A Dark Secret – Chapter 308
गाड़ी में बैठकर मैंने पीछे मुड़कर देखा। गली का मुँह अब दिख रहा था — साफ़, चौड़ा। मैंने गाड़ी स्टार्ट की और शांति विहार की तरफ़ बढ़ी।
मुझे रीना नायक वाला घर फिर देखना था। इस बार मैंने अपने साथ नोटबुक ली और उस घर के बाहर का नाम-पट्टा ढूँढा। पट्टा उतरा हुआ था, ज़मीन पर पड़ा था। मैंने उसे उठाया और उलटा किया। पीछे की तरफ़ नाम खुदा हुआ था — "रीना नायक — शांति विहार फेज़ दो — गली नंबर सात।"
मैंने पट्टा चूमा और नोटबुक में लिख लिया।
फिर मैंने बाक़ी घरों के पट्टे देखे। किसी पट्टे पर नाम, किसी पर सिर्फ़ गली का नंबर, किसी पर कुछ भी नहीं। जिन पर कुछ नहीं था, उन्हें मैंने पलटकर देखा। कुछ पर नाम थे। मैंने सब लिख लिए।
तभी मुझे पीछे रोशनी दिखी। एक गाड़ी खड़ी थी — दूर, बत्ती बंद, पर इंजन की आवाज़ आ रही थी। मैंने टॉर्च बंद की और गाड़ी के पास गई।
वह भैरों था। खिड़की नीचे थी। उसने कहा, "मैडम का कहना है, रात को अकेले घूमना ठीक नहीं।"
"मैडम को बोलना, ड्यूटी पे हूँ।" मैंने कहा। "ठीक है।"
वह मुस्कुराया। मुस्कुराहट नहीं थी — होंठ का हल्का सा खिंचाव। फिर गाड़ी चली गई। मैंने उसका नंबर देखा — पीले अक्षरों में, पर पढ़ा नहीं गया। धुँधला था।
मैं घर लौटी। रिया सो रही थी। मैंने उसका कमरा देखा — दरवाज़ा खुला था, वह करवट लेकर सो रही थी, मुँह तकिए में गड़ा हुआ। मैंने उसका कंबल ठीक किया और दरवाज़ा बंद कर दिया।
फिर मैंने नोटबुक खोली।
और मैं रुक गई।
जो नाम मैंने आज लिखे थे — रामदीन कुमार जोशी, पीतल गली, रीना नायक, शांति विहार फेज़ दो — वे सब धुँधले पड़ गए थे। पेंसिल की लकीरें हल्की हो गई थीं, जैसे किसी ने उँगली से रगड़ दी हो।
मैंने पन्ना पलटा। पीछे के पन्ने भी वैसे ही थे — जो नाम पहले लिखे थे, सब हल्के। सिर्फ़ एक लाइन साफ़ थी — सबसे ऊपर, जो मैंने सबसे पहले लिखी थी — "मीरा जोशी"।
मैंने पेंसिल उठाई और फिर से लिखना शुरू किया। "रामदीन कुमार जोशी — पीतल गली।" लिखा। इस बार ज़ोर से, गहरा। पेंसिल दबाकर।
जब मैंने पन्ना बंद किया, तो उस पर एक नई लाइन उभर आई थी — नीचे की तरफ़, जहाँ कुछ नहीं था।
"मीरा जोशी, तीस साल।"
मैंने पेंसिल नीचे रखी।
मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने अपनी उँगली देखी — स्याही का निशान अब भी था, पुराना, पर आज उसके नीचे एक नई लकीर दिख रही थी, जैसे किसी ने और गहरा कर दिया हो।
मैं उठी और खिड़की के पास गई। बाहर अंधेरा था। नीचे गली में एक बत्ती जल रही थी — पुरानी, पीली। मुझे याद नहीं आया कि वह बत्ती कभी जलती थी।
मैंने खिड़की बंद की।
और तभी मेरे फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर नाम नहीं था — सिर्फ़ नंबर।
मैंने उठाया।
दूसरी तरफ़ से एक औरत की आवाज़ आई। धीमी। साफ़। "मीरा जोशी?"
"कौन?"
"मैंने सुना तुम पीतल गली गई थी।" वह रुकी। "वहाँ से कुछ उठाया?"
मैंने जेब में रखा पत्थर महसूस किया।
"कौन बोल रहा है?"
"कल रात।" उसने कहा। "अस्पताल के गेट पर। मैं तुम्हारी बेटी को ढूँढ रही थी। तुमने मुझे देखा था।"
मेरी साँस रुकी।
"मेरा नाम याद है?" उसने पूछा।
"नहीं।" मैंने कहा। "आप कौन हैं?"
