A Dark Secret – Chapter 316
तभी मेरी नज़र स्कूल की दीवार पर पड़ी जहाँ नामों का फलक लगा था — "हमारे तेज़ बच्चे"। छोटे-छोटे नाम, सुनहरे अक्षरों में। तीसरी कक्षा वाला खाना खाली पड़ा था, बस एक जगह चिपके काग़ज़ की खाली जगह, जहाँ कभी कोई नाम चिपका था और अब रबर से मिटा दिया गया था — इतनी ज़ोर से मिटाया गया कि काग़ज़ फट गया था।
मैंने जेब से नोटबुक निकाली और पेंसिल से लिखा — "स्कूल — शालिनी की जगह फटी। रिया का नाम भी उसी फलक पर था क्या?"
जवाब नहीं पता था।
मैंने फोन निकाला और चड्ढा जी को मिलाया। दो बार बजा, फिर उठाया गया।
"हाँ हाँ, मीरा जी।"
"चड्ढा जी, आज मेरी ड्यूटी नहीं है। पर मुझे अस्पताल आना है।"
"आज नहीं।" उसकी आवाज़ सूखी थी। "परमिट का काम चल रहा है। कोई आवाज़-वाज़ नहीं सुननी — समझीं?"
"मैं रामदीन चाचा से मिलने आ रही हूँ।"
वह चुप रहा। फिर बोला, "वो बेंच पर नहीं रहता आजकल।"
"फिर कहाँ रहता है?"
"पूछो मत।" उसने कहा। "और मीरा — तेरी जगह अभी सुरक्षित है। भड़काओ मत।"
उसने फोन काट दिया।
साढ़े छह बजे मैं अस्पताल पहुँची। एम्बुलेंस गेट के बाहर खड़ी की। अंदर नहीं गई। अस्पताल के पीछे की तरफ़ गई — जहाँ पुरानी दीवार है, जिस पर कभी सफ़ेदी थी और अब बस चूने के धब्बे बचे हैं। वहाँ पीछे कूड़े के पास बेंच पड़ी थी, और उस पर वही भूरी जैकेट।
रामदीन बैठा था। आसमान देख रहा था।
मैं उसके सामने बैठ गई। घुटनों के बल, बस ऐसे ही।
"चाचा।"
उसने नज़र नहीं हटाई। "बेंच पर क्यों नहीं बैठती?"
"क्योंकि वहाँ आप नहीं बैठते।"
वह हँसा। छोटी सी हँसी। फिर उसने जेब से पान मसाला निकाला और मुँह में रखा।
"चाचा, मुझे सब बताओ।" मैंने कहा। "मैं तीसरी हूँ, मुझे डर नहीं लगता।"
उसका हाथ रुक गया। उसने मेरी तरफ़ देखा — पहली बार सीधा, बिना घुमाए।
"तीसरी?" उसने पूछा।
"उस लाठी वाली बूढ़ी ने कहा था — पहली रीना, दूसरी शालिनी की माँ, अब मैं।"
"वो बुढ़िया अभी भी मिलती है?" उसने नज़र फेर ली। "पर उसकी बात सही है।"
"क्या सही है?"
"तीन नाम।" उसने कहा। "यह महीना तीन नाम का है।"
उसने खाली जगह में कुछ देखा, जैसे वहाँ कोई बैठा हो जिसे सिर्फ़ वह देख सकता था।
"मीरा, यह शहर पहले ऐसा नहीं था।" वह धीरे बोला। "चालीस साल पहले सरोज नगर के पश्चिम में बस एक कब्रिस्तान था। दूर तक खाली ज़मीन। हम तीन लोग थे जो वहाँ जाते थे — मैं, बाबूलाल, और एक लड़की।"
"कौन लड़की?"
वह रुका। उसने आसमान देखा। फिर ज़मीन।
"उसका नाम…" उसने शुरू किया, और फिर उसके गले से आवाज़ निकलनी बंद हो गई। जैसे कोई तार खिंच गया हो। उसका मुँह खुला रह गया, फिर बंद हो गया, फिर उसने सिर हिलाया।
"फिर वही," उसने कहा। "फिर वही रुक जाता है।"
"नाम मत बताओ। पहले बताओ कि हुआ क्या था।"
उसने पान मसाला थूका। दीवार की तरफ़।
"हरनाम परिवार ने वह ज़मीन खरीदी। कब्रिस्तान था, इसलिए सस्ती मिली। उन्होंने कब्रें हटवाईं, पत्थर उठवाए, और वहाँ कॉलोनी बनाईं। शांति विहार। ग्रीन पार्क। हरनाम एन्क्लेव।" उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। "पर ज़मीन खरीदने से पहले उन्होंने एक काग़ज़ पर हस्ताक्षर करवाए। उस ज़मीन के हर पुराने नाम को नए नाम से बदलने का सौदा। जो नया घर वहाँ बने, उस घर से एक नाम लिया जाए, और बदले में परिवार को बढ़ती मिले।"
"और वे नाम उठाए जाते हैं।"
"जो नाम लिखे जाते हैं, वे उठा लिए जाते हैं," उसने कहा। "पहले नाम जाता है, फिर गली, फिर आवाज़। और फिर वह आदमी खुद नहीं जानता कि वह कौन था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "और आपने उस लड़की का नाम याद रखा था।"
"हाँ।" उसने कहा।
"और बोल नहीं पाए।"
"एक रात।" उसने आँखें बंद कर लीं। "वह मेरे पास आई थी। कहा था — 'मेरा नाम बोल दो, रामदीन।' मैंने कहा था — 'कल बोलूँगा।' अगली सुबह वह…" वह रुका। मुँह खुला रह गया। वह गले पर हाथ रखकर खाँसा। "मैं तुझे और नहीं बता सकता। क्योंकि मैं खुद आधा भूल चुका हूँ।"
"आधा क्या?"
