A Dark Secret – Chapter 306
उसका चेहरा बदला। "माँ, वो…"
"क्या हुआ?"
"उसका पूरा नाम शालिनी नायक है। दो फेज़ पार, ठीक उस घर में जो —" वह रुक गई। "जहाँ तू आज गई थी। कैसे पता?"
"मुझे पता है।" मैंने कहा। "उसकी माँ का नाम?"
"माँ," रिया ने धीरे से कहा, "उसकी माँ का नाम उसे भी याद नहीं। वह कहती है कि उसे याद है कि माँ थी। चेहरा याद है। पर नाम… वह कहती है जब वह नाम सोचती है, तो काग़ज़ पर कुछ नहीं आता। सिर्फ़ खाली जगह आती है।"
मैंने नोटबुक निकाली। "आवाज़ याद है उसे?"
रिया ने सोचा। "वह कहती है — माँ खाना बनाते वक़्त गुनगुनाती थी। कोई पुराना गाना। वह गाना याद है, नाम नहीं।"
मैंने लिखा। पूरा पता — दो फेज़ पार, शांति विहार, खिड़की वाला कमरा, गली का नाम। मैंने लिखा — "शालिनी नायक। माँ — रीना नायक?" फिर प्रश्नचिह्न लगाया।
"माँ," रिया ने पूछा, "तू क्यों लिख रही है ये सब?"
"क्योंकि," मैंने पेंसिल रखी, "जब कोई और नहीं लिखता, तब किसी को तो लिखना पड़ता है।"
वह कुछ देर मुझे देखती रही। फिर बोली, "मैंने शालिनी से कहा है कि वह अपनी माँ का नाम याद रखे। हर रोज़, तीन बार, ज़ोर से।"
मैं सकपका गई। "तूने क्यों कहा?"
"क्योंकि तूने मुझे कहा था।" वह मुस्कुराई। "एक बात और — शालिनी की माँ का नाम उसकी नानी को याद है। शालिनी ने बताया। नानी शहर के बाहर रहती है, बोलती है कि नाम याद है पर शहर में आने से डरती है।"
मैंने पेंसिल उठाई। "नानी का नाम?"
"शालिनी ने नहीं बताया। पर नंबर देने को कहा है।"
"कल माँगना।" मैंने पेंसिल दबाकर लिखा — "शालिनी की नानी — नाम और नंबर, कल।"
रात की ड्यूटी में मैंने असली काम नहीं किया। मैंने एम्बुलेंस को अस्पताल के पीछे खड़ा किया। दरवाज़ा खुला रखा। मैंने डैशबोर्ड की लाइट जलाकर अपना हाथ सामने रखा।
ज़रूरी था — जागते रहना। रामदीन ने कहा था।
रात के ग्यारह से तीन तक मैं जागी रही। चाय पी। रेडियो सुना — सिर्फ़ ख़बरें, कोई गाना नहीं। तीन बजे आँख भारी हुई। मैंने खुद को गाल पर चुटकी काटी। चार बजे सुबह की अज़ान आई। मस्जिद की आवाज़ दूर से आ रही थी, फिर मंदिर की घंटी भी।
मैं आँगन में खड़ी थी। आसमान हल्का हो रहा था। उँगली पर निशान अब भी था, पर और हल्का।
और फिर वह आई।
बूढ़ी औरत। अस्पताल के गेट से नहीं, गली के मोड़ से। चलने में थोड़ा झुकी, सिर पर सफ़ेद दुपट्टा। हाथ में एक पुराना बैग।
मैंने एम्बुलेंस रोकी।
"माँ, कहाँ जा रही हो इस वक़्त?"
वह मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई। इस बार मुझे पहचाना। "तू।"
"हाँ, मैं।"
वह पास आई। गेट पर खड़ी होकर बोली, "कल जो आई थी, वो किसी को ढूँढने आई थी।"
"किसको?"
"अपनी बेटी को।" वह रुकी। "पर उसे अपनी बेटी का नाम याद नहीं था। वह रो रही थी और बोल रही थी — उसका नाम बोलो, उसका नाम बोलो। पर मुझे याद नहीं था।"
"आपको याद है वो कैसी दिखती थी?"
"याद है।" उसने कहा। "चेहरा याद है। हाथ में एक काग़ज़ थी। वो काग़ज़ बहुत पुराना था।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। "आपका नाम क्या है?"
वह हँसी। "यही तो बात है। मुझे याद है। आज तक याद है।"
"बोलिए।"
"कोई नहीं मानता।"
"मैं मानूँगी।"
"सुमित्रा।" उसने कहा। "सुमित्रा देवी। गली — पड़ाव वाली गली। आवाज़ — यही।" वह हँसी।
"आप पड़ाव गली में रहती हैं?"
