A Dark Secret – Chapter 297
"चौथा आदमी बोला नहीं। वो सिर्फ़ बैठा था और सब सुन रहा था। और जब बाक़ी तीनों चले गए, तब वो खड़ा हुआ।"
मेरा हाथ रिकॉर्डर पर जम गया।
"उसने एक ही बात कही," पापा ने कहा। "उसने कहा — 'ये खेप अब रास्ते में गुम हो जाएगी, और जो गुम होगा उसे कोई नहीं ढूँढेगा।' बस इतना कहा। फिर वो हँसा और बोला, 'भाई साहब, आपके पास जो आदमी हैं, वो अच्छे हैं। पर याद रखिए, अच्छे आदमी भी एक दिन बुरे काम करते हैं।'"
टेप में एक लंबा सन्नाटा आया।
"अर्जुन," पापा ने कहा, "मैं उसकी आवाज़ जानता हूँ। पर मैंने उसे कहीं लिखा नहीं। क्योंकि अगर मैं नाम लिखता और वो काग़ज़ किसी के हाथ लग जाता, तो तेरी अम्मा और तू दोनों खत्म हो जाते। इसलिए मैंने उसका नाम नहीं लिखा।"
मेरी आँखें फट गईं।
"और अब तू सुन," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ थोड़ी रुकी, "क्योंकि यही वो चीज़ है जो मैं तुझे देकर जा रहा हूँ।"
मैंने साँस ली। नैना ने पीछे से कुछ कहा पर मैंने सुना नहीं।
"उस आदमी की आवाज़ बहुत धीमी है," पापा ने कहा। "इतनी धीमी कि तुझे लगेगा कि वो बूढ़ा है और थका हुआ है। पर वो थका हुआ नहीं है। वो धीमा इसलिए बोलता है क्योंकि उसे अपनी हर बात सुनने की आदत है।"
पापा रुके।
"और एक आवाज़ है उसमें," उन्होंने कहा, "जो मैंने कहीं और सुनी थी। पुरानी। बहुत पुरानी। मुझे याद नहीं कहाँ। पर मैं उसे भूला नहीं हूँ। उसमें एक शब्द है — 'बेटा'। वो किसी को बेटा बुलाता है तो आवाज़ में कुछ बदलता है। जैसे उसे बोलने में मज़ा आता है।"
मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया।
"उसे कभी भूलना मत," पापा ने कहा। "क्योंकि मैं नहीं जानता कि मैं कल घर लौटूँगा या नहीं। और अगर नहीं लौटा, तो तू उसे उसकी आवाज़ से पकड़ेगा। तेरे कान हैं। भगवान ने तुझे वही दिया है जो मुझे दिया था।"
टेप में एक आवाज़ आई — दरवाज़े की।
अम्मा की आवाज़ दूर से — "रघुवीर, किससे बात कर रहे हो?"
पापा की आवाज़, जल्दी में — "किसी से नहीं, कमला। काग़ज़ देख रहा हूँ।"
फिर एक हल्की आवाज़ — जैसे रिकॉर्डर दबाया गया हो।
और टेप खत्म।
रिकॉर्डर में सन्नाटा।
मैं वहीं बैठा रहा। मेरे हाथ रिकॉर्डर पर थे और मेरी आँखों से पानी बह रहा था, बिना आवाज़, बिना सिसकी, बस बह रहा था।
नैना अंदर आई। वो मेरे पास बैठ गई।
कुछ देर बाद मैंने कहा, "उसने नाम नहीं लिखा।"
"हाँ।"
"लेकिन आवाज़ छोड़ गए।" मैंने रिकॉर्डर की तरफ़ देखा। "पूरी ज़िंदगी मैंने गाड़ियों की आवाज़ पकड़ी। और पापा ने आख़िरी रात एक आदमी की आवाज़ पकड़ी और उसे मेरे लिए रख दिया।"
नैना ने कुछ नहीं कहा।
मैंने रिकॉर्डर उठाया और पलटकर देखा। उसके नीचे एक और चीज़ थी। एक छोटी सिली पर्ची, पापा की हरी स्याही में।
मैंने उसे लालटेन के पास किया और पढ़ा।
"अर्जुन, वो चौथा आदमी जो उस रात गोदाम में था, उसका नाम मैंने कहीं नहीं लिखा। पर उसकी आवाज़ मेरे कान में है। और अब तेरे कान में है। बंद कर आँखें। सुन। तू पहचान जाएगा।"
मैंने पर्ची को मोड़ा और जेब में रखा।
फिर मैंने आँखें बंद कीं।
और मैंने वो टेप एक बार फिर चलाई।
दूसरी बार मैंने सिर्फ़ चौथे आदमी की आवाज़ नहीं सुनी। मैंने वो सब सुना जो मैंने पहली बार में नहीं सुना था — जूते की आवाज़, कुर्सी का घिसना, और वो आवाज़ जो चौथे आदमी ने सबसे पहले निकाली थी, कुछ कहने से पहले — गले में एक हल्की खरखर, जैसे किसी ने बहुत साल पहले गला दबाया हो और वो खरखर आज तक चली आ रही हो।
और मैंने सुना — वो आदमी बोलते वक़्त एक लंबी साँस लेता है। हर वाक्य से पहले। जैसे हर शब्द उधार का हो और उसे लौटाना पड़ेगा।
मेरी आँखें खुल गईं।
मैं उसी तरह बोलता हुआ एक आदमी जानता हूँ।
मैंने आँखें बंद करके उसे याद किया — वो शादी, पंद्रह साल पहले, जिसका ज़िक्र शांति देवी ने किया था। वो मीठा हाथ। वो बहुत देर तक न छोड़ा गया हाथ। और वो एक ही बात — "आपकी बीवी का नाम बहुत अच्छा है।"
और मैंने सुना — वो आदमी "बेटा" बोलता है। हर किसी को। और बोलते वक़्त उसकी आवाज़ में एक हल्की खरखर है।
मैंने आँखें खोलीं।
"नैना," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ उल्टी धीमी हो गई थी।
"हाँ?"
