A Dark Secret – Chapter 304
वह कुछ देर खड़ा रहा। फिर आसमान की ओर देखता हुआ चुप हो गया। कोई जवाब नहीं। मैंने जाना, जवाब नहीं आएगा।
मैंने उसका हाथ पकड़ा। "चाचा, अपना नाम बताओ। ज़ोर से।"
वह मेरी तरफ़ देखने लगा। बहुत देर तक देखा। फिर उसका होंठ हिला, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने दोबारा कोशिश की। "रामदीन।" बस इतना कहकर वह रुक गया, आँखें भर आईं।
"बाकी?" मैंने धीरे से पूछा।
"बाकी… मुझे नहीं पता। मुझे सिर्फ़ यह याद है कि मेरा नाम रामदीन था। कुछ और भी था उसमें। कुछ और।" उसने आँखें मलीं। "जो नाम पूरा याद नहीं रहता, वो… वो आधा ही होता है।"
मैंने उसे अपनी डायरी दी। "लिखो जो याद हो। जो भी टुकड़ा हो।"
उसने पेंसिल उठाई। हाथ काँप रहा था। लिखा — "रामदीन… बाबा।" फिर रुक गया। मेरी तरफ़ देखा। "बस इतना ही।"
"ठीक है।" मैंने कहा। "इतना ही सही।"
मैं अंदर गई। इमरजेंसी वार्ड में भीड़ थी। एक बच्चा साँस की तकलीफ़ से आया था, दो नर्सें उसके पास दौड़ रही थीं। मैंने देखा, बूढ़ी औरत अभी भी वहीं भर्ती थी। पड़ाव गली वाली। मैं उसके पास गई।
वह जाग रही थी। मुझे देखा। आँखें पहचानने की कोशिश कर रही थीं।
"आपको क्या याद है?" मैंने पूछा। "कल रात के बारे में।"
"कौन सी कल रात?" उसकी आवाज़ सूखी थी। "मुझे तो याद है… मैं सुबह उठी थी। चाय बनाई थी। फिर… फिर मुझे याद है कोई आया था। दरवाज़ा खटखटाया था।"
"कौन?"
वह रुकी। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। "मुझे… मुझे नाम नहीं याद। चेहरा याद है। कोई था। कोई औरत थी। पर… पर मुझे उसका नाम नहीं याद।"
"क्या वह कोई ड्राइवर थी? एम्बुलेंस वाली?"
"मैं…" वह सोचने लगी। "मैं नहीं जानती। मुझे नहीं पता।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू भी वही है ना? जो कल आई थी?"
"हाँ।"
"तू मुझे अपना नाम बता। मैं याद रखूँगी।"
"मीरा। मीरा जोशी।"
उसने दोहराया। "मीरा… मीरा जोशी।" फिर उसने आँखें मूँद लीं। "अब जा। मुझे थकान हो रही है।"
मैं बाहर आई। सलीम मिला। उसके हाथ में चाय का कप था। उसने कहा, "चड्ढा जी तुझे ढूँढ रहे थे। बोले, आज शाम वाली बात अधूरी रह गई थी।"
"मैं जानती हूँ।"
"मीरा," सलीम ने धीरे से कहा, "मैंने आज कुछ सोचा। जब तूने कल निशा का नाम पूछा, तो मुझे याद आया था। पर आज सुबह जब मैं उठा, तो मुझे नहीं याद था। मैंने सुप्रिया से पूछा, उसे भी नहीं याद था। यह कैसे होता है? नाम कैसे गायब हो जाता है?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैंने अपनी डायरी में लिख लिया है।" उसने अपना मोबाइल निकाला। "देख, नोट्स में। 'निशा वर्मा। अस्पताल की ड्राइवर। छब्बीस मार्च।' अगर मैं इसे मिटाता नहीं, तो रहेगा ना?"
