A Dark Secret – Chapter 315
"मुझे नहीं पता।" उसने सामने की तरफ़ देखा, इमरजेंसी के दरवाज़े पर लगी पुरानी सूचना-पट्टिका पर। "पर मुझे याद है कि माँ एक दिन किसी औरत से लड़ी थी। घर के बाहर। कोई बिल्डर-विल्डर कह रही थी। माँ ने कहा था — 'मेरे बच्चे का नाम नहीं लिखवाऊँगी।'"
"उस औरत का नाम?"
"नहीं पता।" उसने आँखें बंद कीं। "पर माँ के हाथ में एक काग़ज़ था, जो उसने फाड़ दिया था।"
मैं खड़ी हो गई। "मुझे घर जाना है। तुझे भी।"
रास्ते में मैंने गाड़ी की खिड़की खोल दी। हवा आ रही थी, और वही महक भी आ रही थी जो मुझे शांति विहार में मिली थी — स्याही और गोंद। मैंने रिया को देखा, वह अपनी किताब में कुछ लिख रही थी।
"क्या लिख रही है?"
"मैं अपना नाम लिख रही हूँ," उसने कहा, "और शालिनी का। रोज़ लिखूँगी। जब तक याद रहे।"
शालिनी ने उसकी तरफ़ देखा। फिर अपनी कॉपी निकाली और लिखने लगी।
गाड़ी में पेंसिल के उस स्क्रैच की आवाज़ आ रही थी। मैंने स्टेयरिंग पर हाथ रखा।
घर पहुँचकर बच्चियाँ ऊपर चली गईं। मैं आँगन में गाड़ी की सर्विस करने लगी।
फिर रिया नीचे आई। एक काग़ज़ हाथ में था।
"माँ।" आवाज़ सीधी नहीं थी।
मैंने गाड़ी का बोनट बंद किया। "क्या हुआ?"
वह मेरी तरफ़ आई और काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। स्कूल की हाज़िरी का पन्ना था। सब्ज़ रंग की तीन कॉलम, सुरुचि लिखी स्याही की पंक्तियाँ। रिया के नाम वाली लाइन में कुछ था — पर साफ़ नहीं।
मैंने पन्ना पास लिया। रोशनी में देखा।
उसका नाम वहीं था, पर मिटता हुआ — पेंसिल से हल्का किया गया, जैसे किसी ने बार-बार रबर चलाया हो, और जूँ-जूँ करके मिट रहा हो।
मैंने रिया की तरफ़ देखा।
वह कुछ नहीं बोली। बस होंठ दबाए खड़ी रही।
मैंने काग़ज़ को मोड़कर अपनी जेब में डाला।
"कब का है यह पन्ना?"
"आज का।"
"मैडम ने दिया?"
"मैंने खुद निकाला।" उसने कहा। "अलमारी से, जब मैडम बाहर गई थीं।"
मैंने उसे अपनी तरफ़ खींचा। उसने पहली बार मेरे कंधे पर मुँह रख दिया।
कुछ देर बाद उसने कहा, "माँ, अगर मेरा नाम मिट गया, तो तू मुझे कैसे पुकारेगी?"
पेंसिल का उत्तम बना हुआ सवाल।
मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा।
"तेरे पास मेरी पेंसिल रहेगी," मैंने कहा। "मैं तेरा नाम रोज़ लिखूँगी। हर सुबह।"
"और अगर काग़ज़ ख़त्म हो गया?"
मैंने उसके माथे पर अपना हाथ टिकाया।
"तो मैं हवा पर लिखूँगी," मैंने कहा। "जब तक हवा है, तू है।"
वह हँसी। छोटी सी हँसी, जो गले में ही रुक गई।
ऊपर से शालिनी की आवाज़ आई — "मैम, एक मिनट?"
मैं सीढ़ियों के पास गई।
वह ऊपर की सीढ़ी पर बैठी थी, उसका बैग खुला पड़ा था।
"क्या हुआ?"
"मैम, मुझे कुछ याद आ रहा है," वह बोली। "मेरी माँ के पास एक रजिस्टर के बारे में कोई चर्चा करती थी। कोई आदमी था — काला कोट, चश्मा — वो कहता था कि 'इसमें नाम लिखना बंद करो, वरना तुम्हारा भी लिख जाएगा।'"
"मेरी माँ ने क्या कहा?"
"उसने कहा — 'इसीलिए तो लिख रही हूँ। जो लिखते नहीं, वो ही उठते हैं।'"
मैं सीढ़ी पर बैठ गई।
वह आदमी कौन था — यह मैं जानती थी। सिर्फ़ मनोहर हरनाम का मुंशी ही ऐसे बोल सकता था।
"शालिनी," मैंने कहा, "तेरी माँ ने कभी कोई चीज़ रखी थी जो किसी के पास हो? कोई पुरानी किताब? कोई काग़ज़?"
"उनके पास एक छोटा बक्सा था। लोहे का।" उसने अपना घुटना पकड़ा। "वो पापा ने कहीं रख दिया। मुझे नहीं पता कहाँ।"
मैंने रिया को आवाज़ दी।
"क्या हुआ माँ?"
