A Dark Secret – Chapter 314
मैं लौटकर सामने आई।
"अंदर कोई नहीं है," मैंने कहा। "पर सामान दो महीने से वैसा ही पड़ा है। कोई आया नहीं।"
शालिनी ने खिड़की की तरफ़ देखा। "मेरी माँ के बर्तन — वो कभी रात में बर्तन नहीं छोड़ती।"
रिया ने अचानक कहा, "माँ, यहाँ से अजीब बदबू आ रही है।"
"कहाँ से?"
"वहीं से। पीछे से। जैसे कोई काग़ज़ गीला हो।"
मैं फिर पीछे गई। शालिनी मेरे पीछे आई। रिया भी। मैंने पीछे के दरवाज़े के बगल की दीवार देखी।
दीवार पर नाम-पट्टे के निशान थे — चार कीलें, और उनके आसपास लकड़ी का हल्का निशान, ताज़ा। पट्टा जिस पर रीना नायक का नाम लिखा था, मैंने उतार लिया था। पर इस दीवार पर एक और पुराना निशान था — ज़्यादा बड़ा, ज़्यादा नीचे। पुराना वाला।
"यहाँ दो पट्टे लगे थे," मैंने कहा। "ऊपर-नीचे।"
शालिनी ने पहली बार आवाज़ धीमी की। "मेरी माँ का नाम ऊपर था। नीचे — मेरा।"
"तो तेरा पट्टा?"
"मैंने देखा था, कल। वह उतरा पड़ा था। फूलों में। मैंने उठाकर पीछे रख दिया।" उसने फूलों के पास जाकर झाँका। कुछ नहीं था। "यहाँ था।"
रिया ने रास्ते के दूसरी तरफ़ देखा और कहा, "वहाँ कोई बैठी है।"
गली के कोने पर, एक बूढ़ी औरत सीढ़ी पर बैठी थी, सामने एक थाली में सब्ज़ी काट रही थी, और उसके पास एक बकरी बँधी थी। उसकी उम्र सत्तर से ऊपर होगी। उसका दुपट्टा सिर पर था और हाथ सूखे, नसों वाले।
मैं उसके पास गई। "दादी, थोड़ी देर पहले मैं इस घर की तरफ़ आई थी। इस घर में जो औरत रहती हैं — रीना — वो कहाँ हैं?"
औरत ने चाकू रखा। मुझे देखा। फिर उस घर को देखा, फिर मुझे।
"कौन?" उसने कहा।
"रीना। रीना नायक। यह शालिनी उनकी बेटी है।"
औरत ने शालिनी की तरफ़ देखा, जो दूर खड़ी थी। फिर उसने धीरे से कहा, "उस घर में तो कोई औरत रहती ही नहीं थी, बेटा।"
मैं रुक गई।
"क्या?"
"हाँ, रहती थी।" उसने थाली से एक टुकड़ा उठाया और मुँह में रखा। "पर उसके बाद यहाँ कोई और नहीं आया। मैं दो महीने से देख रही हूँ, सुबह-शाम। ताला लगा रहता है। पर ताला किसने लगाया, यह मुझे नहीं पता। मैं तो बस इतना जानती हूँ कि जब वो औरत चली गई, तबसे इस घर में कोई नहीं रहा।"
"पर आपने कहा — कोई औरत रहती ही नहीं थी।"
"बोलने में मुझसे भूल हुई।" उसने दुपट्टा ठीक किया। "पर बेटा, एक बात पूछूँ?"
"पूछिए।"
"तू इस घर की तरफ़ दो दिन से बार-बार आ रही है।" उसने मेरी तरफ़ आँख उठाकर देखा। "कोई तुझे भेजता है क्या?"
मैंने कहा नहीं। वह मुस्कुराई नहीं। बस थाली उठाकर अंदर चली गई और दरवाज़ा बंद कर दिया।
मैं लौटकर आई। रिया मेरे पास आई।
"माँ, वो शालिनी को ऐसे देख रही थी जैसे उसे नहीं जानती?"
"वो भूल रही है," मैंने धीरे से कहा। "शहर के बाकी लोगों की तरह।"
शालिनी ने कहा, "मैम, वो चाबी। मैं लाऊँ?"
"हाँ। ला।"
वह ताला खोलने की कोशिश करने लगी — और मैंने देखा कि ताला बहुत सख़्त था, और कोई कुंजी-छेद ऐसा दोबारा देखकर मैंने कहा, "रीना की चाबी।
शालिनी ने अपनी जेब में डाल लिया। "हाँ।"
हम तीनों गाड़ी में चढ़े। शालिनी ने पीछे बैठकर पहली बार खिड़की से बाहर देखा और कहा, "मैम, अगर मेरी माँ को कोई याद नहीं करता, तो मैं क्यों करती हूँ?"
"क्योंकि तू उनकी बेटी है," मैंने कहा। "और क्योंकि तू उस काग़ज़ पर लिखी है।"
"किस काग़ज़ पर?"
"पीली कॉपी।" मैंने गाड़ी मोड़ी। "जो घर में जली पड़ी थी। उसका एक पन्ना बचा था — जिसमें तेरी माँ ने मेरा नाम भी लिखा था।"
शालिनी कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "मैम, आपको मेरी क्लास के बच्चों की आवाज़ें याद हैं?"
