A Dark Secret – Chapter 29
"मैं तुमसे एक बात कहने के लिए फ़ोन कर रही हूँ," वो बोली। उसकी आवाज़ में काँप नहीं थी। भूख नहीं थी। एक तरह की थकान थी, जैसे वो बहुत देर से ये फ़ोन करने की हिम्मत जुटा रही हो। "आज सुबह दस बजे, बाईस नंबर टोल के पीछे वाले कमरे में, तुमसे जो पूछा जाए, वो सब पहले से तय है। तुम्हारे जवाबों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।"
मेरी छाती में कुछ सिकुड़ गया।
"तुम क्या कह रही हो?"
"मैं कह रही हूँ कि देवा तुम्हें वहाँ बुलाकर कुछ देने नहीं वाला," उसने कहा। "वो तुम्हें वहाँ ले जाकर देखेगा कि तुम्हें कितना पता है। और अगर वो सोचेगा कि तुम्हें ज़रूरत से ज़्यादा पता है, तो…"
वो रुक गई।
"तो क्या?" मैंने पूछा।
"तो तुम उस कमरे से बाहर नहीं आओगे," उसने कहा। "जैसे मेरे पति नहीं आए।"
फ़ोन कट गया।
मैं वहीं खड़ा रहा, ट्रक के बगल में, और मेरे हाथ में फ़ोन था जो अब चुप था। सड़क के दूसरी तरफ़ एक स्ट्रीट लाइट बुझ गई और फिर जल गई।
"औरत कौन थी?" मैंने अपने आप से पूछा।
मुझे जवाब नहीं पता था।
पर मेरे कान ने वो पहले ही बता दिया था जो कोई नहीं बता सकता था — वो औरत डर नहीं रही थी। वो औरत गुस्से में थी। और उसका गुस्सा उस चीज़ की तरफ़ था जो उसने खोई थी।
मैंने ट्रक की छत पर बैठ गया।
आसमान अब लाल हो रहा था। सामने कबाड़ के पहाड़ पर एक कौआ बैठा था और मुझे देख रहा था। मैंने उससे कोई बात नहीं की।
मेरे दिमाग़ में सिर्फ़ एक बात चल रही थी — वो औरत। उसने कहा कि उसके पति नहीं आए। जैसे मेरे पापा नहीं आए।
"किसके पति?" मैंने ज़ोर से पूछा।
कौए ने जवाब नहीं दिया। उसने अपने पंख फड़फड़ाए और उड़ गया।
तभी मेरे कान में आवाज़ आई। दूर से। बाज़ार के दूसरे छोर से। कोई औज़ार किसी धातु पर गिरा था।
और फिर एक और आवाज़। फिर एक और।
किसी ने किसी दरवाज़े पर ताला खोला हो, या किसी ने किसी ट्रक का बोनट उठाया हो।
मैं ट्रक की छत से उतर आया।
मेरी आँखें लाल थीं, हाथ काँप रहे थे और पूरी रात की थकान अब एक साथ पीठ पर आ रही थी। पर मेरी हर इंद्रि जाग गई थी। कोई यहाँ था। बाज़ार में सुबह से पहले कोई आया था।
मैं दीवार की तरफ़ बढ़ा, जिसके पीछे से आवाज़ आ रही थी।
पर मैंने तीन कदम चलकर रुक गया। क्योंकि मुझे कुछ और सुनाई दिया।
एक चमकती हुई, धातुओं वाली आवाज़। ठक। ठक। ठक।
जैसे कोई चलता-चलता चाकू या तार काटने वाला औज़ार जेब में खटखटा रहा हो।
मैंने पहचान लिया।
वो कालू के पुराने लाल प्लायर की आवाज़ थी।
और वो आवाज़ धीरे-धीरे दूर जा रही थी।
॥
मैं दीवार के पास खड़ा रह गया और साँस रोक ली।
ठक। ठक। ठक।
आवाज़ धीमी पड़ रही थी। जैसे कोई चलता हो और हर क़दम पर जेब में पड़ा लोहा बोल उठे। फिर एक मोड़, फिर आवाज़ की दिशा बदल गई। फिर सब चुप।
मैंने उँगलियाँ मुट्ठी में दबा लीं। मेरा मन कह रहा था, दौड़। तीन क़दम में पकड़ ले। पर पैर नहीं उठे।
क्योंकि मुझे याद आया, कालू वो आदमी है जो पहले डराता है। और जो पहले डराता है, वो कभी अकेला नहीं आता। अगर वो मुझे दौड़ते देख ले, तो मुझे कभी पता ही नहीं चलेगा कि वो किसके साथ खड़ा था।
मैं दीवार से चिपका रहा। पीछे कबाड़ के पहाड़ थे, सामने ट्रकों की लंबी कतार, बीच में सूखी धूल जिस पर भोर की ओस गिर रही थी। दूर, बाईस नंबर टोल की तरफ़ से कोई ट्रक गुज़रा और उसका हॉर्न पूरे बाज़ार में फैल गया। फिर सन्नाटा।
मैं दीवार के मोड़ तक गया। वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ़ एक लोहे का ड्रम उलटा पड़ा था, और उसके ऊपर एक स्टील का गिलास रखा था। मैंने गिलास उठाया। नीचे से गर्म। हल्का-सा चाय का दाग़। और धूल पर एक पैर का निशान — चप्पल का, दाहिनी तरफ़ का, एड़ी की तरफ़ ज़्यादा दबा हुआ।
यानी वो आदमी यहाँ खड़ा था। काफ़ी देर खड़ा था। चाय पी रहा था और मुझे देख रहा था।