"तुझे भूख लगी होगी। खाना खा। मुझे थोड़ी देर है।"
नीचे आँगन में आकर मैंने नोटबुक खोली, पेंसिल से रिया का नाम लिखा — साफ़, बड़ा। फिर शालिनी का। फिर रीना नायक का। फिर सुनीता चौहान का। नामों की सूची बढ़ती जा रही थी।
फिर मैंने नीचे एक नई लाइन जोड़ी —
"बक्सा — शालिनी के पिता के पास — लोहे का।"
तभी मेरा फोन बजा। अनजान नंबर।
मैंने उठाया।
सामने से वही औरत थी। "बेटा।"
"कौन?"
"मैंने तुझे छह बजे बुलाया था। कब्रिस्तान। तू आई?"
बजे कितने थे, मैंने मोबाइल में देखने की कोशिश की पर अंधेरा था। शायद पाँच बज चुके थे।
"मैं रास्ते में थी।"
"अच्छा।" वह रुकी। "तेरी बेटी का नाम मिट रहा है, है ना?"
मेरा हाथ चिपक गया फोन पर।
"आप कैसे जानती हैं?"
"क्योंकि मेरी बेटी का नाम भी इसी तरह मिटा था।" उसकी आवाज़ में जल्दबाज़ी नहीं थी, बस जानकारी। "पर वह मरने से पहले बोल गई थी।"
"क्या बोली थी?"
"कि नाम पहले उतरता है, फिर गली, फिर आवाज़।" वह हाँफी। "और तेरे पास सिर्फ़ छह बजे तक का वक़्त है। मैं कब्रिस्तान के गेट पर खड़ी हूँ। तेरे हाथ में जो काग़ज़ है, वो लेकर आ। जो मैं तुझे दूँगी, वो भी ले जाना।"
"रुकिए।" मैंने कहा। "आपकी बेटी कौन थी?"
वह कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा, "निशा वर्मा।"
फोन कट गया।
मैं आँगन में खड़ी रही। हाथ में नोटबुक, उस पर उस औरत का नाम अब भी नहीं लिखा था।
फिर सीढ़ियों से रिया की आवाज़ आई, "माँ, शालिनी कह रही है कि उसकी माँ ने कभी किसी को कुछ नहीं दिया — पर एक बात कही थी।"
"क्या?"
"कि 'जो नाम तुम्हारे पास है, वो किसी और के पास भी है।'"
मैंने नोटबुक बंद की।
"रिया," मैंने कहा, "चप्पल पहन। हमें निकलना है।"
॥
मैंने चप्पल पहन ली थी, पर रिया सीढ़ी पर बैठी रही।
"तू अभी क्यों नहीं चल रही?" मैंने पूछा।
"माँ, कहाँ?"
"कब्रिस्तान। उस औरत से मिलने।"
रिया ने अपने घुटनों को पकड़ लिया। "और स्कूल?"
मैं रुकी। सच कहूँ तो मैं चाहती थी कि वह कल स्कूल न जाए। एक दिन घर पर रहे। मेरे सामने रहे।
"कल तू स्कूल नहीं जाएगी," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि तेरे हाज़िरी के पन्ने से नाम मिट रहा है। और मैं नहीं चाहती कि वहाँ कोई तुझे ऐसे देखे जैसे तू कभी थी ही नहीं।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। सीधा। बिना पलक झपके।
"माँ, अगर मेरा नाम है, तो मैं जाऊँगी।" उसने कहा। "नाम छिपाने से थोड़े रहेगा। आप खुद कहती हो — जो नहीं दिखता, वो मिट जाता है।"
मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे ही शब्द वापस मेरे मुँह पर मार दिए हों। शालिनी के कमरे से आवाज़ आई — "मैम, मैं भी चलूँ?"
"नहीं," मैंने कहा। "तू यहीं रुक। दरवाज़ा अंदर से बंद कर लेना। किसी को मत खोलना।"
"अगर कोई कहे कि मैं शालिनी हूँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तो कहना — हाँ, हूँ। और अंदर नहीं आने देना।"
शालिनी सीढ़ी पर बैठी रही, और हम दोनों नीचे उतर आए।
मैंने एम्बुलेंस स्टार्ट की। पाँच बजकर पैंतालीस मिनट। रास्ते में रिया खिड़की से बाहर देखती रही। मैंने एक बार भी उसकी तरफ़ नहीं देखा। डर था कि अगर देखा तो कहीं कुछ ऐसा न बोल दूँ जो वह कभी न भूलती।
स्कूल के गेट पर मैंने गाड़ी रोकी। गार्ड ने सिर उठाकर देखा।
"इतनी सुबह?" उसने पूछा।
"आज ज़रूरी था," मैंने कहा।
रिया उतरी। बैग कंधे पर रखा। फिर वापस मुड़ी। "माँ।"
"हूँ।"
"आप यहीं रुकिए।" उसने कहा। "जब तक मैं ऊपर से हाथ न हिलाऊँ।"
मैं गाड़ी से बाहर खड़ी हो गई। रिया अंदर गई। मैंने गेट पर खड़े होकर उसे देखा। वह सीढ़ियों से ऊपर गई, बरामदे से होकर, और कक्षा की खिड़की के पास पहुँचकर उसने हाथ हिलाया।
मैंने हाथ नहीं हिलाया। बस देखती रही।
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