A Dark Secret – Chapter 309
मैं रुकी। "कहिए।"
"मैं आपसे मिलने आई थी।" उसने कहा। "मुझे पता चला कि आपकी बेटी बहुत तेज़ है। स्कूल में सबसे आगे। शिक्षिका ने खुद बताया।"
"अच्छा।"
"पर फीस भारी है।" उसने सिर हिलाया, जैसे खुद उसका दुख हो। "ऐसे बच्चे की पढ़ाई पैसों के कारण नहीं रुकनी चाहिए। हम तो आपके अपने हैं, मीरा जी। फीस माफ़ करा देंगे। बच्ची की पढ़ाई में रुकावट न हो।"
मैंने उसे देखा। सूरज उसके चेहरे पर पड़ रहा था और वह पलक नहीं झपकी।
"नहीं।" मैंने कहा।
"सोच लीजिए।"
"सोचने की ज़रूरत नहीं।" मैंने कहा। "फीस का हिसाब मैं खुद रखती हूँ। मेरी गाड़ी है, मेरी ड्यूटी है। रिया की पढ़ाई का हिसाब भी मेरा है।"
काजल की मुस्कान एक पल के लिए हिली। बस एक पल। फिर वापस आ गई।
"आप बहुत सीधी हैं, मीरा जी।" उसने कहा। "यही अच्छी बात है। पर कभी-कभी सीधापन महँगा पड़ता है।"
"महँगा पड़े तो देख लेंगे।"
वह हँसी। हल्की हँसी, जैसे कोई बच्चा मज़ाक कर रहा हो। "ठीक है। कोई दिक्कत हो तो बेझिझक बताइएगा। मेरा दरवाज़ा हमेशा खुला है।"
वह मुड़ी। दो क़दम चली। फिर रुकी।
"एक बात।" उसने कहा, बिना पलटे। "आपकी माँ से मेरी दादी की जान-पहचान थी। आपको पता है?"
मेरे हाथ से चाबी फिसलने लगी। मैंने पकड़ ली।
"नहीं।" मैंने कहा।
"अच्छा?" वह पलटी। "मुझे लगा आपको पता होगा। जब आपका मकान खरीदा गया था, तब… खैर, छोड़िए। पुरानी बातें हैं।"
वह चली गई। काली गाड़ी में बैठी। भैरों बाहर खड़ा था, उसने दरवाज़ा खोला और बंद किया। गाड़ी इंजन शुरू हुई और निकल गई।
मैं वहीं खड़ी रही, हाथ में चाबी पकड़े।
मकान के काग़ज़। मेरे घर के काग़ज़। जो मैंने कभी पढ़े ही नहीं।
माँ ने वह मकान खरीदा था जब मैं पैदा भी नहीं हुई थी। बीस साल पहले। पिता कहते थे, "काग़ज़ी काम था, कुछ ख़ास नहीं।"
मैंने फाइल का पन्ना जेब से निकाला और देखा — सुनीता चौहान, कमला, गीता। तीन नाम। तीन तारीख़ें। और तीनों तारीख़ों के आगे एक ही जगह लिखी थी — "शांति विहार फेज़ दो।"
शालिनी का घर भी वहीं था।
मैंने जेब में से फोन निकाला और रिया का नंबर लगाया।
"माँ?"
"शालिनी को बोलना, आज स्कूल के बाद घर जल्दी आए। मुझे उससे बात करनी है।"
"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं। बस कह देना।"
रिया चुप रही। फिर बोली, "माँ, तू डर रही है?"
"नहीं।"
"तेरी आवाज़ अलग है।"
मैंने फोन काट दिया।
शाम पाँच बजे रिया और शालिनी घर आईं। शालिनी पतली थी, आँखें बड़ी, बस्ता कंधे से बड़ा। वह दरवाज़े पर खड़ी रही, जैसे अंदर कदम रखने से पहले इजाज़त चाहिए।
"अंदर आ।" मैंने कहा।
वह बैठी। रिया उसके पास बैठी। मैंने चाय रखी, फिर पूछा, "तेरी नानी का नाम क्या था?"
शालिनी ने रिया की तरफ़ देखा। रिया ने सिर हिलाया।
"सुनीता चौहान।" शालिनी ने कहा।
मेरे हाथ में कप था। मैंने उसे मेज़ पर रखा। आवाज़ आई।
"कब गई थीं?"
"पिछले साल। ठंड में।" शालिनी की आवाज़ धीमी थी। "माँ कहती थीं कि नानी बीमार नहीं थीं। बस एक दिन सुबह नहीं उठीं।"
"और तेरी माँ?"
"दो महीने पहले।" वह रुकी। "माँ ने उस रात फोन पर किसी से झगड़ा किया था। फिर बोली कि वो काग़ज़ लेने जा रही है। फिर… नहीं आई।"
"कौन सा काग़ज़?"
"पता नहीं।" उसकी आँखें भर आईं। "पर उसके बाद से घर में सब कुछ टूटने लगा। पापा कहते हैं कि माँ का नाम काग़ज़ों में नहीं मिलता। स्कूल में भी नहीं। बैंक में भी नहीं।"
मैं उठी और अलमारी से वह पुराना फाइल का पन्ना लाई। शालिनी को दिखाया।
"यह नाम पहचानती है?"
