A Dark Secret – Chapter 313
"तू उसे वहीं रुकने दे। मैं आ रही हूँ।"
फोन काटकर मैंने फाइल वापस रैक पर रखी। घूमी। दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
तभी रोशनी कम हुई।
चड्ढा जी दरवाज़े पर खड़े थे।
"मीरा।" उन्होंने कहा। बहुत ठंडी आवाज़ में। "तू इस कमरे में कैसे आई?"
"दरवाज़ा खुला था।"
"चाबी किसकी है?"
"मेरे पास।"
"किसने दी?"
"यह मेरा सवाल नहीं है। मेरे सवाल का जवाब दो — शालिनी नायक का एडमिशन किसने रद्द किया?"
चड्ढा जी ने चश्मा ऊपर किया। "कौन सी शालिनी?"
"रीना नायक की बेटी।"
"कौन रीना नायक?"
वह ऐसे कह रहे थे जैसे सच में नाम नहीं सुना। उनकी आँखों में कोई झूठ नहीं था।
मैं उनके सामने से निकली। "ठीक है। मैं खुद ढूँढ लूँगी।"
"मीरा।" उन्होंने कहा। "तेरा परमिट रुका है। कल सुप्रिया से नए काग़ज़ देने को कहूँगा।"
मैं सीढ़ियों पर रुकी। "आप जो भी करना है कर लीजिए।"
मैं बाहर निकली। धूप आँखों में लगी। एम्बुलेंस का दरवाज़ा खोला। स्कूल की तरफ़ चली।
तभी जेब में फिर फोन बजा। स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था — सिर्फ़ एक नंबर।
"मीरा जोशी।"
"कौन?"
"एक बात कहूँ?"
"कौन बोल रहा है?"
"तुम्हारे लिए ज़रूरी है।वह आवाज़ औरत की थी, कुछ काँपती हुई। "तुम्हारे हाथ में जो काग़ज़ है ना — जिस पर 'होने वाली बच्ची का नाम' लिखा है।"
मैंने ब्रेक लगाया। गाड़ी सड़क के किनारे रुकी।
"कौन बोल रही है?"
"उस काग़ज़ पर तुम्हारा नाम नहीं लिखा।" वह औरत बोली। "तुम्हारा नाम किसी और काग़ज़ पर लिखा है। और वह काग़ज़ मेरे पास है।"
"कौन हो तुम?"
"आज शाम।" उसने कहा। "अस्पताल के पीछे, पुराने कब्रिस्तान की चारदीवारी के बाहर, छह बजे। अकेले आना। और काग़ज़ लेकर आना।"
"इससे पहले कि मैं कुछ कहूँ — तुमने उस रात फोन किया था। तुमने कहा था कि मेरा नाम तुम्हारी बेटी के नाम के बगल में लिखा है।"
वह चुप रही। बहुत देर।
"हाँ।" उसने कहा। "मैंने कहा था। और मैं झूठ नहीं बोली थी। पर पहले मैं वह नाम बोल नहीं पायी।"
"कौन सा नाम?"
उसने फोन काट दिया।
मैं कुछ देर गाड़ी में बैठी रही। सामने सड़क पर बच्चे खेल रहे थे। पीछे कहीं सायरन की आवाज़ आई और गुज़र गई।
फिर मैंने गाड़ी शुरू की और स्कूल की तरफ़ बढ़ी।
वहाँ रिया और शालिनी कंपाउंड की दीवार के सहारे खड़ी थीं। शालिनी का बैग गिरा हुआ था। रिया मेरी गाड़ी देखकर सीधी हो गई।
"माँ, शालिनी कह रही है कि अब कोई उसका नाम नहीं लेता — बस मैं लेती हूँ।"
मैंने गाड़ी रोकी। उतरी। शालिनी की तरफ़ देखा। वह मेरी तरफ़ देख रही थी, आँखें सूखी, पर होंठ हिल रहे थे — जैसे कोई नाम अंदर ही अंदर खुद से बोल रही हो।
मैंने उसका बैग उठाया।
"आज शाम तुझे एक जगह चलना है।" मैंने कहा। "मेरे साथ।"
"कहाँ?"
"पहले गाड़ी में बैठ।"
मैंने पीछे का दरवाज़ा खोला। दोनों बैठ गईं। मैंने गाड़ी स्टार्ट की और बैक मिरर में देखा। स्कूल के गेट पर मैडम खड़ी थीं और उनकी नज़र सीधी मेरी एम्बुलेंस पर थी। उन्होंने कुछ कहा जो सुनाई नहीं दिया, पर होंठ हिले थे। फिर वे अंदर चली गईं।
गाड़ी में बस रिया की आवाज़ थी। "माँ, कल स्कूल में मैडम ने मेरा नाम तीन बार पुकारा — जैसे उन्हें यक़ीन न हो कि मैं हूँ।"
मैंने स्टेयरिंग पर हाथ कसा। "अब नहीं। घर चलकर सब बातें।"
तभी पीछे से शालिनी ने कहा, "मैम, आपने कहा था कि कुछ नाम बोलने से पहले सोचने पड़ते हैं। क्या वह सच है?"
"किसने कहा?"
