A Dark Secret – Chapter 289
मेरे सामने एक आदमी खड़ा था जिसने मेरे साथ आठ महीने बिताए और हर हफ़्ते मुझे बेचा था। और फिर यही आदमी आज अपने पिता के ख़िलाफ़ खड़ा था।
मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसका कैमरा नीचे था। उसकी आँखें गीली थीं।
"नैना," मैंने धीरे से कहा, "कैमरा नीचे क्यों?"
"अर्जुन," उसने कहा, "इस लम्हे में मुझे लगा कि ये खबर नहीं है।"
मैं चुप रहा।
"पर तुम लोगो को ये चाहिए," मैंने कहा।
"हाँ," उसने कहा और उसने अपना चश्मा ऊपर धकेला। "इसीलिए मैं इसे फिर से ऊपर कर रही हूँ।"
मजिस्ट्रेट ने कबीर से कहा — "आप कटघरे में बैठ सकते हैं।"
कबीर बैठ गया। उसने अपनी बही अपनी गोद में रखी।
और फिर मजिस्ट्रेट ने देवेंद्र ठाकुर की तरफ़ देखा।
"ठाकुर साहब," उन्होंने कहा, "आपका बयान इस अदालत ने सुना है। आपके बेटे ने आज जो कहा, उस पर आप कुछ कहना चाहेंगे?"
देवा भाई उठे।
वो धीरे उठे। उनकी शर्ट पर पहले जैसी इस्त्री नहीं थी। उनके बाल बिखरे हुए थे। और उन्होंने एक बार भी अपना चश्मा नहीं पहना।
वो खड़े हुए और उन्होंने कबीर की तरफ़ देखा।
कबीर ने उनकी तरफ़ नहीं देखा।
देवा भाई ने एक पल के लिए अपना हाथ कटघरे की तरफ़ बढ़ाया — जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने बेटे को छूने के लिए हाथ बढ़ाता है। फिर उन्होंने हाथ वापस कर लिया।
उनकी आँखें गीली थीं।
मैंने ये पहली बार देखा।
ekyावन साल का आदमी, जिसने हर किसी को "बेटा" कहा था, जिसने कभी अपनी आवाज़ नहीं बढ़ाई थी, जिसने हर नाके पर अपना आदमी रखा था — वो आज बिना चश्मा के खड़ा था और उसकी आँखें गीली थीं।
और उसके होंठ हिले। पर आवाज़ नहीं आई।
उसने फिर होंठ हिलाए। मैंने पढ़ लिया।
"मेरा बेटा।"
फिर उसने अपना गला साफ़ किया और बोला — और वो पहली बार था जब उसकी आवाज़ में मिठास नहीं थी। गला बैठा हुआ था। जैसे कोई बहुत देर तक रोया हो और फिर बोले।
"सर," उसने कहा, "मेरा बेटा मेरे ख़िलाफ़ सच बोल रहा है।"
कमरे में कोई हिला नहीं।
"और अब मैं भी पूरा सच बोलूँगा।"
मजिस्ट्रेट ने उन्हें देखा। "आप गवाही देना चाहते हैं?"
"हाँ, सर।"
"आप अपने ख़िलाफ़ गवाही देना चाहते हैं?"
"मैं सच्चाई की तरफ़ गवाही देना चाहता हूँ, सर," देवा ने कहा। "और आज मेरा बेटा यहाँ बैठा है। अगर मैं आज भी चुप रहा, तो मैं उसके सामने कभी नज़र नहीं उठा पाऊँगा।"
उन्होंने कबीर की तरफ़ देखा।
"और मैं उसका पिता हूँ।"
कबीर ने इस बार उनकी तरफ़ देखा।
बहुत देर तक देखा।
फिर उसने अपना सिर नीचे कर लिया।
मैंने देखा — कबीर के हाथ उसकी बही पर कसकर जमे थे। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।
और मैंने ये भी देखा कि देवा के हाथ काँप रहे थे।
वो बैठ गए।
मजिस्ट्रेट ने अपनी घंटी उठाई और एक बार बजाई।
"अदालत," उन्होंने कहा, "देवेंद्र ठाकुर का बयान दर्ज करेगी। सुनवाई अब दोपहर दो बजे तक के लिए स्थगित की जाती है।"
फिर उन्होंने कबीर की तरफ़ देखा।
"और युवक — आप अपनी बही इस अदालत को सौंप दें।"
कबीर ने अपनी बही उठाई और उसे मेज़ तक ले गया।
उसने उसे मेज़ पर रखा।
और जब वो लौटकर आया, तो उसने मेरे बगल से गुज़रते हुए मेरी तरफ़ देखा।
उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी। कोई माफ़ी नहीं थी। सिर्फ़ एक चीज़ थी।
डर।
वो डर जो सच बोलने के बाद आता है।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ अपना हाथ बढ़ाया।
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया।
हमारी उँगलियाँ एक पल के लिए मिलीं।
कुछ नहीं। कोई हाथ मिलाना नहीं। कोई गले लगना नहीं। बस मेरी कलाई पर पापा की घड़ी थी, और उसकी कलाई पर कुछ नहीं था।
"कबीर," मैंने कहा, "तूने आज एक काम किया है।"
उसने सिर हिलाया।
"मुझे पता है," उसने कहा।
