A Dark Secret – Chapter 307
"इसमें तो बहुत कुछ है।" मैंने कहा। "एक-एक करके पढ़ती हूँ।"
"नहीं।" उसने हाथ बढ़ाया। "अभी नहीं। अभी सिर्फ़ एक लाइन पढ़। जहाँ नाम लिखा है। जहाँ मेरा नाम लिखा है।"
मैंने उँगली रखकर पढ़ना शुरू किया। काग़ज़ पर लिखा था — "रखवाला — बाबू हरनाम सिंह।" उसके नीचे — "नाम दर्ज — रामदीन।" और उसके आगे एक जगह खाली थी, जहाँ गली का नाम लिखा जाना चाहिए था। वह जगह खाली नहीं थी, पर मिटी हुई थी — जैसे किसी ने रबर से रगड़कर साफ़ कर दिया हो।
"यहाँ गली का नाम था।" मैंने कहा। "मिट गया है।"
रामदीन ने आँखें खोलीं। "हाँ। मेरी गली। मैं उस गली में रहता था, चालीस साल पहले। जब मैंने उस औरत का नाम बोलना चाहा और बोल नहीं पाया — तो मेरी गली का नाम भी मिट गया। और गली के साथ… मेरा पूरा नाम।"
"तो फिर गली का नाम याद करना होगा।"
"याद है।" उसने कहा। "पर बोल नहीं सकता। जो नाम बोल नहीं सकता, वो गली भी नहीं बोल सकता।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। "चाचा, मेरी तरफ़ देखिए। मैं आपको एक-एक करके पूछूँगी। आप सिर्फ़ हाँ या ना में जवाब दीजिए।"
उसने सिर हिलाया।
"आपकी गली पुराने बाज़ार के पास थी?"
"हाँ।"
"बाज़ार के पीछे?"
"हाँ।"
"हवेली के पास?"
वह रुका। फिर उसने धीरे से कहा, "उसके पीछे। हवेली की दीवार के साथ वाली गली।"
"उस गली का नाम क्या था?"
उसका मुँह खुला रह गया। कुछ निकला नहीं। उसने फिर कोशिश की। "पी…" वह रुक गया। "नहीं। नहीं होता।"
"ठीक है।" मैंने कहा। "छोड़िए। अभी नहीं।"
मैंने उसे वार्ड के अंदर ले जाकर बेंच पर बैठाया। दो नर्सें थीं — एक बुजुर्ग, जिसका नाम मुझे याद नहीं था, और एक नई, जिसका नाम मैंने कभी पूछा ही नहीं। यह बात मुझे अब चुभी। मैंने नई नर्स से पूछा, "आपका नाम क्या है?"
वह चौंकी। "मैं… मैं रोज़ यहाँ हूँ।"
"नाम?"
"अनीता।" उसने कहा। "अनीता मिश्रा।"
"अनीता जी, इनका नाम रजिस्टर में दिखाइए। मरीज़ों का पुराना रजिस्टर।"
वह लेकर आई — मोटा, काला कवर, धूल भरा। मैंने पन्ने उलटे। चालीस साल पुराने पन्ने थे, हाथ से लिखे, कुछ जगह स्याही फैली हुई। मुझे "रामदीन" मिला। पूरा नाम नहीं — सिर्फ़ "रामदीन"। और गली वाला खाना खाली था। खाली नहीं — मिटा हुआ।
"यही तो।" रामदीन ने कहा। "देखा? अस्पताल के काग़ज़ में भी मेरी गली नहीं। जब गली नहीं, तो पूरा नाम नहीं। जब पूरा नाम नहीं, तो याद नहीं।"
"तो पहले गली का नाम चाहिए।" मैंने कहा।
"गली का नाम काग़ज़ पर नहीं।" उसने कहा। "गली का नाम उस गली में है। ज़मीन में। ईंटों में। जो आदमी वहाँ चालीस साल पहले रहता था, उसे ही याद है। और वो आदमी मैं हूँ।"
"तो आप वहाँ चलिए।"
"नहीं जा सकता।" उसने कहा। "मैं शहर की सीमा से आगे नहीं जा सकता, यह तो पता है। पर एक और बात है — मैं उस गली में भी नहीं जा सकता। जहाँ गली का नाम मिटा, वहाँ का रास्ता भी मिट गया। मैं उस गली का मुँह ढूँढ नहीं पाता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वह अस्पताल के फर्श पर बैठा था, सफ़ेद बाल बिखरे, हाथ में फाइल।
"तो मैं जाऊँगी।" मैंने कहा।
"तू जाएगी तो क्या करेगी?"
"मैं वहाँ जाकर हर ईंट, हर दरवाज़ा, हर दीवार देखूँगी। कोई तो निशान होगा।"
वह मुस्कुराया। "तू मीरा है। तू नहीं मानेगी।"
"नहीं मानूँगी।" मैंने कहा।
मैंने फाइल अपने बैग में रखी। काग़ज़ को दोबारा मोड़कर उसी फाइल में डाल दिया। अनीता ने मुझे एक काग़ज़ दिया — "यह आपके लिए छोड़ गई थी वो बूढ़ी औरत। सुबह।"
मैंने खोला। सुमित्रा देवी की लिखावट थी। छोटी, टेढ़ी-मेढ़ी —
"गली का नाम ईंटों में नहीं, चबूतरे के नीचे है। जहाँ पहले हैण्डपंप था। उस औरत के घर में।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। वह उठ खड़ा हुआ था।
"हैण्डपंप।" उसने कहा। "हाँ। बाज़ार के पीछे, हवेली की दीवार के साथ, एक चबूतरा था। उस पर लोग बैठते थे। उसके बगल में हैण्डपंप था।"
"तो वहाँ चलिए।"
"तू चलेगी। मैं नहीं।" उसने कहा। "पर सुन। अकेले मत जाना।"
मैंने माथा ठोंका। "इस शहर में ऐसा कौन है जो मेरे साथ जाएगा?"
