A Dark Secret – Chapter 287
अदालत के बाहर जाते वक़्त जुगनू ने मेरा हाथ पकड़ा। उसके पास वो कार्टन का टुकड़ा था, जिस पर एक सौ अड़तालीस नाम लिखे थे।
"भाई," उसने कहा, "उस सफ़ेद शर्ट वाले आदमी ने अभी बाहर जाकर एक काले फ़ोन से बात की।"
"क्या कहा?"
"मैं सुन नहीं पाया," जुगनू ने कहा, "पर उसने सिर्फ़ एक बार इतना कहा — बात बढ़ गई है, साहब।"
"साहब?"
"हाँ भाई," जुगनू ने कहा। "उसने 'साहब' कहा।"
और मैंने उस रोशनी में, उस भीड़ में, उन ड्राइवरों के बीच खड़े होकर अचानक ठंड महसूस की।
क्योंकि अगर साफ़-सुथरा आदमी भी किसी को "साहब" कहता है, तो फिर "साहब" कौन है?
मैंने अपनी जेब से रुमाल निकाला — वो तेल में डूबा रुमाल, जो पापा का था — और अपनी उँगलियाँ साफ़ कीं।
कल सुबह नौ बजे। अलमारी। और एक चाबी जो अब मेरे पास थी — पर उसका ताला किसी और के पास था।
॥
उस रात मैं सोया नहीं।
ढाबे के पीछे बेंच पर लेटा था, तिरपाल ऊपर टँगा था, और हवा में मिट्टी की गंध थी। रुक्मा दीदी ने मेरे पास एक मिट्टी का कटोरा रखा था — चाय नहीं, सिर्फ़ गरम पानी, क्योंकि उन्होंने कहा था कि आज रात नींद ज़रूरी है और चाय सोने नहीं देगी।
पर नींद आई नहीं।
मैं उठकर बैठ गया और अपनी कलाई को देखा। पापा की घड़ी। पाँच मिनट आगे। हमेशा पाँच मिनट आगे।
"पापा," मैंने मन में कहा, "कल सुबह नौ बजे अलमारी खुलेगी। आप बता दो ना, उसके अंदर क्या है।"
घड़ी चलती रही। कोई जवाब नहीं।
तड़के चार बजे जुगनू आया। वो नंगे पाँव, सुबह की ठंड में भी बिना जूतों के, और उसने मेरी चादर खींच दी।
"भाई, उठो। सफ़ेद शर्ट वाला आदमी अदालत के बाहर गाड़ी में बैठा है। दो घंटे से।"
मैं बैठ गया। "अकेला?"
"अकेला नहीं। उसके साथ काले बैग वाला कोई और है। दोनों बात कर रहे थे। मैंने सुना नहीं, पर उस आदमी ने एक बार हाथ ऐसे किया —"
जुगनू ने हवा में उँगली घुमाई।
"जैसे कोई चाबी घुमाता है।"
मैंने रुमाल से अपने हाथ पोंछे। वो तेल वाला रुमाल, जो पापा का था और जिसकी गंध आज भी वैसी ही थी।
"जुगनू," मैंने कहा, "तू अभी जाकर रुक्मा दीदी को बता कि आज किसी को भी अदालत के अंदर जाने से पहले मेरा इशारा चाहिए। और नैना को बता कि कैमरा पूरी तरह चार्ज कर ले।"
"ठीक है भाई," वो मुड़ा, फिर रुका। "और कबीर भाई?"
मैं एक पल चुप रहा।
"कबीर का दरवाज़ा खटखटाना मत," मैंने कहा। "वो अपने आप आएगा।"
सुबह नौ बजे से पहले अदालत का कमरा भर चुका था।
आज पंखे भी धीमे लग रहे थे। या फिर मेरे कान ही धीमे हो गए थे। मुझे एक अजीब सी बात महसूस हुई — कमरे में इतने लोग थे, इतनी साँसें, इतनी खाँसियाँ, और फिर भी मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। सिर्फ़ एक आवाज़ साफ़ थी। दीवार पर टँगी घड़ी की। टिक। टिक। टिक।
नैना मेरे बगल में बैठी थी। उसका कैमरा गोद में था और वो बार-बार अपना चश्मा ऊपर धकेल रही थी।
"अर्जुन," उसने धीरे से कहा, "तुम ठीक हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर ये अच्छी बात है। अगर मैं ठीक होता, तो मैं यहाँ नहीं होता।"
उसने मुझे देखा और हल्का सा मुस्कुरा दी।
रुक्मा दीदी पीछे बैठी थीं। उनके हाथ में वो खुला पीला लिफ़ाफ़ा था, जो ग्यारह साल से कड़ाही के पीछे पड़ा था। आज वो उसे सीने से लगाए बैठी थीं, जैसे कोई औरत अपने मरे हुए आदमी की आख़िरी चिट्ठी लिए बैठी हो।
अमरीक सिंह कोने में बैठे थे। उनके साथ उनका बेटा टिंकू था — दुबला, पीला, टीवी देखते-देखते सो गया हो जैसे। अमरीक ने मुझे देखा और सिर हिलाया। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी — शर्म।
