A Dark Secret – Chapter 34
"क्यों?"
"मैं रखता हूँ। मेरे पास एक डिब्बा है। उसमें सब काग़ज़ रखता हूँ। तारीख़ें याद रहती हैं।"
मैंने उसे रसीद दे दी। उसने उसे दोनों हाथों से लिया, चार बार मोड़ा, और अपनी जेब में रख लिया जैसे कोई खज़ाना रख रहा हो।
शाम को मैंने हिसाब बैठाया। काग़ज़ पर, पेंसिल से, ट्रक के बोनट पर।
किराया — नौ सौ। डीज़ल — दो सौ बीस। हमाली — एक सौ बीस, दो आदमी, और जुगनू के लिए मैंने अलग से चालीस की मिठाई और चाय ली। बचे — पाँच सौ बीस।
कबीर दुकान पर बैठा था, कैलकुलेटर सामने।
"देख," मैंने कहा। "चार सौ और दो हज़ार…" मैं रुक गया। "ये तेरा हिस्सा।" और मैंने दो सौ उसके सामने रख दिए।
उसने पैसे उठाए। "बस?"
"और ये।" मैंने डेढ़ सौ और रख दिए। "ये हिस्सा नहीं है। ये काग़ज़ पर लिखा जाएगा। पहली किस्त। पीले ट्रक के दो हज़ार चार सौ में से।"
कबीर ने मेरी तरफ़ देखा।
फिर उसने रजिस्टर खोला, पन्ना पलटा, और उसमें लिखा — एक सौ पचास, पहली किस्त।
"तीस तारीख़," उसने धीरे से कहा। "आज तीस तारीख़ है।"
"तो?"
"कुछ नहीं।" उसने रजिस्टर बंद किया।
मैंने अपनी जेब देखी। एक सौ सत्तर रुपये बचे थे। पहली कमाई के बाद, सारा हिसाब चुकाने के बाद, मेरे हाथ में एक सौ सत्तर रुपये थे।
मुझे लगा जैसे मेरे हाथ में किसी ने सोना रख दिया है।
कबीर ने कलम रखी और बोला, "तू जल्दी बड़ा हो रहा है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि जो आदमी पहले दिन हिसाब बैठाकर हिस्सा देता है, वो जल्दी बड़ा हो जाता है।" उसने मुँह फेर लिया। "ये मेरे लिए ठीक नहीं है।"
मैंने उसे देखा।
"क्यों ठीक नहीं?"
"क्योंकि मुझे तुझे बच्चा समझकर रखना था।" उसकी आवाज़ नीचे गई। "और बच्चे से हिसाब रखना आसान होता है।"
वो फिर कुछ नहीं बोला। उसने कैलकुलेटर उठाया और बटन दबाने लगा, हालाँकि सामने कोई हिसाब नहीं था।
मैं समझ गया कि वो झूठ नहीं बोल रहा था। वो डर रहा था। पर ये डर उस डर से अलग था जो काग़ज़ पर मिटे हुए नाम के वक़्त उसकी आवाज़ में था। ये डर अपने ही भविष्य का था, और उसी का सबसे ज़्यादा डर होता है।
मैं बाहर निकला।
शाम ढल रही थी। ट्रांसपोर्ट नगरी में शाम का मतलब है कि गाड़ियाँ वापस आ रही हैं और ढाबों की भट्टियाँ जल चुकी हैं। मैं सलीम के ढाबे की तरफ़ चल पड़ा। पैर थके हुए थे, शरीर पर रद्दी की गंध थी, और मेरी जेब में एक सौ सत्तर रुपये थे जो किसी सोने से कम नहीं लग रहे थे।
मैं सड़क पार कर रहा था, और ढाबे की रोशनी दूर दिख रही थी, जब सामने कोई आकर खड़ा हो गया।
चौड़ा शरीर। भौंह पर कटा निशान। गले में काला धागा।
कालू।
वो मुस्कुराया। उसका मुँह मुस्कुराया, पर उसकी आँखें नहीं।
"कहाँ जा रहा है बेटा?"
