A Dark Secret310 / 536

A Dark Secret – Chapter 310

6 min read November 6, 2026

वह रुका।

"आपकी बेटी को अपनी माँ का नाम याद है। पर उसे किसी काग़ज़ पर नहीं ढूँढ पाती। स्कूल के फॉर्म में, अस्पताल के रिकॉर्ड में — कहीं नहीं। आपको यह ठीक लगता है?"

उसने चाय का कप मेज़ पर रखा। उसका हाथ काँप रहा था।

"एक चीज़ है।" उसने कहा। "पीली कॉपी। मैंने उसे जला दिया था। पर उसकी जिल्द बच गई थी। मैंने उसे ऊपर रख दिया।"

"दिखाइए।"

वह सीढ़ी से ऊपर गया और कुछ देर बाद नीचे आया। उसके हाथ में एक मोटी पीली जिल्द थी, जली हुई, कोनों से काली। मैंने उसे खोला।

अंदर के पन्ने जले हुए थे, पर जो बचा था वह काफ़ी था। नामों की लिस्ट। तारीख़ें। और हर नाम के आगे एक छोटा सा निशान — काली स्याही का। कुछ पर निशान पूरा था, कुछ पर आधा।

मैंने पन्ना पलटा।

और मेरी साँस रुक गई।

एक पन्ने पर नाम लिखा था — "रीना नायक — शांति विहार फेज़ दो — गली सात।" और उसके बगल में, उसी स्याही से, एक और नाम — "मीरा जोशी।"

वही स्याही। वही तारीख़। एक ही पन्ने पर।

मैंने उँगली उस नाम पर रखी। स्याही ठंडी थी। बिलकुल ठंडी, जैसे अभी लिखी गई हो।

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

तीन बार। धीरे। पर साफ़।

शालिनी के पिता का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने किसी को नहीं बताया।"

दस्तक फिर हुई। इस बार ज़ोर से।

मैंने कॉपी अपने बैग में रखी और खिड़की से बाहर देखा। गली में एक काली गाड़ी खड़ी थी। बत्ती बंद। ड्राइवर बाहर खड़ा था — भैरों।

वह सीधे खिड़की की तरफ़ देख रहा था।

मैंने शालिनी के पिता से कहा, "दरवाज़ा मत खोलिए।"

"पर वो…"

"मत खोलिए।"

दस्तक रुकी। फिर खिड़की पर हल्की सी खटखटाहट हुई। मैंने पर्दा हटाया।

भैरों खिड़की के बाहर खड़ा था। उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था। उसने खिड़की के शीशे पर लिफ़ाफ़ा सटा दिया और मुस्कुराया — वही होंठ का खिंचाव।

फिर वह पलटा और गाड़ी की तरफ़ चला गया।

मैंने खिड़की खोली और लिफ़ाफ़ा उठाया। ऊपर कुछ नहीं लिखा था। खोला। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर सिर्फ़ एक लाइन थी —

"कुछ नाम ऐसे होते हैं जो बोलने से पहले सोचने पड़ते हैं।"

मैंने लिफ़ाफ़ा बैग में रखा। शालिनी के पिता ने मुझे देखा। "क्या है?"

"कुछ नहीं।" मैंने कहा। "आपकी बेटी अभी गाड़ी में है। मैं उसे ले जा रही हूँ। कल सुबह वापस भेज दूँगी।"

"आप उसे कहाँ ले जा रही हैं?"

"अपने घर। वहाँ सुरक्षित रहेगी।"

मैं बाहर निकली। भैरों की गाड़ी जा चुकी थी। मैंने एम्बुलेंस का दरवाज़ा खोला। दोनों बच्चियाँ सहमी हुई बैठी थीं।

"क्या हुआ?" रिया ने पूछा।

"कुछ नहीं।" मैंने कहा। "शालिनी, तू आज हमारे घर रुकेगी।"

वह डरी। "पर पापा…"

"उन्हें पता है।"

मैंने गाड़ी शुरू की। घर लौटते वक़्त रास्ते में एक बत्ती जल रही थी — पीली, पुरानी। वही जो कल रात जली थी। मैंने ध्यान नहीं दिया। पर रिया ने कहा, "माँ, वो बत्ती फिर जल रही है।"

"कौन सी?"

"वही। जो कल जली थी।"

मैंने ब्रेक नहीं लगाया। पर मेरी उँगली स्टेयरिंग पर कस गई।

घर पहुँचकर हम तीनों ऊपर गए। मैंने बच्चियों को खाना दिया, शालिनी को रिया के साथ बिठाया, और खुद नीचे आँगन में गई।

एम्बुलेंस के पास खड़ी होकर मैंने बैग से जली हुई कॉपी निकाली और बोनट पर रखी।

पन्ने पलटे। नाम। गलियाँ। तारीख़ें।

और फिर मैं एक नाम पर रुकी। "सुमित्रा देवी — पड़ाव गली — तीस साल।" पर वहाँ तारीख़ के आगे लिखा था, "नहीं उठाया।"

नीचे एक नोट था — छोटे अक्षरों में, माँ के हाथ जैसा नहीं, किसी और का —

"जो नाम उठा नहीं, वो जगह है। जो जगह है, वो बचा है।"

मैंने कॉपी बंद की। ऊपर देखा। रिया की खिड़की में बत्ती जल रही थी।

तभी मेरा फोन बजा।

स्क्रीन पर नाम था — "रामदीन कुमार जोशी"।

मैंने उठाया।

"मीरा।" उसकी आवाज़ आई। धीमी, पर साफ़। "तेरी गाड़ी रुकी है?"