मैंने गिलास वापस ड्रम पर उलटा रख दिया, ठीक जैसे था। जैसे मैंने कुछ देखा ही नहीं।
और मैंने घड़ी देखी। मेरी घड़ी में पाँच बजकर दस थे। पर मेरी घड़ी हमेशा पाँच मिनट आगे चलती है, पापा की आदत थी, कहते थे — जल्दी चलने वाली घड़ी वाला आदमी कभी ट्रेन नहीं छूटता। यानी असल में पाँच ही बजे थे।
मैं ट्रक के पास लौट आया। छत पर बैठ गया। सोचा — अगर वो मुझे देखने आया था, तो देखकर गया क्या? मैं कल रात से यहीं हूँ। मैंने क्या किया? मैंने ट्रक खोला, बैटरी निकाली, केबल छुई, हाथ मैला किया। बस।
तो वो ये देखने आया था कि मैं कितना जानता हूँ।
मैं हँसा। बिना आवाज़ के। क्योंकि मैं खुद नहीं जानता था कि मैं कितना जानता हूँ।
सुबह छह बजे कबीर आया।
मैंने उसे आवाज़ से पहले पहचान लिया। उसकी चप्पल की आवाज़ अलग है — बाईं तरफ़ की चप्पल थोड़ी ज़्यादा घिसी है, तो चलने में एक हल्की ऊँच-नीच होती है। फिर चाबियों की छनक, फिर टिन के शटर को उठाने वाली वो कर्कश चरमराहट जो पूरे बाज़ार को जगा देती है।
शटर उठा तो अंदर से रबर, तेल और ठंडी धूल की गंध निकली।
"उठ गया?" कबीर ने कहा। "या सोया ही नहीं?"
"दोनों," मैंने कहा।
उसने मुझे घूरा। फिर अपनी जेब से कैलकुलेटर निकाला, काउंटर पर रखा, और दो पेन — एक नीला, एक काला — सीधे करके रख दिए। जैसे उसकी दुनिया में सब कुछ अपनी जगह पर होना चाहिए, वरना हिसाब गड़बड़ा जाता है।
"चाय?" उसने पूछा।
"पीछे वाले ड्रम पर एक गिलास रखा है," मैंने कहा। "आधा भरा। किसी का छूटा हुआ।"
कबीर रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर बिना कुछ कहे अंदर गया और स्टोव जला।
चाय बनते वक़्त मैंने कहा, "इस बाज़ार में सुबह चार बजे कौन आता है?"
"कबाड़ी," उसने कहा। "चोर। और वो जिन्हें नींद नहीं आती।"
"और कालू?"
उसका हाथ स्टोव पर रुक गया। एक पल। फिर चाय की पत्ती डाली।
"कालू इस बाज़ार में नहीं आता," उसने कहा। "कालू बुलाया जाता है।"
मैंने चाय ली और काउंटर के सहारे खड़ा हो गया।
अब वो बात। जो मैं सुबह से पकाए बैठा था।
"कबीर भाई," मैंने कहा। "वो आधा-आधा काग़ज़। जो तुमने कल रात दिया।"
"हाँ।"
"उस पर नीचे एक नाम मिटा हुआ है। पुराना छपा हुआ नाम, ऊपर से किसी ने कुछ लगाकर मिटाया है। स्याही से नहीं, ज़रूरत से ज़्यादा मेहनत से। जैसे कोई नाम उखाड़ा गया हो।"
कबीर ने चाय का गिलास उठाया। एक घूँट लिया। फिर काउंटर पर रख दिया। और उसके चेहरे पर कुछ हुआ। बहुत थोड़ी देर के लिए। जैसे किसी ने दीवार पर एक दरवाज़ा खोला और तुरंत बंद कर दिया। उसकी आँखें एक पल के लिए उस काग़ज़ की तरफ़ गईं, फिर उसके पीछे अलमारी की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।
"पुराना काग़ज़ है," उसने कहा। "दुकान के पुराने मालिक के ज़माने का। किसी और का था।"
"किसी और का मतलब?"
"मतलब किसी और का।" उसने कंधे उचकाए। "भाई, दुकान चालीस साल पुरानी है। इसमें से कितने काग़ज़ निकलते हैं, कितने फटते हैं, कितनों पर कोई नाम छपा होता है और किसी और का होता है। हर काग़ज़ का हिसाब रखेगा तो दुकान नहीं चलेगी, हिसाब चलेगा।"
"तो उसपर से नाम मिटाने की ज़रूरत क्या थी?"
"मुझे क्या पता," उसने कहा, और आवाज़ ज़रा ऊँची हो गई। "मैंने नहीं मिटाया। मुझे मिला तो ऐसा ही मिला।"
और फिर उसने बात काट दी। "अब सुन, साइन करना है या नहीं? मुझे दस बजे एक ड्राइवर आना है, उसका हिसाब बाक़ी है।"
मैंने उसकी आवाज़ सुनी। उस आवाज़ में वो हल्की कंपन थी जो मैं बहुत बार पकड़ता हूँ। पर मैंने खुद को रोका। क्योंकि एक बात मैंने अपनी ज़िंदगी में सीखी है — झूठ बोलते वक़्त आदमी काँपता है, और डरते वक़्त भी। फ़र्क़ ये है कि झूठ में आवाज़ ऊपर जाती है, डर में नीचे। कबीर की आवाज़ नीचे गई थी।
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