A Dark Secret – Chapter 303
मैंने उसे रूमाल से पोंछा। स्याही मेरी उँगली पर नहीं लगी। जैसे वह स्याही सिर्फ़ कागज़ को ही लगती है। मैं उसे जेब में रख लिया।
शाम सात बजे मैं चड्ढा जी के केबिन में गई। वह अब वहाँ थे। मुस्कुराए। "आ जा, बैठ। चाय लेगी?"
"नहीं सर। आपने बुलाया था।"
"हाँ। सुन, मीरा। तुझे पता है, अस्पताल की तरफ़ से एक नया नियम आया है।" उन्होंने मेज़ पर कागज़ रखा। "रात की ड्यूटी सिर्फ़ छह घंटे की होगी। और ड्यूटी रजिस्टर अब हम रोज़ सुबह खुद चेक करेंगे। तू बस अपना नाम लिखने के बाद फोटो खींच लिया कर। मुझे भेज दिया कर। पुराने ज़माने की बातें अब नहीं चलेंगी।"
मैंने उनकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे वह कोई और हों। "सर, आपने छब्बीस मार्च की फाइल में हस्ताक्षर किए थे? छह साल पहले?"
उनका चेहरा नहीं बदला। "मैंने तो बहुत फाइलों पर किए हैं।"
"Пानी वाली फाइल। निशा वर्मा। रात की ड्यूटी में गायब हुई।"
कुछ सेकंड वह चुप रहे। फिर हँसे। "मीरा, तू भी ना। इस अस्पताल में हर साल कोई ड्राइवर नौकरी छोड़कर जाता है। कोई कहता है, गायब हो। तुझे किसी ने कुछ कहा है क्या? कोई बूढ़ा?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"देख, मैं तुझे साफ़ कहता हूँ। उस बूढ़े के पीछे मत पड़। वो खुद अपना नाम नहीं बचा पाया। जब वो यहाँ काम करता था, तो हर हफ्ते उसका नाम रजिस
॥
चड्ढा जी की आवाज़ दरवाज़े के बाहर तक आ रही थी, पर मैं उनकी बात पूरी सुनने से पहले ही उठ गई। मुझे उनके केबिन में नहीं बैठना था। जेब में वह पुराना रजिस्टर था, और रजिस्टर में मेरा आधा मिटा हुआ नाम।
मैं सीधी ड्यूटी रजिस्टर वाली मेज़ तक गई। जहाँ रात भर हर ड्राइवर अपना नाम लिखता है, वक्त के साथ। मेरी ड्यूटी शुरू होने में अभी डेढ़ घंटा था, पर मैंने सोचा, पहले अपना नाम लिख दूँ, फिर चड्ढा जी से जो भी होगा होगा।
मेज़ पर नया रजिस्टर खुला था। बिल्कुल नया। सफ़ेद पन्ने, नीली लाइनें, ऊपर तारीख़ का खाना। मैंने पन्ना पलटा। आज की तारीख़ वाला पन्ना। उस पर सिर्फ़ दो नाम थे — एक दिन की ड्यूटी वाले ड्राइवर का, और सलीम का।
मेरा नहीं।
मैंने सुप्रिया को आवाज़ दी। वह पास ही काउंटर पर बैठी थी, कुछ फाइलें छाँट रही थी।
"सुप्रिया, यह रजिस्टर कब से है?"
"आज सुबह लाया है चड्ढा जी ने। बोले, पुराना गंदा हो गया था। नए नियम के साथ नया रजिस्टर भी।"
"तो कल का रजिस्टर कहाँ है? जिसमें मैंने निशा वर्मा का नाम लिखा था?"
वह रुकी। मेरी तरफ़ देखा। "कौन सा नाम?"
"निशा वर्मा। कल रात मैंने लिखा था। तूने खुद देखा था।"
उसने फाइलें मेज़ पर रख दीं। "मीरा, कल रात का रजिस्टर तो… मैंने तो कल रात कोई नाम नहीं देखा। तू आई थी, नाम लिखा, और चली गई थी। बस।"
"और निशा वर्मा का नाम?"
