, और उसके पीछे बँधा था एक कटोरा और एक प्लास्टिक का डिब्बा।

"काम मिला है," उसने कहा। "छोटा है। बहुत छोटा है। पर काम है।"

मैंने मुँह पोंछा।

"बोल।"

"गाड़ी महल के पीछे लाला जी की दुकान है। पुराने तार, पुराने पंखे, पुरानी रद्दी। उनके यहाँ से तीस बोरे रद्दी जानी है, शहर के बाहर काग़ज़ की मिल तक।"

"कितनी दूर?"

"बारह किलोमीटर। ज़्यादा नहीं।"

"किराया?"

"नौ सौ। और देख — लाला जी से मेरी पुरानी जान-पहचान है। मैंने कह दिया कि गाड़ी नई नहीं है, पर चलेगी। वो बोले, ले आ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ ऊपर नहीं गई थी। नीचे भी नहीं गई थी। वो सीधी थी।

मैं मुस्कुराया। "नौ सौ?"

"हाँ। और एक बात — वो अग्रिम नहीं देंगे। पूरा पैसा मिल के आएगा।"

"चलेगा।"

मैंने अपनी जेब देखी। जो बचा था, उसमें से डीज़ल डलवाना था।

"एक शर्त है," कबीर ने कहा।

"बोल।"

"मुझे भी हिस्सा चाहिए। मैंने काम दिलाया है, इसका कुछ तो बनेगा।"

"कितना?"

"जो तेरा दिल करे। पर मुफ़्त में मत रखना। मुफ़्त की चीज़ की क़ीमत नहीं होती।"

मैं हँस पड़ा। "ठीक है।"

मैं गाड़ी के पास गया। रघुवीर। सफ़ेद रंग से लिखा हुआ नाम, धूल में सूखा, आधा भरा हुआ। मैंने हाथ लगाया तो रंग हल्का गरम था।

"सुन," मैंने धीरे से कहा। "आज पहली कमाई है। तू मेरे साथ चल। बुरा मत करना।"

फिर मैं हँसा। किससे बात कर रहा था मैं।

पर मुझे लगा कि गाड़ी ने कुछ कहा। उसकी बॉडी की चादर धूप में फैल रही थी — टक, टक — जैसे कोई आराम से साँस ले रहा हो।

लाला जी की दुकान गाड़ी महल के पीछे थी, एक तंग गली के अंदर। वहाँ पहुँचकर मैंने देखा — बोरे पहले से बँधे थे, पर उन्हें गाड़ी तक लाना था, और वो बोरे हल्के नहीं थे।

लाला जी अपनी कुर्सी पर बैठे थे, हाथ में चश्मा और मुँह में कुछ गिनती।

"ये गाड़ी?" उन्होंने पूछा। "ये तो बहुत पुरानी है।"

"पुरानी है, लाला जी," मैंने कहा। "पर इंजन नया है।"

"नया कैसे?"

"मैंने लगाया है।"

उन्होंने चश्मा लगाकर मेरी तरफ़ देखा। "तू?" फिर उन्होंने हाथ हिलाया। "चल, भर। हाँ, सुन — बोरे गीले नहीं हैं? अगर मिल वाले ने कहा कि गीला है, तो पैसा कटेगा, और मैं तेरे से नहीं काटूँगा। समझा?"

"समझ गया।"

बोरे उठाने लगा तो पीछे से एक पतली आवाज़ आई।

"मैं करता हूँ!"

जुगनू था। नंगे पाँव, घुटने पर पुराना निशान, और ऐसा चेहरा जैसे वो दुनिया का सबसे बड़ा काम करने आया हो।

"तू कहाँ से?"

"मैंने सुना तेरी गाड़ी चल पड़ी," उसने कहा। "मैं आ गया।"

"तेरी उम्र क्या है?"

"ग्यारह।" उसने एक बोरा पकड़ा और खींचने लगा। "पर मैंने तीन साल से ढाबे के पीछे बोरियाँ खींची हैं। ये कुछ नहीं है।"

मैंने उसे रोका नहीं।

हमने तीस बोरे गाड़ी पर चढ़ाए। सूरज सिर पर आ गया था। मेरी कमीज़ पीठ पर चिपक गई। रद्दी की गंध — सूखी स्याही, धूल और पुराने अख़बारों की एक अजीब मीठी बदबू। हाथों पर काली स्याही लग गई और उन नाखूनों की लकीरों में भर गई जो कभी साफ़ नहीं होतीं।

जुगनू बोरा उठाते-उठाते रुककर बोला, "तेरी गाड़ी की आवाज़ बदल गई।"

"हाँ।"

"पहले वो खाँसती थी। अब वो बोलती है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "बोलती है?"

