A Dark Secret – Chapter 311
आगे स्याही सूखकर फट गई थी। जैसे पेन काग़ज़ पर चलते-चलते अचानक उठा लिया गया हो। कोई नाम नहीं। कोई मिटाया हुआ नाम नहीं। पूरी जगह खाली, और उस पर उम्र की धूल थी जो किसी ने आज तक नहीं छुई।
मैंने उँगली उस जगह पर रखी। खुरदरी थी — जैसे स्याही की नोक काग़ज़ को चीर कर गई हो।
"होने वाली बच्ची का नाम…"
यह लाइन मेरे लिए लिखी गई थी। यह पन्ना मेरे जन्म से पहले लिखा गया था। और उस पर मेरा नाम नहीं था — सिर्फ़ जगह थी, मेरे नाम के लिए।
मैं नीचे बैठ गई। फ़र्श ठंडा था।
माँ की आदत याद आई। कहती थी — "लिखा हुआ कभी मत छोड़। आधी लाइन भी छोड़ेगा तो बाद में कोई और उस पर अपनी लाइन जोड़ देगा।"
माँ खुद यहाँ आधी लाइन छोड़ गई थी।
और किसी ने वह लाइन नहीं जोड़ी। किसी ने उसे पूरा होने ही नहीं दिया — न मेरे नाम से, न किसी और नाम से।
तो क्या माँ ने मेरा नाम अपनी खुद की बेटी को नहीं दिया? क्या मेरा नाम उस लाइन में कभी नहीं आया?
वह फोन किसने किया था उस रात — जिसने कहा था कि मेरा नाम उसके बेटी के नाम के बगल में उसी काग़ज़ पर लिखा है? वह रीना नायक की बात कर रही थी। पर रीना की पीली कॉपी में मेरा नाम किस स्याही से लिखा था — माँ की, या किसी और की?
मैंने काग़ज़ उठाया और ऊपर गई।
रिया की चारपाई के पास वाली खिड़की खुली थी, परदा हल्का हिल रहा था। दोनों बच्चियाँ सो रही थीं। मैं उनके सिर के पास बैठ गई। शालिनी के हाथ से गुड़िया खींचकर रख दी, चादर ठीक की।
मेरी नज़र संदूक से निकले काग़ज़ पर टिकी थी, हाथ में।
"होने वाली बच्ची का नाम …"
अगर यह जगह खाली छूटी है, तो मेरा नाम रजिस्टर में कहाँ से आया?
कौन लिखता है ऐसी जगह? या फिर यह काग़ज़ ही झूठा है?
मैंने वह काग़ज़ अपनी जेब में रखा और पलंग के नीचे से अपनी नोटबुक निकाली। जिस पन्ने पर मेरा नाम उभरा था — "मीरा जोशी, तीस साल" — उसके नीचे पेंसिल से लिखा:
"माँ का मकान — होने वाली बच्ची का नाम — खाली।"
फिर सोचकर नीचे और लिखा: "किसी ने नाम पूरा नहीं किया। फिर मेरा नाम रजिस्टर में कैसे आया?"
मैंने नोटबुक बंद की। पलंग पर लेटी। छत देखती रही।
दो बातें जोड़नी थीं — एक, मकान खरीदते वक़्त माँ ने मेरे नाम के लिए जगह छोड़ी थी, भरी नहीं। दो, मेरा नाम कहीं लिखा हुआ है — रजिस्टर में, पीली कॉपी में, उस दीवार पर भी अगर मैं जाकर देखूँ।
तो मेरा नाम किसने भरा?
रात भर मैंने यही सोचा। नींद नहीं आई। बीच में एक बार उठकर पानी पिया। एक बार आँगन में नीचे गई — दीवार पर वह लिखा हुआ नाम अब भी वहीं था, हल्का, पर था। और उसके नीचे एक नई लाइन लगी हुई थी पेंसिल से, बहुत महीन —
"पूछ लेना उससे जिसके पास जवाब होगा।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं था। गली खाली। ऊपर की बत्ती जल रही थी — वही पीली, पुरानी।
खिड़की से रिया की आवाज़ आई, "माँ?"
"सो जा।"
"तू क्यों खड़ी है?"
"पानी पीने आई थी।"
वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "जल्दी आ जा।"
मैं ऊपर गई। चारपाई के पास बैठी। रिया ने आँख खोली, मेरा हाथ पकड़ा और कहा, "शालिनी बोल रही थी नींद में। कह रही थी — माँ, मुझे अपना नाम मत भूलने देना।"
मैंने उसका सिर सहलाया।
"कोई नाम नहीं भूलता, रिया।"
वह मुस्कुराई और फिर सो गई।
सुबह मैंने सात बजे ही उठकर बाबूजी को फोन मिलाया। दो रिंग के बाद आवाज़ आई — "हाँ, बेटा। सब ठीक?"
"बाबूजी, एक सवाल है।"
"पूछ।"
मैंने साँस ली। "माँ ने मकान खरीदते वक़्त असल में क्या लिखवाया था?"
वह चुप हो गए।
"बाबूजी?"
