A Dark Secret – Chapter 28
"किसे बताता?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं यहाँ नया था। मेरे पास दुकान थी, किराया था, और एक बीमार अम्मा थीं। बताता तो अगले दिन दुकान बंद हो जाती।"
वो बोलकर रुका। फिर धीरे से बोला, "पर एक बात थी जो मैंने किसी को नहीं बताई। उन काग़ज़ों में एक रसीद थी। जिस पर लिखा था — मोती।"
मेरा कटोरा मेरे हाथ में रुक गया।
"मोती?" मैंने कहा।
"हाँ। बल्लू का ट्रक। मोती। पर ये रसीद दो साल पुरानी थी। और उस पर लिखा था — मरम्मत के लिए। मतलब उस ट्रक को यहीं लाया गया था। गाड़ी महल में।"
"किसने लाया?"
"रसीद पर दस्तख़त थे। एक अधूरा नाम था। शुरू के तीन अक्षर। जैसे कोई जल्दी में लिखकर चला गया हो।"
"क्या नाम था?"
वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने बहुत धीरे से कहा, "रघु।"
मेरे हाथ से चाय का कटोरा मेरे घुटनों पर झुक गया। गरम चाय मेरी पैंट पर गिरी। मैंने उसे साफ़ नहीं किया। मैं बस उसे देखता रहा।
"तूने ये बात मुझसे अब तक क्यों नहीं कही?" मैंने पूछा।
"क्योंकि जब तू आया, मुझे नहीं पता था कि तू कौन है," उसने कहा। "मुझे लगा तू बस एक नया लड़का है जो सस्ता ट्रक ढूँढ रहा है। फिर तूने वो ट्रक देखा और कहा — मैं इसे ज़िंदा करूँगा। और मैंने तेरे हाथ देखे। मुझे पता चल गया कि तू किसी और का लड़का नहीं है। तू उसी का लड़का है।"
"फिर भी तूने ये नहीं बताया?"
"मैंने तुझे देखा और मैं डर गया," उसने कहा। "क्योंकि तेरे पास वो काग़ज़ आया और तूने उस पर दस्तख़त कर दिए, बिना ये पूछे कि नीचे किसका नाम है। तू वैसा ही है जैसा वो था। बिना पूछे हस्ताक्षर करने वाला।"
वो बोलकर रुका। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें अब भी चाय के कटोरे पर टिकी थीं।
"कबीर," मैंने कहा। "मैं उसी का लड़का हूँ। और मैं यहाँ इसीलिए आया हूँ। अब तू मुझे बता — उस रसीद पर और क्या लिखा था?"
"तारीख़," उसने कहा। "सताईस तारीख़। कोई महीना नहीं, बस सताईस।"
मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
मेरे पास चाचा के घर के उस औज़ार बैग में मिले कटे तार के रुमाल में लिपटा एक काग़ज़ था — नहीं, काग़ज़ नहीं, एक रसीद। पीले ट्रक के काले लोहे के डिब्बे से मिली रसीद। जिस पर लिखा था — सताईस सितंबर। दस साल पुरानी। और उस पर मेरे पापा के हस्ताक्षर थे।
और अब कबीर कह रहा था कि दो साल पहले, इसी बाज़ार में, मोती की मरम्मत की एक रसीद पर भी सताईस तारीख़ थी।
मैं उठ खड़ा हुआ।
"मुझे वो रसीद चाहिए," मैंने कहा।
"वो मेरे पास नहीं है," उसने कहा। "मैंने उसे जला दिया था। उसी रात। जब मुझे समझ आया कि मैंने क्या देखा है।"
"तूने जला दिया?"
"हाँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं डर गया था," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में झूठ नहीं था। "और आज मुझे लग रहा है कि उस रसीद को जलाना मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती थी।"
हम दोनों चुप हो गए।
आसमान का नीला रंग अब हल्का हो रहा था। कहीं दूर एक मुर्गा बोला, फिर दूसरा। ट्रांसपोर्ट नगरी में सुबह इसी तरह आती थी — पहले मुर्गे, फिर ट्रकों की पहली आवाज़, फिर सब शोर में बदल जाता।
मैंने कटोरा नीचे रख दिया।
"कबीर," मैंने कहा। "अब एक आख़िरी बात। तूने जब मुझे वो काग़ज़ दिया, तो तूने कहा — ऊपर जो लिखा है वो हिसाब है, नीचे जो पुराना नाम है वो तेरा नहीं है। तूने कहा कि तूने वो नाम नहीं मिटाया।"
"हाँ, मैंने नहीं मिटाया।"
"तो फिर वो नाम क्या था?"