"रहेगा।" मैंने कहा। "ज़ोर से बोलकर पढ़ लिया कर।"
वह हँसा। "तू भी अजीब बातें करती है।"
पर उसने अपने नोट्स में वह लाइन पढ़ ली — ज़ोर से।
रात की ड्यूटी शुरू हुई। पहला कॉल आया — पड़ाव गली से नहीं, एक नई कॉलोनी से। शांति विहार, फेज़ दो। वहाँ एक बुज़ुर्ग आदमी को सीने में दर्द हुआ था।
मैं गई। रास्ते में सड़कें खाली थीं। गली के मोड़ पर बत्तियाँ नहीं जल रहीं थीं। मैंने एम्बुलेंस रोकी और देखा।
हर घर के बाहर, दरवाज़े के बगल में, नाम-पट्टा लगा था। पर आज वो सब उतरकर ज़मीन पर पड़े थे। टूटे हुए। कुछ के टुकड़े बिखरे थे, किसी पर धूल थी, किसी का रंग उतरा था। मैंने एक पट्टा उठाया — पढ़ने की कोशिश की, पर उस पर नाम नहीं था। सिर्फ़ निशान था, जैसे किसी ने पेंसिल से लिखकर मिटा दिया हो।
मैंने चारों तरफ़ देखा। हर मकान का हाल वही। कोई नाम नहीं, कोई पहचान नहीं।
मुझे ठंड लगी। पर पसीना भी आ रहा था।
मरीज़ को अस्पताल पहुँचाया। डॉक्टर ने देखा, कहा, "देर नहीं हुई। ठीक है।" मैं बाहर आई। बेंच पर बैठ गई। रात दो बजे का वक्त था।
फिर नींद आ गई। बस एक पल के लिए। इमरजेंसी के बाहर वही पुरानी बेंच, वही स्ट्रेचर, वही पीली रोशनी।
और सपना शुरू हुआ।
वही बंद कमरा। दीवार। बिना दरवाज़े की दीवार। मैं अपनी उँगली के अगले हिस्से से दीवार पर लिख रही थी — "मीरा जोशी।" बड़े अक्षरों में। पर इस बार मुझे पता था कि मैं नहीं लिख रही। मेरा हाथ तो मेरे साथ था, पर उँगली अपने आप चल रही थी। जैसे किसी और ने मेरा हाथ पकड़ रखा हो।
मैंने लिखना रोकने की कोशिश की। उँगली नहीं रुकी। दीवार पर अक्षर बनते गए — म, ी, र, ा, ज, ो, श, ी।
फिर उँगली नीचे आई। "म" लिखने लगी। माँ। माँ।
मैं जागी। साँस फूल रही थी। बेंच पर बैठी थी। सामने स्ट्रेचर खड़ा था, पहिया बाईं तरफ़ खिंचा हुआ। मैंने अपनी उँगली देखी।
उस पर काली स्याही का निशान। छोटा। ताज़ा। गीला।
मैंने उसे रगड़ा। नहीं गया।
मैंने चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं था। सिर्फ़ रिमोट पर लगी ट्यूबलाइट काँप रही थी।
मैंने अपनी जेब से वह पीतल की कलम निकाली। उसे खोला। उसकी नोक पर स्याही की बूँद चमक रही थी। काली। ठंडी।
मैंने कलम को वापस जेब में रखा। फिर अपना हाथ देखा।
उँगली पर स्याही का निशान वैसा ही था, जैसा सुबह नहीं था। जैसा कल नहीं था।
मैंने रात की ड्यूटी खत्म की। सुबह घर लौटी। रिया स्कूल जाने की तैयारी कर रही थी। मुझे देखकर बोली, "माँ, तेरी उँगली पर क्या लगा है?"
मैंने हाथ पीछे छिपा लिया। "कुछ नहीं। स्याही है।"
"कौन सी स्याही?" उसने पूछा। "हमारे घर में काली स्याही कहाँ से आई?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वह अपना बस्ता उठा रही थी, बाल बाँध रही थी। कोई डर नहीं, कोई शक नहीं। बस सवाल। वही सवाल जो वह हमेशा पूछती है।
"रिया," मैंने कहा, "आज स्कूल से आकर मुझे अपना पूरा नाम लिखकर देना। बड़े अक्षरों में।"
"क्यों?"
"बस। लिख देना।"
वह हँसी। "तू अजीब है, माँ।" फिर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। रुकी। "और हाँ, मैंने सुना है, शांति विहार में कल रात सबके नाम-पट्टे गिर गए। स्कूल में सब बात कर रहे थे। कोई कह रहा था कि वहाँ भूत है।"
"तू क्या सोचती है?"
"मैं सोचती हूँ," उसने दरवाज़े से कहा, "कि नाम-पट्टे अपने आप नहीं गिरते।"
वह चली गई।
मैं आँगन में गई। एम्बुलेंस खड़ी थी। मैंने उसका दरवाज़ा खोला। डैशबोर्ड पर रिया की तस्वीर थी। मैंने उसे देखा। फिर अपनी जेब से वह पर्ची निकाली — "निशा वर्मा, छब्बीस मार्च।" और उसे एम्बुलेंस के अंदर, डैशबोर्ड के नीचे, चिपका दिया। जहाँ रिया की तस्वीर थी, उसके ठीक नीचे।
फिर मैंने अपना हाथ देखा। उँगली पर स्याही का निशान अभी भी था।
मैंने उसे मिटाने की कोशिश नहीं की।
॥
सुबह छह बजे मैंने नल खोला और उँगली पर साबुन मलकर उसे रगड़ना शुरू किया।
पानी ठंडा था। साबुन झाग छोड़ रहा था। मैंने ब्रश लिया। नाखून के नीचे तक साफ़ किया। पोंछा।
निशान वहीं था। हल्का सा। काला नहीं, अब भूरा।
मैंने फिर मला। इस बार तेज़। त्वचा लाल हो गई।
निशान हल्का और पड़ गया, पर गया नहीं।
रिया नहाने गई थी। मैंने जल्दी से हाथ पोंछकर पट्टी बाँध ली — वही सफ़ेद पट्टी जो अस्पताल से घर आती है। बहाना बना दिया कि चाकू से उँगली कट गई थी।
रिया ने पूछा भी नहीं। उसका ध्यान कहीं और था।
वह नाश्ते की मेज़ पर बैठी और बोली, "माँ, आज एक नई लड़की आई है स्कूल में। शालिनी।"
"अच्छा।" मैंने रोटी पर मक्खन लगाया।
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