"मेरा नाम अब किसी को याद नहीं।" उसने कहा। "पर मुझे अपनी बेटी का नाम याद है। और मुझे तुम्हारा नाम भी याद है।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम्हारा नाम मेरी बेटी के नाम के बगल में लिखा है।" उसने कहा। "उसी काग़ज़ पर। जो काग़ज़ तुमने आज उठाया।"
फोन कट गया।
मैंने वापस कॉल किया। नंबर बंद था।
मैं बैठ गई। नोटबुक खुली थी, उस पर "मीरा जोशी, तीस साल" उभरा हुआ था।
मैंने उसे मिटाया नहीं।
और मैंने उसके नीचे एक नई लाइन लिखी — "वह औरत जो फोन पर थी। बेटी — रीना।"
॥
फोन कटने के बाद मैं कुछ देर बैठी रही। फिर नोटबुक उठाई, पेंसिल उठाई, और उसी लाइन के नीचे लिख दिया — "सुबह अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड।"
सुबह छह बजे मैंने रिया को उठाया। उसने आँख मलते हुए कहा, "आज जल्दी क्यों?"
"तुझे स्कूल पहले छोड़ना है। मुझे काम है।"
"कैसा काम?"
मैंने उसके बाल बना दिए और पूछा, "शालिनी का फोन नंबर है तुझे?"
वह रुकी। फिर बोली, "है। क्यों?"
"मुझे चाहिए।"
"माँ, तू उसकी माँ के बारे में पूछेगी?"
"हाँ।"
रिया ने मुझे देखा। उसकी आँखों में वही सवाल था जो हर बार होता है — कि मैं कब मान जाऊँगी कि यह शहर कुछ नहीं बताता।
"माँ, उसकी नानी भी गई है। पिछले साल। उसकी माँ यही बोलती थी — कि पहले नानी गई, फिर माँ जा रही है।"
मेरा हाथ रुक गया। "शालिनी ने यह तुझे बताया?"
"वह रोई थी। स्कूल में।"
मैंने उसका नंबर लिया और उसे गाड़ी पर बिठा दिया।
अस्पताल पहुँचकर मैंने सीधे कार्यालय की तरफ़ जाना चाहा, पर अनीता मिश्रा गलियारे में मिल गई। उसने हाथ में चाय का कप पकड़ा था।
"मीरा, तुम्हें चड्ढा जी बुला रहे थे। सुबह सात बजे।"
"अभी जाती हूँ।" मैंने कहा, पर मुड़ी नहीं। मैं कार्यालय के पीछे वाले कमरे में गई, जहाँ पुरानी फाइलें रखी थीं।
वहाँ धूल थी। कमरे में रोशनी एक ही बल्ब से आ रही थी और वह भी झूलता हुआ। मैंने अलमारी खोली। फाइलें साल से बँधी थीं। मुझे पिछले साल की फाइल चाहिए थी — वह साल जब रीना नायक गई थी।
तीसरी अलमारी में मिली। एक मोटी फाइल, ऊपर लिखा था — "अस्पताल में रात्रि ड्यूटी — विवरण"। मैंने पलटना शुरू किया। पन्ने सूखे थे, कोने मुड़े हुए।
और फिर मैं रुकी।
एक पन्ने पर नाम था — "सुनीता चौहान।" पर आगे का हिस्सा कटा हुआ था। मतलब, नाम था, पता था, तारीख़ थी, पर हर जगह जहाँ आगे कुछ लिखा होना चाहिए था, वहाँ कैंची चली थी या स्याही से रगड़ा गया था। जल्दी में। जैसे किसी ने बैठकर नहीं, खड़े-खड़े किया हो।
मैंने वह नाम अपनी नोटबुक में लिखा — "सुनीता चौहान"।
फिर मैंने आगे के पन्ने देखे। दो और नाम मिले, वैसे ही कटे हुए। एक का नाम था "कमला" और दूसरे का "गीता" — पर दोनों के आगे कुछ नहीं। तारीख़ें थीं — पिछले साल की, चार महीने में फैली हुई।
मैंने तीनों लिख लिए।
तभी पीछे खाँसने की आवाज़ आई। मैं पलटी। बाबूलाल खड़ा था — तीस साल पुराना गार्ड, जो अब भी उसी अस्पताल में है। उसकी टोपी धुँधली हो गई थी और चश्मे का एक काँच टूटा हुआ था।
"तू वही है ना, जो बूढ़े रामदीन के साथ बैठती है?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"वह कमरा छोड़ दे।" उसने कहा। "यहाँ जो फाइलें हैं, वो भूली हुई हैं। भूली हुई चीज़ें खोदने से नाम वापस नहीं आते। उल्टा तेरा नाम जाता है।"
"आपको सुनीता चौहान याद है?"
वह एक पल के लिए रुका। फिर उसने गर्दन हिलाई — ना में। "कुछ नाम ऐसे होते हैं जो बोलते ही भूल जाते हैं।"
मैंने फाइल बंद की और उसे वापस रख दिया। पर बाहर निकलते वक़्त मैंने फाइल का आख़िरी पन्ना जेब में डाल लिया — वह पन्ना जिस पर तीनों नाम थे।
ग्यारह बजे मैं एम्बुलेंस लेकर गेट की तरफ़ बढ़ी। और वहाँ खड़ी थी काजल हरनाम।
सफ़ेद सूट। कोई सलवट नहीं। हाथ में एक छोटा बैग, जिसका रंग उसके जूतों से मिलता था। वह मुस्कुरा रही थी — वैसी मुस्कान जो दूर से ही शुरू हो जाती है।
"मीरा जी!" उसने हाथ हिलाया। "मैं सोच ही रही थी, कहीं आप निकल न जाएँ।"
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