A Dark Secret – Chapter 305
"वह बहुत शांत रहती है। किसी से बोलती नहीं। मैंने उसे अपनी बेंच पर बिठा लिया।"
"अच्छा किया।"
"पर माँ," रिया ने रोटी का टुकड़ा तोड़ा, "वह अजीब बातें बोलती है।"
"कैसी अजीब?"
"वह कहती है कि उसकी माँ दो महीने पहले गई थी, बाज़ार। और वापस नहीं आई।"
मैंने मक्खन वाला चाकू रख दिया।
"पुलिस में गई होगी?" मैंने पूछा।
"वह कहती है, पुलिस कहती है ऐसी कोई औरत उनके रिकॉर्ड में नहीं।" रिया ने मेरी तरफ़ देखा। "माँ, ये कैसे हो सकता है? कोई औरत हो, और पुलिस कहे कि वो है ही नहीं?"
मेरी उँगली पर पट्टी के नीचे खुजली हुई। मैंने खुजलाई।
"शालिनी का पूरा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
"पता नहीं। उसने बताया नहीं।"
"तो आज जाकर पूछना।" मैंने उसकी थाली में दो पराठे और रखे। "पूरा नाम, गली, घर का पता — सब। और उसकी माँ का नाम भी।"
रिया ने मुझे घूरकर देखा। "तू क्यों पूछ रही है?"
"बस। याद रखने के लिए।"
"तू अजीब होती जा रही है, माँ।" वह उठी। बस्ता उठाया। दरवाज़े पर रुकी और बोली, "कल वाली बात भी। मुझे अपना नाम लिखकर देने को कहा था। वो क्यों?"
"लिख देगी?"
"लिख दूँगी।" वह गई।
मैं सीढ़ियों पर बैठ गई। पट्टी खोली। निशान अब बिल्कुल हल्का था, पर था।
मैंने जेब से नोटबुक निकाली। उस पर लिखा — "निशा वर्मा, छब्बीस मार्च।" उसके नीचे — "रीना।" उसके नीचे अपना नाम। फिर एक नई लाइन खींची और लिखा — "शालिनी नायक, शालिनी की माँ — नाम पता नहीं।"
पेंसिल रखी। दोपहर का सूरज खिड़की से आ रहा था। नीचे वाले बूढ़े जोड़े की रेडियो बज रही थी, कोई पुराना भजन। बिल्कुल सामान्य सुबह।
पर मेरे हाथ में पेंसिल पकड़े हुए उँगली काँप रही थी।
मैंने जल्दी से तैयार होकर एम्बुलेंस निकाली। शांति विहार।
दोपहर के समय वह कॉलोनी और भी वीरान लगती थी। सड़क पक्की थी, पर दोनों तरफ़ सिर्फ़ आधे बने घर। कुछ में लोग रहते थे — बाहर साइकिल खड़ी, छत पर कपड़े सूख रहे। बाकी में सिर्फ़ दरवाज़े, खिड़कियाँ, सीमेंट जैसे कोई छोड़ गया हो।
मैं फेज़ दो में पहुँची। वह घर पहचाना — कल रात वहीं खड़ी हुई थी, इसी गली में।
ताला नहीं था। मैंने दरवाज़ा धकेला। अंदर धूल थी, पर फ़र्नीचर था — एक चारपाई, एक पुरानी अलमारी, रसोई में बर्तन। बर्तन धुले हुए थे, बासी नहीं। जैसे कल तक कोई रहता था।
मेज़ पर एक छोटी सी कॉपी पड़ी थी। किसी बच्चे की कॉपी। ऊपर नाम लिखा था — "शालिनी नायक, कक्षा आठ, रोल नंबर बारह।"
मेरी साँस रुक गई।
यही घर है। रिया की नई दोस्त यहीं रहती है।
मैंने कमरे में चारों तरफ़ देखा। दीवार पर एक तस्वीर टँगी थी, काँच चटका हुआ। तस्वीर में तीन लोग — एक औरत, एक आदमी, और एक लड़की। लड़की शालिनी जैसी ही थी। औरत की शक्ल धुँधली थी, चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था।
मैंने तस्वीर उतारी। पीछे लिखा था — "अप्रैल, तीन साल पहले।" नाम नहीं।
"कौन है?"
आवाज़ पीछे से आई। मैं पलटी।
दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था, पड़ोस का। पचास के करीब, कुर्ता-पजामा, हाथ में चाय का कप।
"मैं…" मैंने तस्वीर वापस दीवार पर टाँगने की कोशिश की, "मैं इस घर के बारे में पूछने आई थी।"
"क्यों?"
"यहाँ जो लोग रहते थे —"
"कौन रहता था यहाँ?" उसने भौंहें चढ़ाईं।
"वो ही तो पूछ रही हूँ।"
वह कुछ वक़्त खड़ा रहा। फिर उसने चाय का घूँट लिया। "पता नहीं।"
"आप पड़ोस में रहते हैं —"
"पता नहीं, बोल रहा हूँ।" उसने चारों तरफ़ देखा, जैसे खुद सोच रहा हो। "कुछ लोग रहते थे। दीवार पर पर्दे लगे थे। एक लड़की थी। पर नाम…"
वह रुका। उसकी आँखों में वही खालीपन था जो कल सुप्रिया की आँखों में था।
"नाम याद नहीं," उसने कहा, और चाय का आख़िरी घूँट पीकर वापस चला गया। "यह घर बहुत पुराना है। पहले कोई और था।"
दरवाज़े तक गया, फिर पलटा। "सुनो, तुम किसी को ढूँढ रही हो तो मत ढूँढो। इस कॉलोनी में जो नहीं मिलता, वो मिलता नहीं। यहाँ अगर कुछ भूल जाओ, तो भूल जाओ। समझीं?"
