A Dark Secret – Chapter 317
"मैम।" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "कुछ आदमी आया था। बोला — शालिनी नायक का घर यही है क्या।"
मेरा हाथ कड़ा हो गया। "कौन आदमी?"
"बड़ा। मोटा। काली गाड़ी।" उसने कहा। "मैंने दरवाज़ा नहीं खोला। पर उसने नीचे लिफ़ाफ़ा डाल दिया।"
"क्या लिखा है उस पर?"
"कुछ नहीं। बस एक लाइन है — 'आज शाम कब्रिस्तान में तेरी माँ की बात होगी।'"
मैंने आँखें बंद कर लीं। भैरों।
"शालिनी," मैंने कहा, "दरवाज़ा बंद रख। मैं आ रही हूँ। किसी को मत खोलना, चाहे वो खुद को पुलिस कहे।"
"मैम, मैं उस कब्रिस्तान में जाऊँगी।" उसकी आवाज़ में ऐसी बात थी जो मैंने पहले नहीं सुनी थी। "अगर मेरी माँ की बात होगी, तो जाऊँगी।"
"तू घर पर रुकेगी।" मैंने कहा।
"मैम…"
"शालिनी।" मैंने कहा। "तेरा नाम काग़ज़ों से मिट रहा है। अगर तू कब्रिस्तान गई और वहाँ कुछ हो गया, तो मुझे किसे बताऊँगी? मुझे कोई याद भी नहीं रहेगा कि तू थी।"
वह रुकी। मैंने उसकी साँस सुनी।
"अच्छा," उसने कहा। "पर आप फोन मत काटना।"
"मैं काटूँगी नहीं," मैंने कहा। "तू लाइन पर रुक।"
उसने कपड़े की आवाज़ की। फिर चुप्पी।
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। "चाचा, यह शाम मैं अकेले जाऊँगी। पर आपको यह बताना होगा — जब वह काग़ज़ खोलूँ, तो क्या देखूँ?"
उसने अपना कप नीचे रखा। "तीन चीज़ें।" उसने कहा। "पहली — तारीख़। अगर तारीख़ आने वाले महीने की है, तो तेरे पास एक महीना है। अगर बीते हुए की है, तो नाम पहले से उठ रहा है।"
"दूसरी?"
"दूसरी — उस पर तेरा नाम किस स्याही से लिखा है। काली स्याही — पुरानी। नीली — नई। नीली का मतलब कोई अभी भी लिख रहा है।"
"तीसरी?"
वह रुका। उसने मेरी आँखों में देखा। "तीसरी — उस पर मेरा नाम है या नहीं।"
"आपका नाम?"
"चालीस साल पहले, मेरे हाथ से एक नाम बोला गया था।" उसने धीरे कहा। "मैंने उसे रोका नहीं। उसके बाद मैंने वह काग़ज़ छुआ था जिस पर वह नाम लिखा था।" वह खाँसा। "मेरा नाम भी किसी पन्ने पर है, मीरा। मुझे यक़ीन है। मुझे बस वह पन्ना नहीं मिलता।"
"तो वह काग़ज़ जो वह देगी —"
"हो सकता है उस पर मेरा नाम भी हो," उसने कहा। "और अगर है, तो तुझे उसका पूरा नाम पढ़ना होगा। ज़ोर से। वहाँ, कब्रिस्तान में। जो मेरे पास अब है ही नहीं।"
मेरी जेब में नोटबुक थी। उसमें मैंने कल रात लिखा था — "रामदीन कुमार जोशी। पीतल गली।"
"आपका पूरा नाम मेरे पास है," मैंने कहा। "मैं कल उसे ज़ोर से बोली थी। फोन पर। पीतल गली में।"
उसने सिर उठाया। उसकी आँखें भीगी थीं। "तू बोली थी?"
"हाँ। और आपने सुना था। आपने कहा था — 'लगता है मैं कहीं और रहता हूँ।'"
वह हँसा। बिना दाँत दिखाए। "तब मुझे याद आया था," उसने कहा। "कुछ देर के लिए। तेरे पीछे फिर चला गया।"
मैंने हाथ बढ़ाकर उसका कंधा पकड़ा। "चाचा, आज रात कब्रिस्तान आपको भी आना पड़ेगा।"
"मैं नहीं आ सकता।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं अस्पताल के गेट से आगे नहीं जा सकता," उसने कहा। "चालीस साल से।"
"यह भी उसी सौदे की वजह से है?"
"हाँ," उसने कहा। "और उसे तोड़ने का तरीक़ा मुझे नहीं पता। पर तुझे पता होगा।"
"कैसे?"
"क्योंकि तू पूछती है।" उसने मेरी नोटबुक की तरफ़ देखा। "जो लोग पूछते नहीं, वो भूल जाते हैं। जो पूछते हैं — वो याद रखते हैं।"
अब शाम के छह बजने में बीस मिनट थे। फोन पर शालिनी धीरे-धीरे साँस ले रही थी।
मैंने नोटबुक खोली और उस पन्ने पर, जहाँ रामदीन की उँगली से लिखा था "हरनाम हवेली, पुराना बाज़ार", नीचे एक लाइन जोड़ी —
"काग़ज़ पर तीन चीज़ें — तारीख़, स्याही का रंग, और रामदीन का नाम।"
फिर मैंने पेंसिल नीचे रख दी और शालिनी से बोली, "दरवाज़ा खोल। मैं पहुँच रही हूँ। हम साथ चलेंगे।"
उसकी आवाज़ रुँधी थी पर साफ़। "और रिया, मैम?"