"पर एक काम अभी बाक़ी है।"
वो रुका।
"अपनी माँ को लेकर आ। अदालत के सामने। वो अब भी किसी और के नाम से ज़िंदा है।"
कबीर ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो डरेगी," उसने कहा।
"मुझे पता है," मैंने कहा। "मेरी अम्मा भी डरी थी। दस साल डरी रही। और आज वो सिमरिया में बैठी है और मुझे फोन करके कहती है कि डिब्बा मत खोलना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"पर वो डरती है, कबीर। डरना बंद नहीं करती। और यही सबसे बड़ी बात है।"
कबीर ने कुछ नहीं कहा। वो बस मुड़ा और चला गया।
पर चलते-चलते उसने मेरी तरफ़ देखा — एक बार।
और उस एक बार में उसने अपना सिर हिलाया।
मैं अदालत के बाहर आया तो सूरज सिर पर था।
बाहर भीड़ पहले से दुगनी हो गई थी। तीन सौ से ज़्यादा लोग। जुगनू उन सबके बीच खड़ा था, अपने कार्टन का टुकड़ा सीने से लगाए हुए।
"भाई!" वो मेरी तरफ़ दौड़ा। "क्या हुआ अंदर? मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया। दरवाज़ा बंद था।"
"बहुत कुछ हुआ, जुगनू," मैंने कहा। "बहुत कुछ।"
"क्या हुआ?"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"एक बेटा अपने पापा के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ," मैंने कहा। "और एक पापा ने अपने बेटे के सामने सच बोला।"
जुगनू ने पलक झपकाई।
"कबीर भाई?"
"हाँ।"
वो एक पल चुप रहा। फिर उसने कहा — "तो अब वो हमारे साथ है?"
मैंने सोचा। सच में सोचा।
"नहीं, जुगनू," मैंने कहा। "वो अभी अपने साथ है। और यही सबसे ज़रूरी है।"
दोपहर दो बजे जब सुनवाई शुरू हुई, तो कमरे में एक नई औरत थी।
सफ़ेद साड़ी। चेहरे पर बहुत शांति। आँखों में बहुत थकान।
वो बैठी थीं — आख़िरी बेंच पर, कबीर के बगल में। उनका हाथ कबीर के हाथ में था।
और कबीर ने जब मेरी तरफ़ देखा, तो उसने सिर्फ़ इतना कहा — "मेरी माँ।"
मैंने सिर हिलाया।
और मैंने अपनी जेब से तेल में डूबा रुमाल निकाला और अपनी उँगलियाँ फिर साफ़ कीं।
क्योंकि अब जो आने वाला था, वो आसान नहीं था।
पर पापा, एक बात तय थी।
आज मैं अकेला नहीं था।
॥
दो बजे मजिस्ट्रेट का कमरा फिर भर गया।
मैं पहली बेंच पर बैठा था। मेरे बगल में नैना थी, उसका पुराना काला कैमरा गोद में रखा था और उसकी उँगली बार-बार चश्मे को ऊपर धकेल रही थी। रुक्मा दीदी मेरे पीछे बैठी थीं। उनकी कलाई पर चाबियों का गुच्छा आज भी था, पर आज वो गुच्छा बज नहीं रहा था। वो चुप था। पूरा कमरा चुप था।
ऊपर के तीन पंखों में से एक ढीली बेल्ट वाला था। वो हर चक्कर पर हल्की चीख मारता था। मैंने सुना। मैंने वो चीख इस पूरे कमरे में सबसे ज़्यादा साफ़ सुनी, क्योंकि बाक़ी सब चुप था।
आख़िरी बेंच पर सफ़ेद साड़ी में एक औरत बैठी थी। उनका हाथ कबीर के हाथ में था। उन्होंने कमरे में आते वक़्त किसी को नहीं देखा। सिर्फ़ मेज़ की तरफ़ देखा, फिर अपने बेटे की तरफ़, फिर अपनी गोद में रखे हाथों की तरफ़।
वो शांति देवी थीं।
मजिस्ट्रेट आए। सब खड़े हुए। फिर बैठे।
मजिस्ट्रेट ने अपना चश्मा उतारा, पोंछा और फिर पहना। मेज़ पर मिट्टी का पानी का गिलास रखा था, और उसके बगल में पीतल की छोटी घंटी। उन्होंने काग़ज़ उठाया।
"अदालत," उन्होंने कहा, "आज देवेंद्र ठाकुर का पूरा बयान सुनेगी। और मैं साफ़ कह देना चाहता हूँ कि यह अदालत आज किसी की मीठी आवाज़ नहीं सुनेगी। सिर्फ़ तारीख़, नाम और काग़ज़ सुनेगी।"
देवा खड़े हुए।
उनका सफ़ेद कुर्ता अब साफ़ नहीं था। कॉलर पर पसीने की लकीरें थीं और कलाई पर सोने की अंगूठी भी अब उतर चुकी थी। उन्होंने एक बार कबीर की तरफ़ देखा। फिर आँखें नीची कर लीं।
"मेरा नाम देवेंद्र ठाकुर है," उन्होंने कहा। "ठाकुर ट्रांसपोर्ट मेरा है। ग्यारह साल से है।"
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