A Dark Secret – Chapter 27
कबीर ने मुझे वहीं पाया — ट्रक के पहिये से टिका हुआ, हाथ में कटोरी, सिर झुका हुआ।
"चाय खत्म?" उसने पूछा।
"कटोरा भी खत्म।"
"कटोरा नहीं बिकता।"
"तो फिर कटोरा भी नहीं जाएगा।"
उसने मेरा हाथ देखा। उस पर खून सूख रहा था और तेल जमा था।
"तेरा हाथ खराब लग रहा है।"
"तेरे हिसाब में चार सौ पहले से ही कट चुके हैं। अब ये हाथ भी कटेंगे तो तू मुझे क्या करेगा?"
वो हँसा। मैं भी हँसा। घुटनों में दर्द था और उसकी हँसी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, फिर भी मैं हँसा।
"कबीर," मैंने कहा। "तेरे आँकड़ों में एक गलती है।"
"कौन सी?"
"तूने एक बार कहा था कि ये ट्रक बर्बाद है। ये बर्बाद नहीं है। इसमें बैठकर सोया भी जा सकता है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर ट्रक के अंदर। ड्राइवर की सीट। पुरानी, फटी, फिर भी वहीं।
वो कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "आज तक किसी ने मुझे ऐसा हिसाब नहीं दिया।"
"क्या हिसाब?"
"तेरे पास कुछ नहीं था। फिर भी तूने वो कुछ मांगा और कुछ दिया। और अब भी तेरे पास वही है जो कल था। मगर तेरे हाथ में एक गाड़ी है।"
"आधी गाड़ी," मैंने कहा।
"क्या?"
"तेरा रजिस्टर। आधी गाड़ी मेरी।"
वो मुझे देखता रहा। फिर वो अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला। मोड़ा हुआ, धूल से भरा, फटा हुआ। उसने मेरे सामने उसे खोलकर रख दिया।
"फिर दस्तख़त कर," उसने कहा। "आधा ट्रक तेरा, आधा मेरा।"
मैंने उस काग़ज़ को देखा। ऊपर उसने अपने हाथ से कुछ लिखा था। "बाकी चौदह सौ मज़दूरी से।" और नीचे जगह थी हस्ताक्षर के लिए।
मैंने उसका पेन उठाया।
फिर मैं रुक गया।
काग़ज़ के नीचे, उसी काग़ज़ पर, वो लिखा नहीं था। वो छपा हुआ था। उसका हिस्सा नहीं था। वो काग़ज़ के नीचे था। जैसे ये काग़ज़ पुराने किसी काग़ज़ के ऊपर बना हो, किसी पुराने काग़ज़ का हिस्सा हो।
बहुत पुरानी स्याही में एक नाम लिखा था। और वो नाम मिटाया गया था। किसी ने रबर से मिटाया था, या अँगूठे से पोंछा था। पर मिटाया हुआ भी वो नाम पढ़ा जा सकता था। कच्ची बात है, जिसे मिटाने की कोशिश में और साफ़ कर दिया गया हो।
मेरा हाथ रुक गया।
काग़ज़ रखते हुए मेरे हाथ नीचे की तरफ़ उभरे हुए अक्षरों के लकीरों को देख रहेमैंने कटोरा ट्रक के बंपर पर रख दिया और कबीर की बंद दुकान की तरफ़ देखा।
रोशनी अंदर जल रही थी। दरवाज़ा बंद था, पर नीचे की दरार से पीली लकीर बाहर आ रही थी। वो अंदर था। जाग रहा था। और मुझसे बात नहीं कर रहा था।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ में तेल लगा था और हथेली के किनारे की चोट से अब भी खून के पतले धागे निकल रहे थे।
मैंने अपने आप से कहा — ठीक है, अर्जुन। अब तेरे पास जो कुछ है, उसे गिन ले।
एक पीला ट्रक, जो चल रहा है। आधा मेरा, आधा उसका। एक हफ़्ते में दो हज़ार चार सौ का हिसाब, और आधी क़ीमत मज़दूरी में जुड़ी हुई।
काग़ज़ पर एक मिटाया हुआ नाम, जिसे मैं पढ़ नहीं पाया।
कबीर की ज़ुबान से फिसला हुआ वो नाम — राठौर।
और वो एक वाक्य, जो उसने बंद दरवाज़े से पहले कहा था।
तेरे पापा उसके रजिस्टर थे।
मैंने अपना हाथ ट्रक के बोनट पर रखा। लोहा अब भी ठंडा था, और मेरी हथेली से उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था। मैंने आँख बंद की।
रजिस्टर।
इससे पहले मैंने ये शब्द दो जगह सुना था।
एक — चाचा रामलाल के बारे में, जिसके औज़ारों की खनक अभी भी मेरे कान में बज रही थी। गायब होने की रात उसके सामान में एक कटा तार था, एक तेल में डूबा रुमाल था, और एक कमीज़ जो उसने पहननी थी और नहीं पहनी।
दो — महेंद्र चाचा ने कल सुबह अपनी ही ज़ुबान से उस रात का ज़िक्र करते हुए कहा था कि पापा जब घर से निकले थे, तब उनके पास एक रजिस्टर था। और उन्होंने चाचा से कहा था — मिले तो जला देना।
और चाचा ने न ढूँढा, न जलाया।
मैंने आँखें खोलीं।
मेरा एक ही सवाल था, और वो इतना बड़ा था कि मेरी छाती में जगह नहीं बची थी — क्या वो रजिस्टर पापा के पास था, क्योंकि पापा खुद रजिस्टर थे?
