A Dark Secret – Chapter 312
रिया ने उसका हाथ पकड़ा। "शालिनी। तेरा नाम शालिनी नायक है। तू शांति विहार फेज़ दो में रहती है। तेरे पापा डॉक्टर हैं। तेरी माँ का नाम रीना है। तेरी नानी सुनीता चौहान थीं जो पिछले साल ठंड में गईं।"
शालिनी के हाथ से चाय का कप छूटा। चीनी मिट्टी का कप फ़र्श पर गिरा — पर नहीं टूटा। लुढ़क गया, चाय फैल गई। रिया एक कदम पीछे हटी।
शालिनी ने रिया की तरफ़ देखा।
"कैसे पता तुझे?" उसने पूछा। "मैंने तुझे कभी नानी के बारे में नहीं बताया।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। रिया ने कंधे उठाए। "तूने बताया था। दो दिन पहले। सोते वक़्त।"
शालिनी का चेहरा फीका पड़ गया।
"नहीं।" उसने कहा। "मैंने नहीं बताया।"
"तूने बताया—"
"रिया, मैंने नहीं बताया।" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था।"
कमरा सुन्न हो गया।
शालिनी धीरे-धीरे नीचे बैठ गई, फ़र्श पर, चाय के धब्बे के पास। उसने अपने हाथ देखे। "जब तूने नाम बोला — सुनीता चौहान — मेरे सिर में एक चीज़ चली गई। जैसे कोई दरवाज़ा खुला हो और फिर तुरंत बंद हो गया।"
मैंने उसके सामने घुटने के बल बैठकर उसका हाथ पकड़ा।
"शालिनी। सुन मेरी बात। तेरा नाम शालिनी नायक है। तेरा घर शांति विहार फेज़ दो, गली सात में है। तेरे पापा का नाम अरुण नायक है — वे अस्पताल में ड्यूटी करते हैं। तू कक्षा आठ में है। तूने कल रात मेरा हाथ पकड़ा था और कहा था — मुझे अपनी माँ की याद आती है।"
वह मेरी तरफ़ देखती रही। फिर धीरे से बोली, "माँ।"
"हाँ। रीना।"
"रीना।" उसने दोहराया। आवाज़ में कुछ था — जैसे कोई नाम बहुत दूर से आ रहा हो।
"याद है तुझे?"
वह कुछ देर सोचती रही। फिर बोली, "पीले रंग की कॉपी।"
"क्या?"
"माँ की पीली कॉपी। मुझे याद आ रहा है। वह उसमें कुछ लिखती थी। रात में। बत्ती बंद करके, बैठकर।"
"क्या लिखती थी?"
"नाम।" उसने कहा। "बहुत सारे नाम। और तारीख़ें। और फिर वह मुझसे पूछती थी — 'तेरी क्लास में कितने बच्चे हैं? सबके नाम बता।'"
मैंने उसका हाथ थोड़ा दबाया।
"और?"
"और मैं बताती थी।" शालिनी की आँखें भर आईं। "मुझे नहीं पता क्यों। माँ बोलती थी कि यह खेल है। नाम याद रखने का खेल।"
रिया चुप खड़ी थी। मैंने पलटकर देखा — उसके चेहरे पर वह भाव नहीं था जो बच्चों के चेहरे पर होता है। कोई बात उसके अंदर जम गई थी।
"शालिनी।" मैंने कहा। "तू घर चल। आज स्कूल मत जा। मैं तेरे पापा को फोन करूँगी—"
"नहीं।" उसने कहा। "मैं स्कूल जाऊँगी। अगर मैं नहीं गई तो वो कहेंगे कि वह बच्ची कभी आई ही नहीं थी। मैं जाऊँगी। मैं अपनी जगह पे बैठूँगी। मैं मैडम को अपना नाम बताऊँगी।"
"शालिनी—"
"मैम, अगर मैं नहीं गई, तो मेरा नाम सच में मिट जाएगा। माँ का नाम मिटा, मेरा भी मिटने लगेगा। मैं नहीं जाने दूँगी।"
वह उठी। कप उठाया, पोछा लिया। मैंने देखा उसके हाथ नहीं काँप रहे थे। उसने रिया की तरफ़ देखा।
"तू मेरे साथ आएगी?"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
"हाँ।" रिया ने कहा।
दोनों तैयार होकर नीचे उतरीं। मैंने उन्हें एम्बुलेंस से स्कूल छोड़ा। गाड़ी में बैठकर मैंने शालिनी से कहा, "सुन। तेरे पास मेरा नंबर है। स्कूल में कुछ भी अजीब लगे — कोई तुझे नहीं पहचाने, कोई तेरी किताब न मिले — तुरंत मुझे फोन करना।"
"मैम, आप बस एक बात बताइए।" उसने पूछा। "जो नाम मिटता है, वह सिर्फ़ काग़ज़ों से मिटता है या लोगों के मन से भी?"