वह चला गया।
मैं वहाँ खड़ी रही। चारपाई पर बैठ गई। एक काग़ज़ कॉपी के पन्नों के बीच से निकला — रसीद थी, बिजली की। ऊपर नाम — "रीना नायक।"
रीना।
वही नाम जो चड्ढा जी के रजिस्टर में था। वही नाम जो रामदीन से पूछा था और वह चुप हो गया था।
मैंने रसीद अपनी जेब में रखी। तस्वीर उतारकर बस्ते में डाली।
अब मैं घर नहीं जा सकती थी। सीधे अस्पताल पहुँची।
बेंच पर रामदीन बैठा था। गर्मी में भी वही भूरी जैकेट। जेब में हाथ। सामने खाली चबूतरे पर एक कबूतर चोंच मार रहा था।
मैं उसके बगल में बैठ गई।
"चाचा।"
उसने आँख उठाई। मुस्कुराया। "आ गई आज।"
"आज मुझे सीधी बात चाहिए।"
वह हँसा। "सीधी बात? मुझे सीधी बात कब आती थी।"
"चालीस साल पहले क्या हुआ था?"
उसका हाथ जेब से बाहर आया। वह जेब में हाथ नहीं डाल सका। उसकी उँगलियाँ हवा में कुछ ढूँढने लगीं।
"मैं कभी कभी सोचता हूँ," उसने धीरे से कहा, "कि मुझे कभी रुकना नहीं चाहिए था।"
"कहाँ रुकना नहीं चाहिए था?"
"बस स्टैंड पर।" उसने कहा। "रात का आख़िरी बस। वह चढ़ने लगी। मैंने हाथ बढ़ाया था।"
वह रुक गया। दूर किसी ने एम्बुलेंस की सीटी बजाई।
"उसका नाम क्या था?" मैंने पूछा।
"बता दूँगा," उसने कहा। "बता दूँगा। पर आज नहीं।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि मैं उसे बोलूँगा," वह मेरी तरफ़ मुड़ा, "और बोलते ही मुझे हो जाएगा — मुझे याद है। पर नहीं होता। मैं उसे बोलता हूँ, और उसके बाद… फिर मैं उसे भूल जाता हूँ। जैसे किसी ने मेरे मुँह से उसे खींच लिया हो।"
"तो लिख लो।" मैंने कहा।
"लिखा है।" उसने अपनी जेब टटोली। "यहाँ भी।" वह पेंट की जेब पर हाथ रखकर बैठा, पर कुछ निकाला नहीं। आह भरकर मेरी तरफ़ देखा। "एक बात सुन।"
"बोलिए।"
"मैंने चालीस साल पहले एक औरत का नाम याद करना चाहा था। पूरा नाम, गली, आवाज़ — सब। खूब याद किया था। रटा था। और एक दिन मैंने उसे बोलना चाहा। तीन बार कहा — यहाँ, अस्पताल के गेट पर। तीनों बार मेरे मुँह से आधा ही निकला। आख़िरी बार तो शुरू भी नहीं किया।"
"फिर?"
"फिर," उसने अपने घुटनों की तरफ़ देखा, "मैं उसे भूल गया। और उसके बाद से मैं अपना पूरा नाम याद नहीं रख पाता। रामदीन… बाबा। बस इतना। जोशी कभी कहता हूँ, कभी याद नहीं आता। कभी कहता हूँ, वो भी भूल जाता हूँ।"
बेंच चुप हो गई।
"तो नाम बोलने से क्या होता है?" मैंने पूछा। "कुछ वापस मिलता है या कुछ चला जाता है?"
वह मेरी तरफ़ देखने लगा। मुझे लगा वह कुछ कहेगा। पर उसने बस उँगली उठाई — ठीक मेरे पट्टी बँधे हाथ की तरफ़ इशारा।
"तूने वो क्यों बाँधी है?"
"उँगली कट गई।"
"झूठ।" वह उठा। जैकेट सँभाली। "मुझे दिखा।"
मैंने पट्टी खोली। निशान अब भी था, हल्का।
रामदीन ने देखा। कुछ देर देखता रहा। फिर बोला, "आज रात सुनते वक़्त जागना। सो जाएगी तो और गहरा हो जाएगा।"
वह चला गया।
शाम को रिया लौटी। बस्ता पटका। हाथ मुँह धोया। फिर सीधे मेरे पास आई, बिना कहे एक काग़ज़ दे दिया।
उस पर उसका नाम था, बड़े अक्षरों में, नीले पेन से — "रिया जोशी।"
"लिख दिया।" उसने कहा। फिर थोड़ा शरमाई, मुस्कुराई। "क्यों, ठीक है ना?"
"ठीक है।" मैंने उसे मोड़कर जेब में रखा। "शालिनी का?"
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