वह पन्ने पर झुकी। उसकी उँगली "सुनीता चौहान" पर रुकी। फिर उसने कहा, "यह नानी है। पर आगे कुछ नहीं लिखा।"
"काट दिया गया है।"
"किसने काटा?"
"यही तो मैं भी सोच रही हूँ।"
रिया ने अचानक कहा, "माँ, तूने काजल आंटी से बात की थी?"
मैं पलटी। "तूने उन्हें कैसे देखा?"
"स्कूल के बाहर। वो आती हैं कभी-कभी। बच्चों को टॉफ़ी देती हैं।"
"तुझे भी देती हैं?"
रिया ने सिर हिलाया। "पर मैंने नहीं ली। शालिनी ने भी नहीं।"
शालिनी ने कहा, "वो माँ के बारे में पूछती थीं। हर हफ़्ते। कि कोई ख़बर आई क्या।"
मैं वहीं बैठ गई। फिर उठी और बोली, "शालिनी, तेरे घर के काग़ज़ कहाँ हैं?"
"पापा के पास। वो नहीं देते। कहते हैं कि सब बेकार है।"
"तेरे पापा से मिलना है मुझे।"
वह डरी। "माँ, वो नहीं मानेंगे। वो कहते हैं कि जो लोग पूछते हैं, वो भी गुम हो जाते हैं।"
"मैं पूछने नहीं जा रही। मैं देखने जा रही हूँ।"
रिया ने अचानक कहा, "मैं भी चलूँगी।"
"नहीं।"
"माँ, शालिनी मेरी दोस्त है।"
मैंने उसे देखा। वह उठी और सीधे मेरी आँखों में देखने लगी। बारह साल की बच्ची, पर उसकी आवाज़ में कुछ था जो मुझे चुप करा गया।
"ठीक है।" मैंने कहा। "पर गाड़ी के अंदर ही रहोगी।"
रात आठ बजे जब मैं एम्बुलेंस निकाल रही थी, तभी फोन बजा। अस्पताल से।
"मीरा, तुम्हें अभी आना पड़ेगा।" चड्ढा जी थे। उनकी आवाज़ में वही तेज़ी थी जो मुसीबत में आती है। "तुम्हारी फाइल में कुछ गड़बड़ है।"
"क्या गड़बड़?"
"परमिट रुक गया है।" उसने कहा। "कल से एम्बुलेंस नहीं चला सकती। जब तक नया काग़ज़ नहीं आता।"
मैंने एम्बुलेंस रोक दी। पीछे रिया और शालिनी बैठी थीं।
"कब तक?" मैंने पूछा।
"पता नहीं।" उसने कहा। "दो हफ़्ते, महीना… काग़ज़ ऊपर गया है।"
"किसने भेजा?"
वह चुप रहा। फिर बोला, "सुबह आना। बात करेंगे।" और फोन काट दिया।
मैंने गाड़ी साइड में लगाई। दोनों बच्चियाँ मुझे देख रही थीं।
"कुछ हुआ?" रिया ने पूछा।
"कुछ नहीं।" मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ में कुछ था। रिया ने पकड़ लिया, मुझे पता है। वह चुप हो गई।
मैंने गाड़ी फिर शुरू की। शांति विहार की तरफ़।
रास्ते में शालिनी ने धीरे से कहा, "आंटी, माँ के पास एक पुरानी कॉपी थी। जिसमें वो नाम लिखती थीं।"
"कौन से नाम?"
"पता नहीं। पर उसका रंग पीला था। आख़िरी बार मैंने उसे माँ के तकिये के नीचे देखा था।"
मैंने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ा दी।
शांति विहार फेज़ दो पहुँचकर मैंने गाड़ी गली के मोड़ पर खड़ी की। शालिनी का घर तीसरे मकान में था। बाहर का नाम-पट्टा अब भी नहीं था — सिर्फ़ दो कीलें दीवार में।
"तुम दोनों यहीं रहो।" मैंने कहा और उतर गई।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से आवाज़ आई — "कौन?"
"शालिनी की तरफ़ से।"
दरवाज़ा खुला। एक आदमी खड़ा था — चालीस के करीब, चेहरा थका हुआ, हाथ में चाय का कप। उसने पीछे देखा, फिर मुझे देखा।
"आप कौन हैं?"
"मीरा जोशी। एम्बुलेंस ड्राइवर। अस्पताल से।"
"अस्पताल से क्या काम?"
"आपकी पत्नी के काग़ज़ देखने हैं।"
उसका चेहरा बदला। उसने दरवाज़ा थोड़ा और खोला — बाहर झाँका। फिर मुझे अंदर खींचा और दरवाज़ा बंद कर दिया।
"आपको किसने भेजा?" उसकी आवाज़ धीमी थी, डरी हुई।
"किसी ने नहीं। मैं अपने आप आई हूँ।"
"तो लौट जाइए।" उसने कहा। "मेरी पत्नी गई है। मैं उसे भूल रहा हूँ। धीरे-धीरे। पहले उसकी आवाज़ भूली, फिर उसका चेहरा, अब नाम भी धुँधला पड़ रहा है। और मुझे यह ठीक लग रहा है। क्योंकि जब वो पूरी भूल जाएगी, तब दर्द भी नहीं रहेगा।"
"आपकी बेटी को दर्द रहेगा।" मैंने कहा।
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