"वह काग़ज़ी काम था, बेटा।" उनकी आवाज़ सिकुड़ी हुई आई। "तेरी माँ को हर चीज़ की जल्दी रहती थी। बस जल्दबाज़ी में लिखवा दिया।"
"काग़ज़ी काम कोई काग़ज़ी काम नहीं होता, बाबूजी। मैंने वह पन्ना देखा है। उस पर लिखा है — 'होने वाली बच्ची का नाम…' और उसके आगे कुछ नहीं। माँ ने मेरा नाम नहीं लिखा।"
"तो?"
"तो मेरा नाम कहाँ से आया?"
उनकी साँस फोन पर सुनाई दी — लंबी, धीमी। जैसे किसी पुरानी चीज़ को घसीटा जा रहा हो।
"बेटा, मुझे नहीं पता।"
"आप वहाँ थे।"
"मैं वहाँ था, पर मुझे नहीं पता कि उसने आगे क्या लिखा या क्या नहीं। वह काग़ज़ उसने मुझे दिखाया भी नहीं। दस्तख़त मैंने पीछे के पन्ने पर किए। वह काग़ज़ उसके हाथ में था, फिर मेज़ पर रह गया।"
मेरी आवाज़ तेज़ हुई। पहली बार। "आपने पूछा क्यों नहीं?"
"मीरा।" उन्होंने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे कोई पुरानी आदत हो। "तेरी माँ को जब कोई चीज़ करनी होती थी तो पूछने का वक़्त कहाँ था? उसने कहा — सब ठीक है, दस्तख़त कर दो। मैंने कर दिए।"
"और फिर?"
"और फिर तू पैदा हुई। और सब ठीक रहा।"
"सब ठीक रहा?" मैंने पूछा। "बाबूजी, मेरे पास एक काग़ज़ है जिस पर मेरा नाम लिखा है और मुझे नहीं पता बाबूजी, उसमें मेरी मर्ज़ी कहाँ है। आपको नहीं लगता मुझे यह जानने का हक़ है?"
वह फिर चुप हुए। बहुत देर।
"मीरा।" उनकी आवाज़ बदल गई थी — थोड़ी भारी, थोड़ी टूटी। "तेरी माँ के जाने के बाद मैंने यह काग़ज़ खोलकर देखा था। तब मैंने वह लाइन देखी थी। वह मुझे भी अजीब लगी थी। पर फिर सोचा — जो हो गया, सो हो गया। तू ज़िंदा है, तू बड़ी हो रही है। यही काफ़ी है।"
"आपने सिर्फ़ देखा था? पढ़ा? छुआ? उस लाइन के आगे कुछ था?"
"नहीं।"
"धन्यवाद।"
"मीरा—"
मैंने फोन रख दिया।
फोन हाथ में लेकर कुछ देर बैठी रही। फिर उसे मेज़ पर रखा। सामने दीवार पर घड़ी थी — आठ बजकर चालीस मिनट। बाहर सूरज आ चुका था, नीचे बूढ़े जोड़े की चाय की आवाज़ आ रही थी। शालिनी उठ चुकी थी — रसोई से कुछ टकराने की आवाज़ आई।
तभी सीढ़ियों पर पैरों की तेज़ आवाज़ हुई। रिया ऊपर से भागती हुई आई, दरवाज़े पर खड़ी हो गई। उसका चेहरा लाल था, साँस फूल रही थी, जैसे सीढ़ियों के पहले ही ऊपर से भागते हुए आई हो।
"माँ, तू जानती है क्या हुआ?"
"क्या?"
"स्कूल में, आज सुबह — क्लास-रजिस्टर निकाला गया नाम पुकारने के लिए। मैडम ने सोमवार का रजिस्टर खोला। सबके नाम थे। शालिनी का नाम नहीं था।"
मैं सीधी हो गई।
"क्या मतलब नहीं था?"
"मतलब — अटेंडेंस वाली वह बड़ी कॉपी। जिसमें हर बच्चे का नाम पहले से छपा होता है। शालिनी का नाम उसमें नहीं है। मैडम ने उसे अपनी छोटी कॉपी में देखा और बोलीं — 'तो यह बच्ची कौन है?'"
मैं उठ खड़ी हुई। "पर शालिनी तो कल भी स्कूल गई थी।"
"माँ, मैं बोल रही हूँ। आज सुबह मैडम ने पूरी क्लास से पूछा — 'इससे पहले यह बच्ची यहाँ पढ़ती थी, किसी को याद है?' किसी ने हाथ नहीं उठाया। मैंने हाथ उठाया तो मैडम बोलीं, 'बेटा, तू गलत याद कर रही है। शायद नई हो।'"
बाहर से शालिनी आई, हाथ में चाय का कप। उसने रिया की आवाज़ सुनी होगी — दरवाज़े पर रुक गई।
"क्या हुआ?" उसने पूछा। "रिया, तू सुबह से अजीब है।"
रिया उसकी तरफ़ देख भी नहीं रही थी। मेरी तरफ़ देख रही थी।
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा — वह वहीं खड़ी थी, चाय का कप उसके हाथ में काँप रहा था। उसके चेहरे पर क्या था, मैं बता नहीं सकती। डर नहीं, कुछ और।
"मैम," उसने कहा, आवाज़ बहुत धीमी, "मैं कल स्कूल गई थी। मैं रोज़ जाती हूँ। मेरी फीस भरी हुई है। मेरी किताबें उसी क्लास में रखी हैं। मेरा नाम…"
वह रुक गई।
"मेरा नाम क्या है?"
मैं जम गई।
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