कबीर ने अपना सिर नीचे किया। उसने बहुत धीरे, बहुत धीरे, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "मुझे नाम नहीं पता। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि वो नाम किसी और काग़ज़ पर, किसी और रसीद पर, कहीं और लिखा हुआ है। और जब तक वो नाम उस काग़ज़ पर लिखा रहेगा, तब तक ये शहर वैसा ही रहेगा। मरा हुआ, पर चलता हुआ।"
"मुझे वो काग़ज़ चाहिए।"
"वो तेरे पास है," उसने कहा। "तेरे पापा के ट्रक में। काले लोहे के डिब्बे में। तूने उसे देखा है और तुझे पता नहीं कि तूने क्या देखा है।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
काला लोहे का डिब्बा। उसमें रसीद थी, डायरी थी, और एक पतली सी लिपटी हुई पर्ची थी जिसे मैंने रसीद समझकर छोड़ दिया था, क्योंकि उस वक़्त मुझे डर था कि कालू वहीं खड़ा था।
"कबीर," मैंने कहा। "तूने उस डिब्बे में देखा है?"
वो उठ खड़ा हुआ। उसने अपना कटोरा उठाया और ट्रक की तरफ़ चल दिया, फिर रुककर बोला, "देखा था। दो साल पहले। जब वो ट्रक यहाँ आया था। और मैंने वो डिब्बा नहीं खोला। मैंने उसे वैसे ही छोड़ दिया।"
"क्यों?"
कबीर ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैं एक ऐसा सवाल पूछ रहा हूँ जिसका जवाब उसे खुद नहीं पता।
"क्योंकि उस डिब्बे पर एक ताले का निशान था," उसने कहा। "और उस निशान को मैंने उस आदमी की जेब में देखा था, जो ट्रक छोड़कर गया था।"
फिर वो चुप हो गया।
उसने अपना हाथ ट्रक पर रखा, उसी जगह जहाँ मैंने रात भर काम किया था। "अर्जुन। तूने इसे चला दिया। ये पहले नहीं था। ये ट्रक सालों से खड़ा था और कोई इसे चला नहीं पाया। तू पहला आदमी है जिसने इसे ज़िंदा किया। अब मैं तुझे एक ही सलाह दे सकता हूँ।"
"क्या?"
"आज दस बजे उस कमरे में मत जा। तेरे पास ट्रक है। तेरे पास काम है। तू अपना काम कर, पैसा कमा, और ये जगह छोड़कर कहीं और जा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर मैं हँसा। एक छोटी सी हँसी, जो ज़्यादा देर नहीं टिकी।
"कबीर," मैंने कहा। "तेरे पास दुकान है। तेरे पास हिसाब है। तूने मुझे दो साल पहले यहाँ आया हुआ ट्रक बेचा। तूने मुझे उस पर दस्तख़त करवाए। तूने मुझे ये सब बताया। अब तू मुझे कह रहा है कि मैं भाग जाऊँ?"
वो कुछ नहीं बोला।
"मैं भागता तो मैं यहाँ नहीं आता," मैंने कहा। "मैं सिमरिया में बैठा रहता। मेरे पास माँ थी, घर था, और एक स्कूटर का पंचर बनाने की दुकान खोल सकता था। पर मैं यहाँ आया। क्योंकि मेरे पापा की आवाज़ मेरे कान में बंद है और वो कह रही है कि उन्हें नींद नहीं आती।"
कबीर ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें थकी हुई थीं, पर उनमें कुछ और भी था। शायद शर्म।
"ठीक है," उसने कहा। "पर एक बात मान ले। आज दस बजे वहाँ अकेला मत जा।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो आदमी दस बजे बुलाता है वो इंतज़ार नहीं करता। वो दस बजे से पहले सब तैयार कर लेता है।"
मैंने सिर हिलाया।
वो अंदर जाने लगा। फिर रुका।
"अर्जुन।"
"हाँ।"
"तेरे पापा ने कभी तुझे ठाकुर ट्रांसपोर्ट के बारे में कुछ बताया था?"
मैंने सोचा। फिर धीरे से बोला, "नहीं। कभी नहीं।"
"तो फिर तू उस पीले ट्रक पर रघुवीर लिखकर क्या करने वाला है?"
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर मैं लिखूँगा।"
वो अंदर चला गया। दरवाज़ा बंद किया, पर इस बार कुंडी नहीं लगाई।
मैं ट्रक के पास गया। उसके बोनट पर हाथ रखा। लोहा थोड़ा गरम था, मेरी ही रात भर की मेहनत से।
फिर मेरी जेब में मोबाइल बजा। बहुत तेज़। मैंने निकाला। स्क्रीन पर नाम नहीं था, सिर्फ़ एक नंबर था।
मैंने उठाया।
"अर्जुन?" आवाज़ एक औरत की थी। पहले मैंने सोचा शायद माँ है, पर माँ इतनी धीमी नहीं बोलती। माँ की आवाज़ में डाँट होती है।
"हाँ, कौन?"
"तुम कबीर की दुकान पर हो न?"
मैंने चारों तरफ़ देखा। बाज़ार सुनसान था। ट्रकों की कतार खड़ी थी, कोई आदमी नहीं।
"तुम कौन हो?" मैंने फिर पूछा।
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