मैंने स्टेयरिंग पकड़ी।
"पहले काग़ज़ों से। फिर लोगों के मन से। फिर खुद इंसान के मन से।"
वह चुप हो गई। फिर बोली, "तो मुझे सबको याद दिलाना होगा कि मैं हूँ।"
"हाँ।"
स्कूल के गेट पर उतारकर मैंने गाड़ी मोड़ी। उन्हें जाते देखा — शालिनी सीधी खड़ी, कंधे ताने, और रिया उसके साथ। दोनों की परछाइयाँ गेट के अंदर गईं और दीवार के पीछे छिप गईं।
मैं अस्पताल पहुँची। सीधे अंदर गई। चड्ढा जी का केबिन खाली था। सुप्रिया अपनी कुर्सी पर बैठी थी। मैंने उससे पूछा, "शालिनी नायक का कोई रिकॉर्ड है?"
"कौन?"
"शालिनी नायक। रीना नायक की बेटी।"
सुप्रिया ने स्क्रीन देखी। "रीना नायक का कोई रिकॉर्ड नहीं।"
"नाम भी नहीं है क्या?"
"नाम है, पर उसके नीचे कुछ नहीं। जैसे फाइल खोली गई हो और कुछ भरा ही न गया हो।"
मैंने गहरी साँस ली। "अनीता मिश्रा कहाँ है?"
"ड्यूटी पर। पहली मंज़िल।"
मैं सीढ़ियों से ऊपर गई। अनीता दवाइयों की अलमारी के पास खड़ी थी। मुझे देखते ही बोली, "मीरा, तुझे रामदीन की तरफ़ नहीं—"
"अनीता।"
"क्या?"
"तू मेरे पास बैठ। पाँच मिनट।"
वह मेरी तरफ़ देखती रही। फिर अपनी कुर्सी खींची और मेरे पास बैठ गई।
"तूने रीना नायक के बारे में सुना है?"
"नाम पहली बार सुन रही हूँ।"
"और उसकी बेटी शालिनी? वह मेरी बेटी की दोस्त है। कल रात मेरे घर पर थी।"
अनीता ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। "मीरा, तेरे पास एक समस्या है। जब से तूने वह पुराना काग़ज़ उठाया है—"
"मेरे पास समस्या नहीं है।" मैंने कहा। "मेरे पास एक काग़ज़ है जिसके पीछे पूरा शहर चल रहा है और मुझे वह काग़ज़ पढ़ना है। अनीता, तू अस्पताल की सबसे पुरानी नर्सों में से एक है। तूने तीन साल पहले कुछ अजीब देखा था? कुछ नाम? कुछ लोग जो एक दिन से अचानक नहीं दिखे?"
वह चुप बैठी रही। फिर उसने अपनी जेब से एक चाबी निकाली।
"तीसरी मंज़िल का पुराना स्टोर। वहाँ पुरानी फाइलें रखी हैं। मेरे पास चाबी है। चड्ढा जी को मत बताना।"
"क्यों?"
"क्योंकि उन्होंने मुझे यह चाबी इसलिए दी थी कि मैं उन्हें मिट्टी देकर देखूँ कि कोई नई हमारी फाइलों में जाता तो नहीं।"
"तो?"
"तो अगर तू उन्हें मिली और उन्होंने पूछा, तो मैं यही कहूँगी कि तूने चाबी छुपकर उठाई।"
मैंने चाबी ली। "तेरा नाम लिखूँगी।"
"मत लिखना।" वह हँसी। "ना लिखने में मेरा भी फ़ायदा है।"
मैं तीसरी मंज़िल के स्टोर की तरफ़ बढ़ी।
स्टोर का दरवाज़ा खोलते ही धूल का बादल आया। फाइलें ज़मीन पर, रैक पर, बोरे में। मैंने मास्क निकालकर मुँह पर रखा और कमरे में घुसी।
वहाँ करीब डेढ़ घंटा बीता। मैंने दो साल पहले की फाइलें तो देखीं, पर मेरा ध्यान हमेशा वहीं जा रहा था — उसी लाइन पर जो माँ ने अधूरी छोड़ी थी। फिर मुझे एक फाइल मिली जिस पर था — "वर्मा, निशा — ड्राइवर — मार्च।" फाइल में उसका नाम था, पता था — पड़ाव गली के पीछे एक और गली। उसके फॉर्म में "पिता का नाम" के आगे भी एक खाली जगह थी, जैसे कोई काग़ज़ भी जानता हो कि इसका कोई नहीं था।
और सबसे नीचे एक पर्ची थी — छोटी, सफ़ेद, जिस पर किसी के हाथ से लिखा था: "वह बात करती रहती है। मुझे उसकी आवाज़ सुननी है। — रामदीन।"
मैंने फाइल बंद की और ऊपर देखा।
तभी जेब में फोन बजा। रिया।
"माँ।"
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
"क्या हुआ?"
"मैं और शालिनी स्कूल के गेट पर हैं। उसे छुट्टी मिल गई।"
"क्यों?"
"उसकी किताबें उसकी बेंच पर नहीं मिलीं। यानी उसकी बेंच पर किसी का दूसरा नाम लगा हुआ है। और मैडम ने कहा कि उसका फीस रिकॉर्ड नहीं मिल रहा तो एडमिशन कैंसल समझो।"
"तू ठीक है?"
"माँ, मैं ठीक हूँ। पर शालिनी रो नहीं रही। वो खड़ी है, कुछ नहीं बोल रही। यह और डरावना है।"
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