A Dark Secret – Chapter 302
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर बोला, "मीरा, इस अस्पताल में बहुत साल पहले एक बात फैली थी। मुझे आधी-अधूरी याद है। कुछ लोग कहते थे कि रात की ड्यूटी में जो ड्राइवर होते हैं, उनके नाम कभी-कभी कागज़ों से उतर जाते हैं। जैसे वो ड्यूटी पर होते हैं, पर कागज़ पर नहीं होते। और जब ऐसा होता था, तो उस ड्राइवर से किसी मरीज़ को चोट लग जाती थी। बस एक बार। फिर नाम वापस आ जाता था।"
"किसने फैलाई थी बात?"
"पता नहीं। पर सबसे ज़्यादा जिसका नाम गायब हुआ था… वो एक बूढ़ा ड्राइवर था। बड़ी दाढ़ी। पान खाता था।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "क्या मैंने कुछ गलत कहा?"
मैंने गाड़ी चलाई। मन में सवाल घूम रहा था — रामदीन सिर्फ़ मदद कर रहा है, या वही इस सब के बीच में है?
बच्चे को अस्पताल पहुँचाकर लौटे। देर रात दो बजे मैंने अपनी नोटबुक खोली। निशा वर्मा के नाम के नीचे एक प्रश्न चिह्न लगाया। फिर लिखा — "रामदीन को क्या चाहिए?"
तभी मेरे पीछे खड़ी एक नर्स ने कहा, "ये निशा वर्मा कौन है?"
मैं चौंकी। "तुमने कैसे पढ़ा? मैंने मुँह से नहीं बोला।"
वह हँसी। "मैंने तो रजिस्टर देखा था। तुमने अभी उसमें ये नाम लिखा, ना? काली स्याही से। मैंने देखा।"
"तुमने देखा?" मैंने रजिस्टर की तरफ़ देखा। "मैंने तो कुछ नहीं…"
वह जा चुकी थी। मैंने रजिस्टर उठाया। उस पन्ने पर जहाँ मैंने काली स्याही से निशा का नाम लिखा था… वहाँ अब कुछ नहीं था। सिर्फ़ मेरी कलम का निशान। नाम गायब।
मैंने रजिस्टर बंद किया। जेब से नोटबुक निकाली। "निशा वर्मा" वहाँ था? था। मेरे अपने अक्षरों में। तो नाम सिर्फ़ रजिस्टर से गया था, नोटबुक से नहीं।
मुझे समझ आने लगा। रजिस्टर कोई मामूली कागज़ नहीं है। वो स्याही से मिटता है। पर जो मेरे हाथ से लिखा, वो मेरे पास रहता है।
अगली सुबह मैं अस्पताल के पुराने गार्ड, बाबूलाल से मिली। वह तीस साल से यहाँ था। उसकी याददाश्त ढलती उम्र के साथ भी तेज़ थी।
"बाबूलाल जी, रामदीन को जानते हो?"
उसने चेहरा बनाया। "रामदीन? वो तो पागल है। पहले यहाँ गाड़ी चलाता था। फिर उसका नाम गायब हो गया।"
"कब?"
"बहुत साल पहले। उस वक़्त मैं नया था। बस एक पूरा हफ्ता उसका नाम रजिस्टर में नहीं आया। तनख्वाह नहीं आई। तो वो रोज़ आता, रोज़ लिखता, रोज़ मिट जाता। आख़िर में सुपरवाइज़र ने कहा, 'रामदीन, तू जा, तेरा नाम अब इस अस्पताल में नहीं रहा।' वो जाने को तैयार नहीं था। उसने कहा, 'मेरा नाम वापस लाओ।' पर कोई सुनने वाला नहीं था।"
"तो वो गया कैसे?"
"गया नहीं। वहीं बैठ गया। बेंच पर। जब तक किसी ने उसे नहीं बताया कि वो गाड़ी चला सकता है, वो नहीं उठा। पर बात यह है, उसके बाद से हर एम्बुलेंस ड्राइवर जो उस बेंच के पास से गुज़रता, उसे वो यही कहता — 'रजिस्टर देख लेना। अपना पन्ना।'"
"आपको लगता है वो खतरनाक है?"
बाबूलाल ने गर्दन खुजाई। "रामदीन खतरनाक नहीं। वो बस अपना नाम वापस चाहता है। पर वो जानता है कि नाम कैसे मिटते हैं। और जिसे ये बात आती है, वो चाहे तो दूसरों के नाम भी मिटा सकता है।"
"क्या किसी ने मिटाया?"
वह चुप हो गया। फिर बोला, "पाँच साल पहले एक लड़की आई थी। नाम… नीरू? नीशा? कुछ था। वो बहुत ज़ोर लगाती थी। रामदीन से बातें करती थी। रामदीन ने उसे कुछ बताया था, यही कागज़ वाली बात। उसके बाद वो औरत गायब हो गई। अस्पताल ने कहा, नौकरी छोड़ गई। पर मैंने उसे जाते नहीं देखा।"
मैंने अपनी नोटबुक खोली। "निशा वर्मा?"