मैंने बैक मिरर में देखा। वह किसी की आवाज़ याद करने की कोशिश कर रही थी, जैसे हम नाम याद रखने की नई आदत डाल रहे थे। मैंने कहा, "पहले वाली गली से लूँगी। बाज़ार के पीछे से छोटा रास्ता है।"
मैंने गाड़ी उस गली में मोड़ी। पीछे बाज़ार का शोर था, आगे पुरानी इमारतें। एक चौराहे पर, जहाँ से गड्ढों वाली सड़क सीधी सरकारी अस्पताल की तरफ़ जाती है, मैंने गाड़ी धीमी की।
चौराहे के नुक्कड़ पर, एक रिक्शे के पीछे, एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। सफ़ेद बाल, झुकी कमर, हाथ में एक लाठी।उसने मेरी गाड़ी देखी और हाथ उठाकर रोकने का इशारा किया।
मैंने गाड़ी रोक दी।
वह गाड़ी के पास आई। मेरी खिड़की पर झुकी। उसकी आँखें धँसी हुई थीं, पर देखने में तेज़।
"तू तीसरी है इस महीने की," उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"पहली रीना थी," वह बोली। "दूसरी वो औरत जो शालिनी की माँ थी। अब तू।"
रिया ने पीछे से सिर उठाया।
"आप कौन हैं?" मैंने पूछा।
वह मुड़कर चलने लगी। फिर रुकी और बग़ल से बोली, "मेरा नाम कभी लिखा ही नहीं गया, इसलिए मैं अब भी यहाँ हूँ।"
"रुकिए —"
वह नहीं रुकी। सड़क के उस पार चली गई और दो इमारतों के बीच वाली सँकरी गली में घुस गई। मैंने गाड़ी से उतरकर देखा — गली खाली थी, कूड़े का ढेर और एक सूखा पेड़।
मैं गाड़ी में लौटी।
रिया ने कहा, "माँ, वो क्या बोली?"
"बाद में," मैंने कहा और गाड़ी स्टार्ट की।
अस्पताल पहुँचकर मैंने गाड़ी पार्किंग में खड़ी की। रिया और शालिनी को इमरजेंसी के बाहर बेंच पर बैठाया, और खुद अंदर गई। अनीता ड्यूटी पर थी।
मैंने उससे पूछा, "कल उस स्टोर से जो फाइल मिली थी — निशा वर्मा वाली — उसमें पता था? कोई पता?"
अनीता ने चारों तरफ़ देखा। "पता नहीं, मैम। उस फाइल में छब्बीस मार्च था, और उससे पहले वाला पन्ना भी नहीं था। ऐसा लगा कि पन्ना निकाल दिया गया है।"
"किसके केबिन में?"
"चड्ढा जी की अलमारी में।"
मैंने उसे धन्यवाद दिया और बाहर आई।
रिया और शालिनी बेंच पर बैठी थीं, और शालिनी रिया को कुछ बता रही थी। मैं दूर ही रुक गई, सुनने के लिए। शालिनी कह रही थी, "मेरे पापा ने कहा था कि हम जल्दी दूसरे शहर चले जाएँगे। पर मुझे नहीं जाना।"
"क्यों नहीं?" रिया ने पूछा।
"क्योंकि जो नाम जाता है, वो वापस नहीं आता।"
मैं उनके पास गई और बेंच पर बैठ गई। मेरी जेब में माँ की संदूक से मिला वह काग़ज़ था — मकान खरीद का। मैंने उसे खोला और देखा। वही अधूरी लाइन। "होने वाली बच्ची का नाम …।"
"माँ," रिया ने कहा, "यह बच्ची कौन थी?"
"मैं," मैंने कहा।
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। "मैम, आपको अपना नाम किसने दिया?"
"मेरी माँ ने। लेकिन इस काग़ज़ पर नहीं लिखा।"
"तो लिखा कहाँ है?"
मैंने बेंच पर पीछे टेक लगाई और उस काग़ज़ को पूरा खोला। नीचे की तरफ़, चार गवाहों के नाम थे — एक के नाम पर स्याही फैली हुई थी, जैसे कोई टिप्पणी करके मिटाया गया हो।
"तीन गवाहों के नाम हैं," शालिनी ने उँगली रखी। "चौथे पर क्या लिखा था?"
"नाम मिट गया है।"
"तो आपका नाम भी मिट सकता है?"
"मेरा नाम रजिस्टर में है, शालिनी," मैंने धीरे से कहा। "और रजिस्टर सिर्फ़ नाम बोलने से बदलता है।"
वह एक पल चुप रही। फिर उसने कहा, "मेरी माँ ने भी आपका नाम लिखा था।"
"हाँ।"
"तो इसका मतलब वो भी किसी रजिस्टर के बारे में जानती थीं?"
मैंने सिर उठाया।
यह मैंने नहीं सोचा था।
"शालिनी," मैंने कहा, "तेरी माँ ने उस पीली कॉपी में मेरा नाम कहाँ से लिया?"
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