"हाँ।"

"तो सुन।" वह रुका। "कल सुबह तुझे सुमित्रा के पास जाना है। पड़ाव गली। और मेरे साथ नहीं जाना। अकेले जाना। क्योंकि जो नाम उठ नहीं पाया, वो सिर्फ़ उसी को बताएगा जिसका नाम अभी उठा नहीं।"

"मेरा नाम कब उठेगा, रामदीन?"

वह चुप रहा। बहुत देर। फिर बोला, "जब तक वो उठे, बहुत नाम बोलने पड़ेंगे।"

फोन कट गया।

मैं आँगन में खड़ी रही। रात बहुत ठंडी नहीं थी, पर मेरे हाथ ठंडे थे।

ऊपर से रिया की आवाज़ आई, "माँ, शालिनी कह रही है कि उसकी माँ की कॉपी में भी पीले रंग के पन्ने थे।"

मैंने ऊपर देखा। "कितने पन्ने?"

"बहुत सारे।"

मैंने कॉपी उठाई और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ी।

पर तभी आँगन की दीवार पर नज़र पड़ी। जहाँ मैंने कॉपी रखी थी, उसके नीचे, दीवार पर पेंसिल से लिखा हुआ एक नाम था — बहुत हल्का, जैसे कोई उँगली से लिखकर चला गया हो।

"सुमित्रा देवी — पड़ाव गली।"

और उसके नीचे, और भी हल्का —

"नहीं उठा।"

मैं रुकी। ऊपर देखा। रिया की बत्ती बुझ गई थी।

॥

रिया की बत्ती बुझी तो मैं सीढ़ियों से नीचे उतर आई। दीवार पर लिखा नाम मिटाने का मन हुआ पर हाथ नहीं उठा। जो लिखता है वो दीवार से बोल रहा है, और दीवार सुन रही है। मैं आँगन से सीधे ऊपर गई, रिया के कमरे का दरवाज़ा खोला। दोनों बच्चियाँ एक ही चारपाई पर सो रही थीं। शालिनी के हाथ में रिया की पुरानी गुड़िया थी जिसका एक हाथ टूटा है।

मैं उन्हें देखती रही। फिर जैसे ही पलटी, ऊपर की मंज़िल के कोने में रखी माँ की पुरानी संदूक पर नज़र गई।

वह संदूक मैंने आज तक खोला नहीं था। नीचे वाले कमरे में जो बूढ़ा जोड़ा किराए पर रहता है, उसके बाईं तरफ़, दो पुराने बक्सों के पीछे पड़ी है। लकड़ी स्याह पड़ गई है, ऊपर धूल की मोटी परत जमी है। चलने में दो हाथ लगे, और खुलते वक़्त चरमराहट ऐसी निकली कि मैं एक पल के लिए रुक गई, नीचे ज़रा भी हलचल हो तो?

नीचे चूहे की आवाज़ आई। बस।

मैंने पल्ला उठाया। अंदर नैप्थलीन की बदबू थी और कुछ नहीं। सबसे ऊपर पन्नी में लिपटी साड़ियाँ — तीन साड़ियाँ, वही पुराने रंग, जो माँ पहनती थीं। नीचे एक लाल रबर की पुरानी चप्पल, दो जोड़ी, एक के नीचे की फट गई है। फिर एक फोटो।

फोटो में माँ और बाबूजी खड़े हैं। पीछे कोई शादी का पंडाल है। माँ के हाथ में माला है, चेहरे पर वही जल्दबाज़ी — जैसे तस्वीर बंद होने से पहले किसी काम के लिए भागना है।

फोटो के नीचे एक भूरे रंग का लिफ़ाफ़ा था, मोटा। खोला। काग़ज़ निकले। असली काग़ज़ — मोटा, पुराना, मुड़े कोने।

बनियान। बिक्री का काग़ज़। दो पन्ने।

और सबसे ऊपर, एक धुँधली सी छोटी घुमावदार लिखाई — जिसमें कुछ पढ़ा जा सकता था और कुछ नहीं।

मैंने उसे नीचे लाकर ट्यूबलाइट के नीचे रखा। पहला पन्ना — जमीन का ब्यौरा, सरहदें, चार गवाहों के नाम। तीन गवाह तो पढ़े गए — उनमें से कोई भी आज नहीं है शहर में। एक गवाह का नाम मिटा हुआ था, जैसे कोई देर से आया और उसकी जगह बाक़ी काग़ज़ में खाली रह गई।

दूसरे पन्ने पर मकान की क़ीमत, तारीख़, और हस्ताक्षर। माँ का हस्ताक्षर लंबा खिंचा हुआ, आख़िरी अक्षर जल्दी में कटा हुआ।

उसके नीचे एक लाइन थी, और वह अधूरी थी —

"होने वाली बच्ची का नाम …"

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