और क्या वो रजिस्टर अब भी कहीं है?
मैंने अपनी कलाई देखी। पापा की घड़ी। पाँच मिनट आगे। सुबह के चार बजकर बीस मिनट। मतलब असली वक़्त चार बजकर पंद्रह।
"पापा," मैंने होंठों ही होंठों में कहा। "तूने मुझे कभी नहीं बताया कि तू किसी का रजिस्टर था। तूने मुझे बस ये बताया था कि गाड़ी को जल्दी मत माँगो, पहले उसकी साँस सुनो।"
और अब मुझे लगा कि ये बात सिर्फ़ ट्रक के लिए नहीं थी।
मैं ट्रक के पास ही बैठ गया, ज़मीन पर। पसीना सूख रहा था और ठंडी हवा मेरी गर्दन पर लग रही थी।
तभी मेरे कान में एक आवाज़ आई।
बहुत धीमी। किसी दरवाज़े के पीछे से।
कबीर अंदर से बोल रहा था।
मैं उठकर दरवाज़े के पास गया। मैंने कान नहीं लगाया। मैंने बस खड़े-खड़े सुना।
उसकी आवाज़ किसी से बात नहीं कर रही थी। वो खुद से बोल रहा था।
"नहीं। ये नहीं। ये आगे नहीं जाएगा।"
मैं सुनता रहा।
"उसने सुना। उसने मेरी आवाज़ सुनी और उसने वो नाम पकड़ लिया। मैंने कह दिया। मैंने कह दिया। दो साल से नहीं कहा था, और आज कह दिया।"
फिर काग़ज़ खिसकने की आवाज़ आई।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
"कबीर।"
अंदर अचानक चुप्पी।
"कबीर, मैं जानता हूँ तू जाग रहा है। दरवाज़ा खोल।"
कुछ देर तक कुछ नहीं हुआ। फिर कुंडी खुलने की आवाज़ आई और दरवाज़ा आधा खुला।
कबीर सामने खड़ा था। उसने चश्मा पहन रखा था। उसके हाथ में एक माचिस की डिब्बी थी।
मैंने उसके पीछे देखा। दुकान के अंदर, छोटे स्टोव के पास, एक काग़ज़ रखा था। मुड़ा हुआ। वही काग़ज़। जिस पर मैंने दस्तख़त किए थे।
"तू इसे जलाने वाला था," मैंने कहा।
वो कुछ नहीं बोला।
"कबीर।"
"हाँ," उसने कहा। "जलाने वाला था।"
"क्यों?"
"क्योंकि अब इसमें तेरा नाम है," उसने कहा। "और जिस काग़ज़ पर तेरा नाम आ जाए, वो काग़ज़ उस शहर में रहता नहीं।"
हम दोनों दरवाज़े के बीच खड़े रहे। बाहर अब भी अंधेरा था, पर पूरब में आसमान का रंग बदल रहा था। मुझे कुछ नीला-सा दिखा, जैसे कोई धोबी नीला कपड़ा आसमान पर बिछा रहा हो।
"माचिस रख," मैंने कहा। "काग़ज़ नहीं जलेगा।"
"अर्जुन, तू नहीं समझता…"
"मैं समझता हूँ," मैंने कहा। "तू डरा हुआ है। डरना तेरा हक़ है। पर मेरा काग़ज़ तू नहीं जलाएगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने माचिस वापस जेब में डाल दी।
"चाय पीएगा?" उसने पूछा।
"अभी पी है।"
"फिर भी पी ले। मैंने दूसरी बना दी है। तेरी वाली ठंडी हो गई थी।"
वो अंदर गया और दो कटोरे लेकर आया। हम बाहर, ट्रक के सामने, ज़मीन पर एक पुरानी रस्सी की गड्डी पर बैठ गए। रस्सी से तेल की बदबू आ रही थी। कबीर ने कटोरा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"सुन," उसने कहा। "मैं तुझे कुछ बताता हूँ, फिर चाहे तू मुझे बुज़दिल कह दे, चाहे कायर।"
"बोल।"
"जिस दिन मैंने ये दुकान ली, उस दिन मुझे यहाँ के पुराने मालिक ने कहा था — काग़ज़ों की अलमारी मत छूना। उसमें क्या है, मत पूछना। मैंने पूछा कि क्यों। तो वो बोला — क्योंकि उन काग़ज़ों पर जिनके नाम हैं, वो सब यहाँ से चले गए हैं।"
"तो तूने अलमारी नहीं छुई?"
"छुई।" उसने चाय पी। "पहले महीने में छुई। वो मेरी गलती थी। मुझे अंदर जो कुछ मिला, वो समझ में नहीं आया, पर इतना समझ आ गया कि इन काग़ज़ों पर लिखे लोग अब इस शहर में नहीं हैं। और जो हैं, वो ज़िंदा नहीं हैं।"
"और तूने किसी को बताया?"
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