उसने आँखें सिकोड़ीं। "हाँ… शायद। पर ज़्यादा मत पूछ। मुझे भी सब याद नहीं। रात में मैं गार्ड की कोठरी में बैठा रहता हूँ। और कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं भी अपना नाम भूल रहा हूँ।"
यह सुनते ही मेरी साँस रुक गई। "क्या मतलब?"
"मतलब यह कि इस अस्पताल में रजिस्टर सिर्फ़ कागज़ नहीं। रजिस्टर याददाश्त है। जो नाम रजिस्टर में नहीं, वो किसी के दिमाग़ में भी नहीं रहता। बस उन लोगों को छोड़कर जो उसे अपने हाथ से लिखते हैं।"
मैंने सोचा — नोटबुक। मेरी नोटबुक।
मैं दौड़कर ड्यूटी रूम गई। नोटबुक निकाली। उसमें नाम थे। रीना। निशा। रामदीन का नाम भी मैंने लिख दिया। मैंने उसे देखा। भरा हुआ महसूस हुआ, जैसे कुछ पकड़ में आ गया।
तभी सुप्रिया अंदर आई। "मीरा, तेरे लिए एक आदमी आया है। कह रहा है, पुराने रिकॉर्ड वाले कमरे की चाबी चाहिए।"
"कौन?"
"बोला, रामदीन।"
मैं बाहर दौड़ी। रामदीन गेट पर खड़ा था। मुझे देखकर हँसा। "तेरी नोटबुक में मेरा नाम है ना? मुझे पता है। तुझसे बात करके मुझे अच्छा लगता है, जैसे मैं किसी को याद हूँ। पर अब मुझे रिकॉर्ड कमरे की चाबी चाहिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि तेरा नाम भी अब रजिस्टर से जाता-जाता बचा है। रात को तेरा नाम फिर मिटेगा। और अगली बार शायद नोटबुक भी काम न करे।"
"आपको क्या मिलेगा इसमें?"
"मुझे अपना नाम चाहिए।" उसकी आवाज़ पहली बार सख्त हुई। "छब्बीस मार्च की फाइल में मेरा नाम है। नीली स्याही से। जिसने मिटाया, वो अब भी उसी अस्पताल में है। मैं उसे ढूँढ रहा हूँ। तुझे लगता है मैं तेरे पीछे पड़ा हूँ? मैं उसके पीछे पड़ा हूँ जो हम सबके नाम मिटा रहा है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। धुँधली थीं, पर साफ़। "मैं चाबी नहीं दे सकती।"
"तो फिर खुद देख ले। छब्बीस मार्च की फाइल में, नीचे, कोई हस्ताक्षर है। उसे पढ़।" वह मुड़ा। "पर एक बात याद रख — जो नाम उस फाइल में है, वो शायद अब उसके मालिक का नहीं।"
वह चला गया।
मैं रिकॉर्ड रूम में गई। छब्बीस मार्च की फाइल फिर निकाली। नीचे हस्ताक्षर थे — एक सुपरवाइज़र के, जिसने बंद होने की एंट्री की थी। नाम पढ़ा — "के. चड्ढा।"
मेरे हाथ से फाइल छूट गई।
चड्ढा जी। जो आज मेरे सुपरवाइज़र हैं। जिन्होंने आज सुबह मुझसे कहा था, "जा सो जा, दिमाग़ थक जाता है।"
मैं सीधे उनके केबिन की तरफ़ गई। पर वहाँ कोई नहीं था। कुर्सी खाली थी। मेज़ पर चाय का कप रखा था, आधा भरा। और उसके नीचे एक रजिस्टर खुला था — पुराना, फटा हुआ।
मैंने उसे उठाया। उसमें पन्नों पर नाम काटे हुए थे। काटे हुए नहीं, मिटाए हुए। काली स्याही की मोटी लकीर। हर नाम के ऊपर एक तारीख।
पन्ना पलटा। "रामदीन — बारह जनवरी।" "निशा — छब्बीस मार्च।" "रीना — ग्यारह अगस्त।" और आख़िरी पन्ने पर, ताज़ा, अधूरा — "मीरा —"
मेरा नाम। आधा लिखा। जैसे अभी मिटाया जा रहा हो।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। केबिन का दरवाज़ा खुला था। बाहर कोरीडोर में रोशनी काँप रही थी। फिर स्थिर हो गई।
मैंने वह रजिस्टर अपनी जैकेट में छिपाया और बाहर आई। रास्ते में सुप्रिया मिली। "मीरा, चड्ढा जी ने कहा है, तू आज की ड्यूटी से पहले उनसे मिल ले। बोले, ज़रूरी बात है। मुझे लगता है वो तुझे अच्छी खबर देने वाले हैं — तेरी तनख्वाह बढ़ाने की बात है शायद।"
"कब?"
"शाम सात बजे।"
मैंने सिर हिलाया। पर अंदर से काँप रही थी। शाम सात बजे का इंतज़ार उस रजिस्टर के साथ — जिसमें मेरा नाम आधा कटा था।
मैं बाहर आई। बेंच पर रामदीन नहीं था। पर बेंच के नीचे कुछ चमक रहा था — एक पुरानी पीतल की कलम। उठाई। कलम से एक स्याही की बूँद मेरी उँगली पर गिरी। काली। ठंडी।
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