"हाँ। जैसे कोई बूढ़ा आदमी खुश होकर गुनगुनाता है।"

मेरा गला भर आया और मैंने तुरंत मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया। बच्चा क्या जाने।

लाला जी ने काग़ज़ पर लिखा — तीस बोरे, बारह किलोमीटर, नौ सौ रुपये, और नीचे उन्होंने अपना हस्ताक्षर किया। वो काग़ज़ मैंने मोड़कर जेब में रखा।

फिर मैं गाड़ी में बैठा। चाबी घुमाई। इंजन गरजा और गली की दीवारें उस आवाज़ से काँप गईं।

जुगनू पीछे बोरों पर बैठ गया।

मैंने गाड़ी निकाली।

शहर के बाहर की सड़क खुली थी। धूप तेज़ थी, पर हवा चल रही थी, और मैंने खिड़की पूरी खोल दी। हवा मेरे बालों में आ रही थी, जिनमें तेल और डीज़ल की महक थी। मैंने एक हाथ खिड़की के बाहर निकाल दिया।

मैं हँस रहा था।

पता नहीं क्यों। कोई मज़ाक नहीं हुआ था। नौ सौ रुपये का ठेका था। बारह किलोमीटर। तीस बोरे रद्दी।

पर मैं हँस रहा था, ऐसे जैसे कोई बच्चा पहली बार स्कूल जा रहा हो, अपना नया बस्ता लेकर, और उसे लग रहा हो कि पूरी दुनिया उसी के लिए बनी है।

सड़क के किनारे दूर-दूर तक पीले फूल खिले थे। एक बस हमें ओवरटेक कर गई और उसका हॉर्न ऐसा था जैसे कोई गा रहा हो। मैंने हॉर्न दबाया। रघुवीर का हॉर्न, थोड़ा बैठा हुआ, थोड़ा खुरदुरा।

मैंने धीरे से कहा, "पापा, सुन रहे हो? आज पहली कमाई है।"

हवा ने जवाब दिया। बस हवा ने।

काग़ज़ की मिल शहर के बाहर थी, एक बड़े सेहन के पीछे, जहाँ काग़ज़ के पहाड़ पड़े थे। वहाँ तौलने वाला एक आदमी था, पतला, हाथ में रजिस्टर।

"तीस बोरे?"

"तीस।"

उसने तौला। फिर उसने एक पर्ची काटकर दी — वज़न, तारीख़, गाड़ी का नंबर।

"गाड़ी का नाम?" उसने पूछा, और फिर खुद ही देखकर बोला, "रघुवीर।"

उसके मुँह से वो नाम सुनकर मेरे अंदर कुछ हिल गया।

"हाँ," मैंने कहा। "रघुवीर।"

"अच्छा नाम है," वो बोला, और आगे बढ़ गया।

मैंने वो पर्ची संभालकर रखी।

लौटते वक़्त बाईस नंबर टोल पर गाड़ी रोकनी पड़ी। कतार छोटी थी। काउंटर पर एक लड़का बैठा था, पतला, आँखों पर मोटा चश्मा, मुँह में पान। नाम पता नहीं, पर सब उसे टीटू कहते थे।

मैंने किराया बढ़ाया।

उसने पैसे गिने, रसीद निकाली, और फिर — जैसे किसी ने उसका हाथ रोक दिया हो — रुक गया।

"ये नाम?" उसने कहा।

"क्या?"

"गाड़ी पर। रघुवीर।"

"मेरे पापा का नाम है।"

वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा। उसकी आवाज़ नीचे गई, बहुत हल्की, जैसे वो अपने ही कानों से बचकर बोल रहा हो।

"इस नाके पर… इस नाम की गाड़ी…" वो रुका। फिर उसने रसीद फाड़ी और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "बारह रुपये। जा। पीछे गाड़ी है।"

"तू क्या कह रहा था?"

"कुछ नहीं। जा भाई। पीछे देख, कतार लग गई।"

मैंने पैसे दिए, रसीद ली और गाड़ी आगे बढ़ा दी।

पर मैंने सुना था। उसकी आवाज़ में वो कंपन थी जो झूठ में आती है — और उसके साथ एक और चीज़ थी, जो झूठ में नहीं आती। डर।

उसने कुछ देखा है। या कुछ सुना है। या किसी ने उसे कुछ बताया है, बहुत पहले, और वो अब तक भूला नहीं है।

मैंने रसीद जेब में रखी। उस पर आज की तारीख़ थी, गाड़ी का नंबर था, और नीचे टोल का नाम। मेरे पास अब एक और काग़ज़ था — पहली कमाई का काग़ज़।

लाला जी की दुकान पर बोरे उतारे। लाला जी ने पर्ची देखी, वज़न मिलाया, और फिर काउंटर से नोट गिनकर मेरे हाथ पर रखे।

नौ सौ। नौ सौ पूरे।

"काम ठीक किया," उन्होंने कहा। "गीला नहीं था। अगली बार भी आना। और सुन, तेरी गाड़ी की आवाज़ अच्छी है। पुरानी गाड़ियाँ ऐसी आवाज़ नहीं करतीं। तूने कुछ किया है।"

"थोड़ा," मैंने कहा।

बाहर आकर मैंने पैसे गिने। जुगनू सामने खड़ा था, बोरों की धूल से पूरा सफ़ेद।

"तेरे लिए क्या लूँ?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं।"

"कुछ तो ले।"

"मुझे पैसे नहीं चाहिए।" फिर उसने सोचा और बोला, "मुझे वो रसीद दे दे। जो टोल की है।"

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