"चाय पीने," मैंने कहा।
"चाय अच्छी चीज़ है।" वो मेरे पास आया। बहुत पास। इतना पास कि मुझे उसकी शर्ट पर पान की मीठी बदबू आई और उसकी जेब में पड़ा लोहा ठक बजा।
फिर वो झुका। मेरे कान के बहुत पास आया, इतना पास कि मैं उसकी साँस की गरमी सुन सकता था, और धीरे से बोला।
"कुछ आवाज़ें सुननी नहीं चाहिए बेटा।"
मैं एक पल रुका।
मेरे अंदर गुस्सा आया — वो गुस्सा जो मेरे सीने से उठकर गले तक आता है और वहाँ अटक जाता है। मेरा जब गुस्सा आता है, मेरी आवाज़ धीमी हो जाती है। ये मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है और मैं जानता हूँ।
पर मैंने हाथ नहीं उठाया। मैंने कुछ नहीं किया।
मैं मुस्कुराया।
"भाई साहब," मैंने कहा, "आपकी जेब में जो बजता है, वो भी एक आवाज़ है।"
कालू का मुँह सख़्त हो गया।
"और आवाज़ें," मैंने कहा, "सिर्फ़ बंद करने से बंद नहीं होतीं। वो तेज़ हो जाती हैं। जैसे दीवार के पीछे बजता रेडियो।"
"तू ज़्यादा बोल रहा है।"
"मैं तो सुन रहा हूँ, भाई साहब। ये काम ही है मेरा। बोलना तो आपने शुरू किया था।"
वो मुझे देखता रहा। फिर वो हँसा — छोटी सी हँसी, जैसे किसी ने सुना हुआ मज़ाक दोबारा याद किया हो।
"तेरे पापा भी ऐसे ही बोलते थे," उसने कहा। "बहुत हिम्मत वाले थे।"
और वो पलट गया।
मेरे अंदर कुछ टूटा। वो नाम — मेरे पापा — उसके मुँह से इतनी आसानी से निकल गया, जैसे वो उन्हें रोज़ याद करता हो।
वो दो कदम चला।
और मैंने कहा।
"और हाँ, भाई साहब।"
वो रुका। पलटा नहीं।
"मोती की केबल काटते वक़्त भी वही आवाज़ आई थी।"
कालू के कदम वहीं जम गए।
एक कदम उठा हुआ, हवा में। ऐसे ही रुक गया।
और उसकी जेब में जो लोहा बजता रहता था — पूरे दिन बजता था, हर वक़्त बजता था, जैसे उसकी साँस उसी में चल रही हो — वो रुक गया।
पहली बार।
सिर्फ़ एक पल के लिए, उस सड़क पर, ट्रकों के शोर के बीच, मुझे कुछ नहीं सुनाई दिया।
फिर बजना शुरू हुआ, और इस बार वो ठीक ताल में नहीं था। ठक… ठक-ठक… ठक।
जैसे किसी आदमी के हाथ काँप रहे हों।
वो नहीं पलटा। उसने कुछ नहीं कहा। वो बस चल पड़ा — पहले धीरे, फिर तेज़, फिर इतना तेज़ कि मुझे लगा वो लगभग भाग रहा है — और अंधेरे में घुल गया।
मैं वहीं खड़ा रहा।
मेरे हाथ अब भी ठंडे थे और मेरी जेब में एक सौ सत्तर रुपये थे, एक पीतल का पत्ता था, दोनों रुमाल थे, एक छोटा नट था, एक टोल की रसीद थी और एक मिल की पर्ची थी।
मैंने धीरे से साँस ली।
और ढाबे की तरफ़ बढ़ गया — चाय पीने, क्योंकि मेरी चाय ठंडी हो रही थी और आज मैंने पहली कमाई की थी।
॥
कालू ने कोई जवाब नहीं दिया।
वो बस पलटा।
धीरे, बहुत धीरे, जैसे कोई भारी लोहे का दरवाज़ा अपनी मरज़ी से खुलता है।
सड़क की पीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसका मुँह अब मुस्कुरा नहीं रहा था। भौंह का कटा निशान सिकुड़ा हुआ था और आँखें — आँखों में मैंने वो देखा जो मैंने उम्मीद नहीं की थी।
डर।
एक पल के लिए। बस एक पल। जैसे अंधेरे कमरे में बिजली की एक झलक जो कुछ दिखा दे और फिर सब वापस अंधेरा।
फिर वो आँखें सख़्त हुईं। उसने गर्दन घुमाई। और चल पड़ा।
इस बार वो भागा नहीं। इस बार वो सीधा चला, कंधे जमाए हुए, जैसे उसने अपने डर को गले में घोंटकर पेट में डाल दिया हो।
मुझे लगा, अगर वो भागता तो अच्छा था। भागते हुए आदमी को पकड़ा जा सकता है। जो अपने डर को पी जाए, उसे नहीं।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ ठंडे थे। मैंने अपनी उँगलियाँ देखीं — उन पर उस दिन की रद्दी की कालिख और डीज़ल की लकीरें थीं। हाथ नहीं काँप रहे थे। अंदर कुछ और काँप रहा था।
और मेरे कान में बार-बार एक ही लाइन बज रही थी।
तेरे पापा भी ऐसे ही बोलते थे।
उसने ये नहीं कहा कि तेरे पापा अच्छे आदमी थे। उसने ये नहीं कहा कि भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। उसने कहा — बहुत हिम्मत वाले थे।
हिम्मत वाले। भूतकाल में। जैसे कोई पुराना हिसाब बंद कर रहा हो।
मैंने साँस ली और ढाबे की तरफ़ चल दिया।
सलीम अपनी केतली के पास खड़ा था। उसने मुझे देखा, फिर मेरे पीछे अंधेरे की तरफ़ देखा, फिर फिर मुझे देखा।
"कालू से बात हुई?" उसके हाथ केतली पर रुक गए।
"चाय मिली," मैंने कहा। "बात नहीं।"
"उससे बात करना अच्छी बात नहीं है, भाई।"
"मैंने नहीं की।" मैंने मिट्टी का कटोरा आगे बढ़ाया। "उसने की।"
सलीम कुछ देर मुझे देखता रहा। फिर उसने कटोरा भरा, ऊपर से दूध की एक परत डाली और मेरी तरफ़ सरका दिया।
"चीनी कम है?" उसने पूछा।
"ठीक है।"
"आज तीस बोरे उठाए तूने। कमर दुखेगी सुबह।"
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