"कौन निशा वर्मा?" उसने सच में पूछा। आँखों में कुछ नहीं था। न कोई छिपाने की कोशिश, न कोई शरारत। बस खालीपन।
मैंने कुछ नहीं कहा। सीधे रिकॉर्ड रूम गई। कल की फाइलें ढूँढीं। वह वाला रजिस्टर नहीं मिला। जिस चीज़ पर सुप्रिया ने कल रात काली स्याही का निशान देखा था — वो पन्ना ही गायब था। जगह पर नया पन्ना चिपका था, एकदम साफ़।
मैंने अपनी जेब से पेंसिल निकाली और अपनी छोटी नोटबुक खोली। पहले पन्ने पर रीना का नाम लिखा था। नीचे निशा वर्मा। नीचे रामदीन। और अब मैंने अपना नाम लिखा — "मीरा जोशी।" बड़े अक्षरों में। पेंसिल से। इतनी ज़ोर से कि पन्ना दब गया।
अगर यह नोटबुक मिटती नहीं, तो मैं खुद को यहीं बचा लूँगी। यही सोचा था मैंने।
घर पहुँची तो सुबह के आठ बज चुके थे। रिया स्कूल जा चुकी थी। नीचे वाले बूढ़े जोड़े ने दरवाज़ा खोल दिया। आंटी ने कहा, "रिया ने नाश्ता खुद बनाया। तेरे लिए भी रखा है। बोली, माँ देर से आएगी।"
मैं ऊपर गई। थाली में दो पराठे रखे थे, ऊपर से कपड़ा डाला हुआ। बगल में एक चिट्ठी। रिया की लिखाई, गोल-गोल, जल्दी में लिखी — "माँ, स्कूल में आज विज्ञान का पेपर है। रात को तू मुझे जगा देना, मुझे कुछ पूछना है। और हाँ, तेरी एम्बुलेंस का पिछला दरवाज़ा फिर खुला है। बंद कर देना।"
मैं पराठा खाते हुए मुस्कुरा दी। और फिर वह सपना याद आया।
पिछली रात वाला। बंद कमरा। दीवार। उंगली से लिखा नाम। मैं जानती थी कि सपने में क्या था, पर उसका नाम नहीं बता पा रही थी। मुझे याद था कि मैंने दीवार पर कुछ लिखा था, पर क्या लिखा था, यह याद नहीं था। और वह सबसे डरावनी बात थी — अपना ही सपना याद रखना, पर उसमें लिखी अपनी बात भूल जाना।
मैं आँगन में गई। एम्बुलेंस खड़ी थी। पिछला दरवाज़ा सच में खुला था। मैंने ज़ोर लगाकर बंद किया। धातु की आवाज़ गूँजी।
फिर मैंने गाड़ी के अंदर झाँका। डैशबोर्ड पर रिया की तस्वीर। उसकी उम्र सात साल की होगी उसमें, दाँत दिखाकर हँस रही है, हाथ में आइसक्रीम। उसके नीचे मेरी पुरानी डायरी है, जो मैंने कभी पूरी नहीं लिखी। पहले पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन है — "माँ ने कहा था, हमें इस शहर में नाम मिला है।"
मेरी माँ। सुशीला जोशी। जो अब नहीं हैं। जब मैं ग्यारह साल की थी, तब वह गईं। मुझे याद है वो हमेशा जल्दी में रहती थीं। मकान खरीदते वक़्त भी जल्दी में थीं। कहती थीं, "मीरा, देख, हमें अपना घर मिल गया। अब यहीं रहेंगे। यह शहर हमें जानता है।"
मैंने डायरी बंद कर दी।
दोपहर में मैंने एम्बुलेंस की सफ़ाई की। पानी की बाल्टी, कपड़ा, इंजन का तेल। दो घंटे लगे। जब पोंछा मार रही थी तो पीछे की सीट के नीचे कुछ फँसा दिखा। हाथ डाला। एक पुरानी पर्ची निकली। किसी का नाम? या कोई रसीद? कागज़ भीगा था, मैंने उसे ध्यान से खोला।
उस पर एक नाम लिखा था, और एक तारीख़ — "निशा वर्मा, छब्बीस मार्च।" नीचे एक लाइन — "कृपया रात की ड्यूटी में न आएँ।"
मैं वहीं बैठ गई। यह पर्ची महीनों पुरानी थी, पर किसी ने इसे साफ़ नहीं किया था। कोई इसे यहीं भूल गया था। या छोड़ गया था, जान-बूझकर।
मैंने पर्ची अपनी जेब में रखी। फिर मैंने अपना हाथ देखा। इंजन के तेल में सना हुआ। मैंने उसे पानी से धोया। साफ़ हो गया।
शाम छह बजे मैं अस्पताल लौटी। गेट पर रामदीन खड़ा था। उसकी भूरी जैकेट वही थी, जेब से पान मसाला झाँक रहा था। वह बेंच पर नहीं बैठा था। खड़ा था, गेट की लोहे की छड़ों से थोड़ा टिका हुआ।
"चाचा, तुम यहाँ?" मैंने पूछा।
"आज बैठने का मन नहीं था।" उसने आसमान की ओर देखा। "तू सीधी बात करती है, इसलिए बोलता हूँ। नाम बोलने की आदत डाल। ज़ोर से। जब अकेली हो, जब गाड़ी चला रही हो, जब नहा रही हो। अपना नाम, अपने लोगों के नाम। वरना भूल जाएगी। और भूलने वाले को कोई नहीं ढूँढता, मीरा। कोई नहीं।"
"क्यों?" मैंने पूछा। "क्यों कोई नहीं ढूँढता?"
"क्योंकि जब कोई भूलता है," उसने धीरे से कहा, "तो ढूँढने वाला भी उसे भूल जाता है।"
कुछ देर वह चुप रहा। फिर मैंने वह पर्ची निकाली। "यह क्या है?"
उसने देखा। उसका चेहरा कुछ देर के लिए जम गया। फिर वह हँसा, पर हँसी नहीं थी। "यह… यह उसने खुद लिखा था। उसकी लिखाई है। मैंने देखा है ना, कई बार।"
"किसने?"
"उसने। जो तुझे नज़र आई बेंच पर सुबह। निशा।" उसने आसमान की ओर फिर देखा। "मुझसे भी नहीं बोली। किसी से नहीं बोली। बस चली गई।"
"तो रीना कहाँ गई, चाचा?"
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