"वो कार्ड। जो राठौर लॉजिस्टिक्स के उद्घाटन का था। जो तू लाई थी। उस पर किसी ने हमसे बात की थी?"
नैना ने सोचा।
"बहुत से लोग थे।"
"कोई ऐसा था जिसने तुझे बेटा कहा?"
वो रुकी।
"हर किसी ने नहीं कहा," उसने कहा। "एक आदमी ने कहा था। सफ़ेद बाल, महँगा चश्मा। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा था — बेटा, कलम अच्छी चलाती हो, पर ध्यान रखना, कलम से ज़्यादा दिमाग़ चलता है।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"उसकी आवाज़ कैसी थी?"
नैना ने मेरी आँखों में देखा। और उसका चेहरा पहली बार ऐसा हुआ जैसे उसे याद आ रहा हो, बहुत दूर से।
"धीमी," उसने कहा। "बहुत धीमी।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
और मैंने देखा कि नैना का हाथ अपने बैग पर गया। उसने उसे खोला। उसमें काग़ज़ों के नीचे से एक चीज़ निकाली — एक क्रीम रंग का कार्ड।
"ये मैंने फेंका नहीं था," उसने कहा। "क्योंकि उस पर भी वही नीला गोल निशान था।"
उसने कार्ड मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने उसे उलटा किया।
कार्ड के पीछे, नीले गोल निशान के नीचे, हाथ से लिखा था एक नाम। छोटे, साफ़, धीमे अक्षरों में, जैसे लिखते वक़्त लिखने वाले ने हर अक्षर सोचकर लिखा हो।
मैंने उसे पढ़ा।
और मेरा खून जम गया।
क्योंकि वो नाम मैंने पहले सुना था। बहुत पहले। उस दिन, अदालत में, जब एक आदमी ने अपना पहला बयान दिया था और तिवारी ने अपनी फाइल उठाई थी। वो नाम उन काग़ज़ों में था जो मैंने पढ़े ही नहीं थे, क्योंकि मैंने सोचा था कि वो सिर्फ़ एक मामूली हस्ताक्षर है।
और अब वो नाम मेरे हाथ में था।
बाहर आँगन में अम्मा ने लालटेन नीचे रखी और आवाज़ दी, "अर्जुन, चाय ठंडी हो रही है।"
मैंने कार्ड जेब में रखा।
"आ रहा हूँ, अम्मा," मैंने कहा।
पर मैं वहीं खड़ा रहा।
क्योंकि मुझे पता था कि अब आगे जो आने वाला है, वो किसी अदालत में नहीं होगा। वो उस आदमी के सामने होगा जिसने खुद को कभी किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा, पर हर काग़ज़ के नीचे उसका हाथ है।
मैंने रिकॉर्डर बंद किया और उसे सीने से लगाया।
"पापा," मैंने धीरे से कहा, "अब मैंने उसे सुन लिया।"
और ऐसा लगा कि कमरे में कहीं, बहुत दूर, कोई हँसा।
॥
सुबह चार बजे।
मैं बूढ़े शेर की छत पर बैठा हूँ। छत कहना ठीक नहीं, ट्रक की छत कहना चाहिए — वो लोहे की पट्टी, जिस पर पीला रंग अब तीन जगह से उतर गया है और जिसके बीच में एक गड्ढा है। उसी गड्ढे में मैंने अपनी पुरानी बनियान बिछा दी है। बनियान अब भी तेल और डीज़ल की महक देती है। मुझे वही महक सबसे ज़्यादा पसंद है। उसमें कुछ ऐसा है जो कहता है — ये गाड़ी मेरी है।
नीचे सड़क पर अभी पूरी रोशनी नहीं खुली। दूर, टोल की तरफ़, बत्तियाँ जल रही हैं और कोहरे में पीली पड़ गई हैं। सुबह की हवा अभी ठंडी है, हल्की सी गीली, और उसमें मिट्टी की महक है — जैसे रात में कहीं बरसात हुई हो और सुबह होते-होते थक गई हो।
मैंने अपनी बाईं कलाई देखी।
पापा की घड़ी।
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