वह चुप हो गया।
मैंने एम्बुलेंस निकाली। रात के ग्यारह बज रहे थे। डैशबोर्ड पर रिया की तस्वीर थी, उसके नीचे "रिया जोशी" चिपका था और उसके नीचे "रीना नायक"।
मैंने गाड़ी पुराने बाज़ार की तरफ़ मोड़ी। रात में बाज़ार बंद था, दुकानों के शटर गिरे हुए, बत्तियाँ बुझी हुई। हवेली की दीवार लंबी और पीली थी, जैसे किसी ने चूने से रंग दी हो और फिर कभी न छुआ हो। मैंने गाड़ी दीवार के साथ लगाई और उतरी।
दीवार के साथ एक गली थी — इतनी सँकरी कि एक आदमी भी तिरछा होकर जाए। मैंने टॉर्च जलाई। गली के अंदर गंध थी — सीलन, काई, और कुछ और। मीठी सी। फँसी हुई। स्याही की महक।
मैं रुक गई।
यह गंध मैंने पहले भी सूँघी थी। कहाँ? नहीं याद आया। पर थी।
मैं आगे बढ़ी। गली के बीच में एक चबूतरा था — पक्का, ऊँचा, किनारों से टूटा हुआ। उसके बगल में हैण्डपंप नहीं था। सिर्फ़ एक गड्ढा था, जहाँ कभी पंप रहा होगा। मैंने टॉर्च उस चबूतरे पर फेंका। मैंने घुटने टेके और ईंटों को देखा। कुछ ईंटें उखड़ी हुई थीं। मैंने उन्हें उठाया। नीचे मिट्टी थी, गीली, ठंडी।
मैंने हाथ से मिट्टी खोदनी शुरू की। नाखूनों में मिट्टी भर गई। दस मिनट बाद मेरी उँगली किसी सख़्त चीज़ से टकराई। मैंने और खोदा।
एक पत्थर। चौकोर, छोटा, हाथ के तीन उँगलियों जितना। पत्थर पर नाम खुदा हुआ था, पर घिस गया था। मैंने उसे टॉर्च की रोशनी में देखा।
"पी…" मैंने पढ़ा। "पीत… पीतल…"
वह नाम था — "पीतल गली।" मेरी साँस रुक गई।
मैंने पत्थर उठाया और जेब में रखा। फिर मैं खड़ी हुई और गली के आगे बढ़ी। गली के अंत में एक दरवाज़ा था — पुराना, लकड़ी का, बंद। उस पर भी नाम उभरा हुआ था — इस बार साफ़। "पीतल गली — मकान नंबर पाँच।"
मैंने दरवाज़े को ज़ोर से ठेला। वह खुल गया।
अंदर एक छोटा आँगन था। आँगन में एक कुआँ जैसी गोल जगह थी, पर सूखी। मैंने टॉर्च घुमाई। दीवार पर कुछ लिखा था — हाथ से, उँगली से, काली स्याही से। एक नाम — "रामदीन कुमार जोशी।" उसके नीचे — "पीतल गली।"
मेरी आँखें भर आईं।
मैंने फोन निकाला। रामदीन का नंबर मिलाया। उसने दूसरी घंटी पर उठाया।
"चाचा।" मैंने कहा। "रामदीन कुमार जोशी। पीतल गली।"
फोन पर सन्नाटा छा गया। फिर एक आवाज़ आई — और वह रो रहा था। मैंने पहली बार रामदीन को रोते सुना।
"मीरा।" उसने कहा। "मैं… मैं रामदीन कुमार जोशी हूँ। पीतल गली में रहता था।"
"बोलिए।" मैंने कहा। "और ज़ोर से बोलिए।"
"रामदीन कुमार जोशी! पीतल गली! मेरी आवाज़… मेरी आवाज़ यही है।"
और फिर हम दोनों चुप हो गए। सिर्फ़ उसकी साँसें सुनाई दे रही थीं।
"अब सो जा।" उसने धीरे कहा, काँपती आवाज़ में। "सुबह बात करेंगे।"
"आप ठीक हैं?"
"ठीक हूँ।" उसने कहा। "पहली बार… चालीस साल बाद। ठीक हूँ।"
फोन कट गया।
मैं आँगन में खड़ी रही। दीवार पर लिखा नाम देखती रही और सोचती रही — यह नाम किसने लिखा था? और यही नाम रजिस्टर में क्यों मिटा था?
मैंने अपनी नोटबुक निकाली। उस पन्ने पर लिखा — "रामदीन कुमार जोशी, पीतल गली, रोती-सी आवाज़।" फिर मैंने पेंसिल रखी।
और मैंने गली छोड़ी।
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