"अपना ही।" उसने कहा। "मुझे याद है कि मैं यह शहर नहीं छोड़ सकता। मैंने बस स्टैंड से आगे जाने की कोशिश की थी — तीन बार। हर बार रास्ता घूमकर वापस इसी चौराहे पर ले आया। मुझे याद है कि कुछ खोया है, पर क्या खोया है — वह नहीं।"
मैंने उसका हाथ थाम लिया। ठंडा था।
"चाचा, एक औरत थी। रंग में साँवली, लंबी।" मैंने कहा। "जो रात की ड्यूटी में थी। जो मुझसे पहले यह गाड़ी चलाती थी।"
उसने हाथ नहीं छुड़ाया। "किसकी ड्यूटी?"
"निशा वर्मा की।" मैंने कहा।
उसकी आँखें खुलीं। फिर उसने देखा — जैसे कुछ अंदर हिला हो।
"निशा," उसने कहा। "निशा।" फिर वह झुककर बैठ गया। "हाँ। यह नाम मुझे याद आता है। पर यह वह लड़की नहीं थी।" वह खाँसा। "निशा मेरी बेटी जैसी थी। छोटी। ड्राइवर थी। मेरी जगह उसने गाड़ी संभाली।"
"उसके साथ क्या हुआ?"
"छब्बीस मार्च।" उसने कहा। "उसी दिन मैं अस्पताल आया था। उसी दिन चड्ढा जी ने मेरी ड्यूटी हटा दी थी। उसी दिन…" वह रुका। फिर उसकी आवाज़ बदल गई — धीमी, जैसे किसी और की। "'चाचा, मैं आज एक नाम लिखने जा रही हूँ।' उसने कहा था। 'किसका?' मैंने पूछा। उसने कहा — 'मेरा खुद का।' मैं हँसा था। मैंने कहा — 'पागल है।'"
मैं खड़ी हो गई। "कहाँ लिखने?"
"हवेली।" उसने आँखें मलीं। "उसने कहा था — हरनाम हवेली, पुराना बाज़ार। वहाँ जो रजिस्टर है, उसमें अपना नाम लिखवाने जा रही हूँ। दादा जी के काग़ज़ पर।" वह रुका। "मैंने उसे रोका नहीं। मैंने कहा था — 'जा, देख ले।'" उसने अपना सिर पकड़ लिया। "यह मुझे याद है। यह सब याद है। फिर क्यों कुछ और याद नहीं?"
"क्योंकि वह नाम मिटा है," मैंने कहा। "और जो नाम मिटता है, उसकी याद भी मिटती है।"
मैं उसके पास ही बैठ गई। दीवार में टिक गई।
"चाचा, वह औरत — निशा की माँ — छह बजे कब्रिस्तान में मिलेगी। उसके पास एक काग़ज़ है जिस पर मेरा नाम है।"
रामदीन ने सिर उठाया। "मत जा।"
"मुझे जाना है।"
"मीरा।" उसने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ सूखी थी, पर मज़बूत। "कब्रिस्तान में वह औरत तेरे लिए कुछ लेकर आएगी। पर वह काग़ज़ जो वह देगी — वह उसका नहीं है। वह उसकी बेटी का है। तू उसे पढ़ेगी और तेरी ज़िंदगी बदल जाएगी।"
"मेरी ज़िंदगी पहले से बदली हुई है।" मैंने कहा। "मेरी बेटी का नाम मिट रहा है।"
वह चुप बैठा रहा। फिर उसने मेरी नोटबुक माँगी।
"दे।"
मैंने दी। उसने पेंसिल नहीं ली। अपनी उँगली उठाई, उसमें थूक लगाया, और सीधे पन्ने पर लिखने लगा, बिना हिले। मैंने झुककर देखा — उसकी उँगली से उभरते अक्षर, हल्के नीले, जैसे किसी भीगी उँगली से सूखी दीवार पर लिखा जाए।
"हरनाम हवेली, पुराना बाज़ार।"
"यह तो मुझे पता है," मैंने कहा।
उसने उँगली नीचे की। मेरे हाथ पर रखी।
"वहाँ जाना," उसने कहा, "पर अकेले नहीं।"
तभी अस्पताल के अंदर से किसी ने आवाज़ दी — "रामदीन!" यह बाबूलाल था, गार्ड, जो पीछे के दरवाज़े से आ रहा था। उसके हाथ में एक कप थी।
"तू यहाँ क्या कर रही है?" उसने मुझसे पूछा।
"मिलने आई।"
"मिलने का यह वक़्त है?" उसने कप रामदीन को दिया और मेरी तरफ़ देखा। "चड्ढा जी ने कहा था — कोई आए तो बताओ।"
"तो बता देना।" मैंने कहा।
वह कुछ कहता, उससे पहले ही मेरा फोन बजा। शालिनी का नंबर।
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