"आपने कहा था। मुझे याद है। कल रात। जब आप आँगन में खड़ी थीं। आप किसी से बात कर रही थीं फोन पर।"
मैंने बैक मिरर में देखा। उसकी आँखें सीधी थीं।
"तुमने सुना?"
"हाँ। आपने कहा था — जब तक वो उठे, बहुत नाम बोलने पड़ेंगे।" वह एक पल रुकी। "किसका नाम उठेगा, मैम?"
मैंने गाड़ी मोड़ी, घर की गली में।
"कई नाम।" मैंने कहा। "और सबसे पहले — तेरी माँ का।"
वह कुछ नहीं बोली। पर रिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
घर पहुँचकर मैंने गाड़ी आँगन में खड़ी की। दोनों बच्चियाँ नीचे उतरीं। मैं भी उतरी। और तभी नज़र दीवार पर पड़ी।
पेंसिल से लिखी वह लाइन अब भी थी। "सुमित्रा देवी — पड़ाव गली — नहीं उठा।"
पर उसके नीचे एक लाइन और जुड़ गई थी — वही महीन लिखाई, वही अंदाज़ —
"शाम छह बजे — कब्रिस्तान — ज़रूरी है।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। आँगन खाली था। बूढ़े जोड़े की खिड़की बंद थी।
रिया ने मेरी नज़र का रुख़ देखा। "माँ, क्या हुआ?"
"कुछ नहीं।" मैंने कहा। "तू अंदर जा। शालिनी के लिए पानी ले।"
वह गई।
मैं आँगन में अकेली खड़ी रही। दीवार पर लिखी लाइन को देखती रही।
छह बजे। कब्रिस्तान।
मैंने अपनी जेब से वह काग़ज़ निकाला — "होने वाली बच्ची का नाम …" और उसे देखा।
फिर धीरे से बोली, अपने ही सुनने के लिए, "मेरा नाम किसने लिखा?"
और ऐसा लगा जैसे दीवार ने कुछ सुना हो, हवा ने कुछ हिलाया हो।
अंदर से रिया की आवाज़ आई, "माँ, शालिनी कह रही है कि उसका स्कूल का कार्ड भी खाली मिला है — उस पर सिर्फ़ फोटो है, नाम नहीं।"
मैंने आँखें बंद कीं।
अब बात सिर्फ़ नामों की नहीं थी। अब काग़ज़ खुद खाली हो रहे थे।
और छह बजे तक मुझे कब्रिस्तान पहुँचना था — उस औरत से मिलने जिसके पास वह काग़ज़ था जिस पर मेरा नाम था।
॥
घर की गली से निकलते वक़्त मैंने बैक मिरर में फिर आँगन की दीवार देखी। वह लाइन वहीं थी, और शाम छह बजे वाली बात मेरे पीछे गाड़ी में बैठी थी — रिया और शालिनी, दोनों चुप, और यह चुप्पी पहली बार नहीं थी जो मुझे चुभ रही थी।
"शांति विहार चलेंगे," मैंने कहा। "तेरा घर।"
शालिनी ने पीछे से कहा, "चाबी मेरे पास है।"
"तो अच्छा है।"
रास्ते में उसने एक बात कही — "मैम, कल रात मुझे अपने घर का दरवाज़ा याद आया, फिर भूल गई। फिर याद आया। ऐसा दो बार हुआ।"
मैंने कुछ नहीं कहा। गाड़ी सड़क के उन गड्ढों से गुज़री जो नई कॉलोनी और पुराने बाज़ार के बीच पड़ते हैं।
शांति विहार फेज़ दो। गली सात। मैंने गाड़ी उसी घर के सामने रोकी जहाँ पिछली बार रीना नायक का नाम मिला था। दरवाज़े पर ताला लगा था — बाहर से, एक नया ताला, चमकता हुआ।
शालिनी ने अपनी जेब से चाबी निकाली, पर ताला ज़्यादा बड़ा था। वह अंदर नहीं जाती। उसने ताला हिलाया।
"यह मेरा नहीं है," उसने कहा। "मैंने यह नहीं लगाया।"
रिया ने मेरी कमर पकड़ ली। "माँ, यहाँ कोई तोड़-फोड़ करेगा?"
"नहीं।" मैंने चारों तरफ़ देखा। गली में कोई नहीं था, पर हर घर के दरवाज़े पर नया ताला नहीं था। सिर्फ़ इसी पर।
मैंने रिया और शालिनी को गाड़ी के पास खड़ा रहने को कहा, और घर के पीछे की तरफ़ गई। पीछे की गली और सँकरी थी, दीवार से लगाकर नाली में पानी बह रहा था जिसमें प्लास्टिक की थैली फँसी थी। पीछे की खिड़की पर सलाखें थीं, ज़ंग लगी। मैं सलाखों के बीच से झाँकी।
अंदर सामान वैसे ही पड़ा था — सोफे पर चादर, टेबल पर बर्तन, सूखे पड़े। खाने की गंध नहीं, बस धूल। फर्श पर एक मोटी परत, जैसे दो महीने का पूरा धूल एक साथ आकर बैठ गया हो। कोने में बच्चों का एक स्कूल बैग टंगा था।
मैंने खिड़की का शीशा सूँघा। वही महक — स्याही और गोंद, जो अब मेरी नाक को आदत हो गई थी।
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