A Dark Secret – Chapter 296
वो बैठ गया — पहली बेंच पर, ठीक बीच में, जहाँ से बोर्ड सबसे साफ़ दिखता था।
क्लास खत्म हुई तो हम बाहर आए। जुगनू मेरे पीछे-पीछे आया और बोला, "भाई, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अब मैं नाके पर गाड़ियाँ गिनने के पैसे ले सकता हूँ?"
मैं रुक गया।
"क्यों?"
"क्योंकि अब स्कूल की कॉपी का खर्चा भी तो है," उसने कहा, बड़े गंभीर चेहरे से। "और मैंने सुना है कि पेंसिल एक रुपये की आती है।"
नैना हँसी। कबीर हँसा। और मैं भी हँसा, उस तरह जब हँसी पेट से नहीं, आँखों के पास से निकलती है।
"ले सकता है," मैंने कहा। "पर एक शर्त पर।"
"क्या?"
"अब गिनती काग़ज़ पर लिखेगा।"
उसने अपना कार्टन वाला काग़ज़ निकाला और उसकी पीठ पर एक कोना छोड़कर बोला, "यहाँ लिखूँगा।"
अस्पताल तीन गली छोड़कर था।
ये अस्पताल बड़ा नहीं था। एक कमरा, एक कुर्सी, एक डॉक्टर जो हफ़्ते में तीन दिन आते थे, और एक दादी जो बाक़ी चार दिन मरीज़ों की नब्ज़ देखती थीं और उन्हें एक ही दवा देती थीं — आराम।
मैंने दरवाज़े पर बोर्ड देखा। छोटा बोर्ड था। लिखा था — रघुवीर चिकित्सा केंद्र।
कबीर ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"तेरे पापा डॉक्टर नहीं थे," उसने कहा।
"नहीं थे," मैंने कहा। "पर जब हमारे क़स्बे में किसी की टांग टूटती थी, तो लोग उनके पास आते थे। और वो गाड़ी से शहर ले जाते थे, रात हो या बरसात। एक बार उन्होंने ऐसे ही एक आदमी का सारा खर्चा दिया था और बदले में एक चीज़ ली थी — कि वो अपने बेटे को स्कूल भेजे।"
नैना ने कैमरा नीचे किया।
"अर्जुन," उसने कहा, "मुझे एक इंटरव्यू चाहिए।"
"अभी?"
"अभी नहीं।" उसने कैमरा बैग में रखा। "जब मामला पूरा बंद हो जाए। और उसमें तू खुद बताएगा कि क्या हुआ। जो तूने किया, वो नहीं। जो तेरे साथ हुआ, वो।"
मैंने उसे देखा।
"तुझे लगता है कोई सुनेगा?"
"तीन सौ लोग अदालत के बाहर खड़े थे," उसने कहा। "एक सौ अड़तालीस नाम जुगनू के पास हैं। कोई न कोई सुनेगा।"
तभी मेरा फ़ोन बजा।
अम्मा थीं।
"अर्जुन!" उनकी आवाज़ में वो हमेशा वाली डाँट थी, पर आज उसमें कुछ और भी था। "खाना खाया कि नहीं?"
"अम्मा, अभी सुबह है।"
"सुबह में भी खाया जाता है।" फिर वो रुकीं। "एक बात है।"
"बोल।"
"वो जो औज़ार वाली अलमारी है ना, आँगन की।"
मेरा हाथ रुक गया।
"हाँ।"
"उसके ऊपर एक डिब्बा रखा है।" उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "तेरे पापा ने आख़िरी रात दिया था। कहा था, लौटूँ तो जला देना। नहीं लौटूँ तो किसी को मत देना।"
"अम्मा—"
"मैंने दस साल उसे नहीं छुआ," उन्होंने कहा। "ना जलाया, ना खोला।"
"फिर अब क्यों?"
वो चुप रहीं। बहुत देर तक। इतनी देर कि मुझे लगा लाइन कट गई।
"क्योंकि कल रात मैंने सपना देखा," उन्होंने कहा। "तेरे पापा आए और बोले कि अब वो डिब्बा तेरे हाथ में है, मेरे हाथ में नहीं।" उन्होंने साँस ली। "मैंने आज सुबह वो डिब्बा नीचे उतार लिया। चटाई के नीचे से निकाला। और अर्जुन, मैंने उसे खोला नहीं। उसे तू खोलेगा। तू आज आ जा।"
मैंने कबीर की तरफ़ देखा। फिर नैना की तरफ़।
"आ रहा हूँ," मैंने कहा।
सिमरिया की गाड़ी शाम छह बजे थी। वो बासी टिन की आवाज़ वाली गाड़ी, जिसका ड्राइवर बूढ़ा था और जो हर शाम एक बार जाती थी।
मैं उस पर चढ़ गया। साथ में नैना थी। कबीर पीछे रहा, क्योंकि उसकी अम्मा की तबीयत उस दिन ठीक नहीं थी और वो उसके पास जाना चाहता था।
रास्ते में मैंने नैना से कहा, "तू मेरे साथ क्यों आ रही है?"