"हाँ। तीस साल से। नाम कभी नहीं गिरा। तेरे जैसी औरतें गिरती हैं। मैं… मैं नहीं गिरी।"
वह चली गई।
मैं गाड़ी में बैठी रही। रामदीन की बातें सोच रही थी। उसकी बातें, चड्ढा जी की चेतावनी, टूटे नाम-पट्टे, तस्वीर में धुँधला चेहरा।
और मुझे कुछ समझ आया — जो लोग असली नाम पूरी तरह याद रखते हैं, वे काग़ज़ों से नहीं मिटते। सुमित्रा देवी नहीं मिटी। शालिनी की नानी शायद नहीं मिटी। रामदीन मिट गया क्योंकि वह बोल नहीं पाया।
मैंने सुबह घर आकर नोटबुक खोली। सबसे पीछे एक नया पन्ना लिया।
मैंने उस पर लिखा — "सुमित्रा देवी, पड़ाव गली, बूढ़ी आवाज़।"
फिर नीचे — "रामदीन — पूरा नाम? जोशी?" और शालिनी वाली लाइन। और आख़िर में — मीरा जोशी।
मैंने पेंसिल रखी। हाथ जोड़े। माफ़ी माँगते हुए आसमान की तरफ़ देखा।
उँगली पर निशान अब भी था। पर मैंने अब उसे धोने का मन नहीं किया। रहने दिया। याद रखने के लिए।
फिर मैंने एम्बुलेंस का दरवाज़ा खोला और डैशबोर्ड पर चिपकी तस्वीर के नीचे, उस पुरानी पर्ची के ऊपर, एक नया काग़ज़ चिपका दिया — रिया के हाथ से लिखा हुआ। "रिया जोशी।"
और उसके नीचे एक और काग़ज़ — रसीद का। "रीना नायक।"
तीनों नाम अब एक साथ थे। रिया की तस्वीर के नीचे।
शाम को अस्पताल जाते वक़्त न मैंने रामदीन की तरफ़ देखा, न उसकी बेंच की। सीधे इमरजेंसी में घुस गई।
पर वह पहले से अंदर था।
रामदीन वहाँ नहीं बैठा था जहाँ रोज़ बैठता था। वह डॉक्टर की सीट के पास खड़ा था। हाथ में एक फाइल। सफ़ेद बाल बिखरे हुए।
"चाचा?" मैंने कहा।
उसने मुड़कर देखा। कुछ ऐसा था उसकी आँखों में जो पहले नहीं था।
"मीरा।" उसने कहा। मेरा पूरा नाम लिया। साफ़। कोई रुकावट नहीं।
फिर उसने फाइल मेरी तरफ़ बढ़ाई। "यह मिली। उस बूढ़ी औरत की जेब में आज सुबह। वह छोड़ गई।"
मैंने फाइल खोली। अंदर एक काग़ज़ था — पुराना, पीला, मोड़ा हुआ। काग़ज़ के ऊपर लिखा था — "सौदा — सरोज नगर। नियम, शर्तें, गवाह।"
और नीचे एक लाइन —
"जिसका नाम लिया, उसकी याद ली। जिसकी याद ली, वह शहर का।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। उसकी आँखें गीली थीं।
"चाचा, ये क्या है?"
"यह," उसने कहा, "वह काग़ज़ है जो मैंने चालीस साल पहले फाड़ना चाहा था। और तब से नहीं फाड़ पाया।"
"आपने ये क्यों नहीं फाड़ा?"
वह मुस्कुराया। धीमा। "क्योंकि जो नाम मैं बोल नहीं पाया था — वो इसी काग़ज़ पर लिखा है।"
॥
मैंने वह काग़ज़ अपनी जेब में रखा और रामदीन की तरफ़ देखा।
"चाचा, अब बताइए। बोलिए उस औरत का नाम।"
रामदीन ने आँखें बंद कर लीं। होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने फिर कोशिश की। "रा…" वह रुक गया। माथे पर पसीना आ गया, ठंडे वार्ड की हवा में भी।
"रामदीन।" मैंने धीरे कहा। "अपना पूरा नाम बोलिए। आपका पूरा नाम क्या है?"
"रामदीन…" उसने कहा। फिर उसकी आवाज़ गले में अटक गई, जैसे किसी ने पीछे से उसकी जीभ खींच ली हो। उसने हाथ से इशारा किया — रुको — और फिर कोशिश की। "रामदीन कु…" वह फिर रुक गया। इस बार उसने मुँह फेर लिया। "नहीं होता। चालीस साल से नहीं होता।"
"कुछ तो है। कोई तो रास्ता है।" मैंने कहा।
"रास्ता है।" उसने कहा, और फाइल की तरफ़ देखा जो मेरे हाथ में थी। "वो काग़ज़… उस पर सब लिखा है। शर्तें, नियम, और नाम। मेरा नाम भी।"
"तो फिर उसी से पढ़ लीजिए।"
"पढ़ नहीं सकता।" उसने कहा। "जो काग़ज़ एक बार मेरे हाथ से निकल गया, उसे मैं दोबारा नहीं पढ़ सकता। ऐसा नियम है। जिसने लिखा, वो पढ़ सकता है। जिसने दिया, वो नहीं।"
मैंने काग़ज़ खोला। पीला, मोटा, किनारों से फटा हुआ। ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था — "सौदा — सरोज नगर। नियम, शर्तें, गवाह।" नीचे छोटी-छोटी लाइनें थीं। कुछ जगह स्याही फैली हुई थी, कुछ शब्द पढ़े ही नहीं जा रहे थे।
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