मैंने स्कूल की तरफ़ देखा। खिड़की खाली थी।
"रिया अभी स्कूल में है।" मैंने कहा। "जब तक मैं उसे अपने हाथ से न लूँ, वह किसी और के हाथ नहीं लगेगी।"
मैं एम्बुलेंस की तरफ़ चली।
तभी रामदीन ने मेरी आवाज़ दी, "मीरा।" और मुड़ी।
"तीसरी चीज़ है।" मैंने कहा।
"नहीं।" उसने अपना हाथ बढ़ाया। "यह ले।" उसकी उँगली में एक छोटी सी पीतल की कलम थी — वही जो मुझे बेंच के नीचे से मिली थी, वही जो पुरानी काग़ज़ पर लगती है।
"मेरे पास है।"
"तो फिर मेरी जेब से यह ले।" उसने बड़ी टुकड़ी में कहा। "तेरे खून से लिखी है। आज शाम खोलना।"
मैंने लिया। एक छोटी पीली पुड़िया थी, जिस पर उसकी लिखाई थी — "मेरा नाम।" मैंने उसे एम्बुलेंस के डैशबोर्ड पर, रिया की तस्वीर के नीचे रख दिया।
"चाचा, मैं लौटकर आऊँगी।"
वह हँसा। "मैं यहीं रहता हूँ।"
मैंने गाड़ी स्टार्ट की। स्कूल पहुँचकर मैंने गाड़ी गेट पर रोकी। रिया सीढ़ियों से नीचे आ रही थी, बैग कंधे पर।
"शालिनी को लेने चलना है," मैंने कहा। "और फिर कब्रिस्तान।"
वह गाड़ी में बैठी। "माँ, वह औरत?"
"निशा वर्मा की माँ।"
रिया कुछ देर खिड़की से बाहर देखती रही। फिर बोली, "माँ, वो काग़ज़ जो वह देगी — उस पर मेरा नाम भी होगा?"
"शायद।"
"तो आप उसे पढ़िएगा मत।" वह मेरी तरफ़ मुड़ी। "फाड़ दीजिएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "रिया, कभी-कभी काग़ज़ फाड़ने से कुछ नहीं होता।"
"जैसे रजिस्टर?"
"जैसे रजिस्टर।"
वह चुप हो गई।
अंधेरा उतर रहा था। मैंने गाड़ी की बत्ती जलाई। शालिनी के घर के गली की तरफ़ मुड़ी। सड़क कच्ची थी, गड्ढों में पानी।
तभी मेरे फोन पर मेसेज आया। अनजान नंबर।
"कब्रिस्तान का पिछला गेट खुला है। सामने वाले पर कोई नहीं। ज़्यादा देर मत करना।"
मैंने उसे रिया को नहीं दिखाया। फोन जेब में रखा और गाड़ी तेज़ कर दी।
रिया ने धीरे से कहा, "माँ, वो आदमी जो शालिनी के घर आया था — भैरों।"
"हाँ।"
"वो आज कब्रिस्तान में होगा क्या?"
मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। "क्यों?"
"क्योंकि अगर वो होगा," उसने कहा, "तो आप काग़ज़ नहीं पढ़ पाओगी।"
मैं कुछ नहीं बोली। गाड़ी की लाइट सड़क पर सफ़ेद पट्टी बनाती जा रही थी और शालिनी के घर की गली मुँह बाए खड़ी थी।
॥
मैंने शालिनी की गली में गाड़ी रोकी और हॉर्न दो बार बजाया। दरवाज़ा खुला, वह बाहर आई — बैग कंधे पर, आँखें लाल, पर चेहरे पर वही ज़िद।
“मैम, मैं तैयार हूँ।”
“बैठ।”
वह पीछे बैठी। रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया। दोनों कुछ नहीं बोलीं। मैंने गाड़ी कब्रिस्तान की तरफ़ मोड़ी — पर तीन गलियाँ आगे जाकर मैंने अचानक ब्रेक मार दी।
“क्या हुआ?” रिया आगे झुकी।
“स्कूल की हाज़िरी।” मैंने गाड़ी वापस घुमाई। “शालिनी, तेरा नाम क्लास-रजिस्टर से हटा है। मुझे वह काग़ज़ अपने हाथ से देखना है।”
“पर छह बजने में —”
“दस मिनट लगेंगे।”
स्कूल के गेट पर चौकीदार ने रोका। मैंने अपना अस्पताल का कार्ड दिखाया और कहा कि रिया की तबीयत ठीक नहीं, उसका रिकॉर्ड चाहिए। वह अंदर गया और मिसेज़ देसाई को बुला लाया — रिया की क्लास-टीचर। चालीस के करीब, चश्मा गले में लटका, हाथ में रजिस्टर।
“क्या बात है, मीरा जी?”
“शालिनी नायक। कक्षा आठ बी। उसका नाम क्लास-रजिस्टर से कब हटा?”
उसने रजिस्टर खोला। पन्ना पलटा। उँगली चलाई। फिर ऊपर देखा।
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