"क्योंकि तेरे पास एक डिब्बा है," उसने कहा, "और तेरे पापा ने कहा था कि उसे सुनने वाला अकेले न सुने।"
मैंने उसे देखा।
"मैंने तुझे ये नहीं बताया था।"
"नहीं बताया," उसने कहा। "पर जिस दिन तूने मुझे रिकॉर्डर की बात बताई थी, उस दिन तेरी आवाज़ काँप रही थी। और मैंने सोच लिया था कि जिस चीज़ से तेरी आवाज़ काँपती है, वो अकेले नहीं सुनी जाती।"
रात दस बजे हम सिमरिया पहुँचे।
अम्मा आँगन में खड़ी थीं। उनके हाथ में लालटेन थी। उनके पीछे, चटाई पर, एक पुराना डिब्बा रखा था — लकड़ी का, कोनों से घिसा हुआ, ऊपर से धूल पोंछी हुई, जैसे अभी-अभी उसे साफ़ किया गया हो।
"अंदर आ," अम्मा ने कहा। "पर पहले चाय पी।"
मैं हँस पड़ा।
"अम्मा, अभी—"
"चाय पहले," उन्होंने दोहराया, "डिब्बा बाद में। डिब्बा भागेगा नहीं, दस साल से खड़ा है।"
इसलिए हमने चाय पी। अम्मा ने नैना को भी दी और बिना पूछे उसमें अदरक डाल दी, क्योंकि अम्मा को लगा कि पतली लड़की है, सर्दी लगेगी। नैना ने कुछ नहीं कहा। उसने पूरा गिलास पी लिया, भले ही उसे अदरक पसंद नहीं थी।
फिर मैं डिब्बे के पास गया।
ढक्कन कसा हुआ था। मैंने उसे खोला।
अंदर सबसे ऊपर एक पुराना कपड़ा था, जिसका रंग अब पहचाना नहीं जाता था। मैंने उसे हटाया।
उसके नीचे एक टेप रिकॉर्डर था।
वो वही रिकॉर्डर था जिसे मैं छत के कमरे में खोजता रह गया था। काला-भूरा, सामने स्पीकर की जाली, ऊपर घिसे हुए चार बटन, बैटरी का ढक्कन गायब। उसके अंदर एक टेप लगी थी, और टेप के पीछे एक पीला लेबल चिपका था।
मैंने लेबल को लालटेन के पास किया।
उस पर हरी स्याही में लिखा था, पापा की लिखाई में, छोटे साफ़ अक्षरों में — "अर्जुन, जब ये सुनना, तब मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
मेरा हाथ काँपने लगा।
अम्मा ने मेरी तरफ़ देखा।
"दबा दे," उन्होंने कहा।
"अम्मा, तू रहना चाहेगी?"
"मैं बाहर बैठती हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने उनकी आवाज़ दस साल से नहीं सुनी। मुझे सुनने की हिम्मत नहीं।" वो रुकीं। "पर तू सुन। तू सुनने वाला है। यही तेरा काम है।"
वो बाहर चली गईं।
नैना दरवाज़े पर खड़ी रही।
मैंने रिकॉर्डर उठाया। पुरानी थी, भारी थी, और उसकी प्लास्टिक की महक में कुछ ऐसा था जो मुझे बचपन में ले गया — जब पापा रात में बैठकर रिकॉर्डर पर पुराने गाने सुनते थे और अम्मा कहती थीं कि आवाज़ धीमी करो, बच्चा सो रहा है।
मैंने बटन दबाया।
टेप घूमी। और भर्र-भर्र की आवाज़ के बाद, कमरे में एक आवाज़ आई।
"बेटा, अब तू सुन।"
मेरी आँखों में पानी आ गया।
वो पापा की आवाज़ थी। मैं उसे बचपन से जानता था — उसमें हल्की खरोंच थी, जैसे बहुत बोलने से घिस गई हो। वो हमेशा धीमी बोलते थे, और जब गुस्सा करते थे तो और भी धीमी।
"मुझे नहीं पता तू ये कब सुनेगा," पापा ने कहा। "हो सकता है सालों बाद। हो सकता है मैं तब तक तेरे साथ ना हूँ। इसलिए मैं सब कुछ बता रहा हूँ, जितना जानता हूँ, और जितना नहीं जानता, वो भी।"
टेप में एक आवाज़ आई — कुर्सी खींचने की। पापा बैठ गए थे।
"आज सत्ताईस सितंबर है," पापा ने कहा। "रात के ग्यारह बजकर चालीस मिनट हुए हैं। मैं अभी गोदाम से लौटा हूँ। और मैंने वहाँ कुछ देखा है जो मुझे देखना नहीं चाहिए था।"
मैंने साँस रोक ली।
"मैंने सुना है कि उस गोदाम में दवा की खेप बदली जाती है। पर आज मैंने सुना कि उनके पास बैठकर कौन बोल रहा था। चार आदमी थे। देवेंद्र ठाकुर थे। मंसूर अली था। एक और आदमी था जिसका नाम मुझे नहीं पता, पर वो काग़ज़ संभाल रहा था।"
वो रुके।
"और चौथा आदमी था।"
टेप में एक आवाज़ आई — कुछ गिरने की, फिर पापा का हाथ कुछ उठाने की आवाज़।
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