बल्लू सबसे आगे बैठा था, पान का कटोरा हाथ में। उसने मुझे देखते ही पान थूक दिया और कहा — "आज कुछ बड़ा होने वाला है, भाई। मेरी हड्डियाँ कह रही हैं।"
"आपकी हड्डियाँ हमेशा कहती हैं, बल्लू भाई," मैंने कहा। "पर आज मुझे भी लग रहा है कि वो सही कह रही हैं।"
मजिस्ट्रेट नौ बजकर चार मिनट पर आए। उनके हाथ में वो पीतल की छोटी घंटी थी, और उन्होंने बैठते ही एक बार बजाई।
"पिछली सुनवाई में," उन्होंने कहा, "इस अदालत ने आदेश दिया था कि आज सुबह अलमारी खोली जाएगी। कोर्ट मोहर्रिर, अलमारी लाओ।"
कमरे के पीछे से आवाज़ आई। दो चपरासी हरी लोहे की उस अलमारी को खींचकर लाए। मैंने उसे देखा और मेरा दिल एक पल को रुक गया।
वही अलमारी। ऊपर तीन खाने, नीचे दो दरवाज़े। जहाँ हाथ लगता था, वहाँ पुताई घिसी हुई। और ऊपर, जहाँ पीतल का बोर्ड लगा था, वहाँ चार छोटे छेद — जैसे कोई नाम उतार दिया गया हो।
वो आवाज़ जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी, मैंने आज सुनी — लोहे के पैर फ़र्श पर घिसने की। जैसे कोई बंद कमरे में आख़िरी बार साँस ले रहा हो।
मजिस्ट्रेट ने अपनी जेब से पीतल की छोटी चाबी निकाली। वो चाबी जो मैंने उन्हें दी थी, जो मंसूर अली के रुमाल से गिरी थी।
"बाहरी ताला खोलो," उन्होंने कहा।
कोर्ट मोहर्रिर ने चाबी डाली और घुमाई। ताला खुला, पर घूमा इतनी आसानी से कि जैसे कभी बंद ही न हुआ हो।
दरवाज़ा खुला।
अंदर से काग़ज़ों की बू आई। सीलन, स्याही और धूल की। मुझे वो बू पहचानी लगी। वही बू जो गाड़ी महल में कबीर की दुकान की अलमारी से आती थी।
मजिस्ट्रेट ने हुक्म दिया — "अंदर का ताला भी खोलो।"
मोहर्रिर ने हाथ डालकर टटोला और फिर उसका चेहरा बदल गया।
"सर," उसने कहा, "अंदर दूसरी परत है। दूसरा ताला। ये चाबी इसमें नहीं जाती।"
कमरे में एक आवाज़ उठी, फिर चुप्पी।
मैं खड़ा हुआ।
"सर," मैंने कहा, "मेरे पास एक चाबी है।"
मजिस्ट्रेट ने मेरी तरफ़ देखा।
"कहाँ से आई?"
"कल भीड़ से एक आदमी का रुमाल गिरा था। उसमें बँधी थी। ये वही चाबी है जिसकी बात अमरीक सिंह ने कही थी — अंदर के असली ताले की।"
मजिस्ट्रेट ने एक पल सोचा। फिर उन्होंने हाथ बढ़ाया।
मैंने चाबी उनकी हथेली पर रख दी।
वो छोटी थी। छोटी उँगली के जोड़ जितनी। दाँते घिसे हुए। सिरे पर धुँधला अंक।
मोहर्रिर ने चाबी अंदर डाली।
और ताला खुला।
अलमारी के अंदर से जो पहली चीज़ निकली, वो एक सिली हुई बही थी।
मजिस्ट्रेट ने उसे खोला। उसमें सिर्फ़ तीन कॉलम थे — नंबर, तारीख़, रकम। कोई नाम नहीं। कोई गाड़ी नंबर नहीं। सिर्फ़ नंबर, तारीख़ और रकम। और आख़िरी पन्ने पर एक लाइन — "जमा, मुनीम जी।"
"इसमें सताईस की एक सौ इकतालीस तारीख़ें हैं," मजिस्ट्रेट ने कहा। उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो तेज़ था। "और हर पंक्ति में रकम अलग। कुल मिलाकर —"
उन्होंने हिसाब लगाया, फिर उन्होंने अपना चश्मा उतार दिया।
"आठ करोड़ से ऊपर।"
कमरे में साँस लेने की आवाज़ आई। किसी ने कुछ कहा, पर समझ नहीं आया।
अलमारी से आगे निकला — खाली लिफ़ाफ़ों का बंडल। मजिस्ट्रेट ने एक उठाया और पलटकर देखा। कोई नाम नहीं, कोई पता नहीं। सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा। सौ से ज़्यादा।
फिर निकली इकतालीस बीमा दावों की फोटोकॉपी। नीले काग़ज़। हर काग़ज़ पर एक तारीख़। और हर तारीख़ — सताईस सितंबर।
मजिस्ट्रेट ने एक काग़ज़ उठाया और पढ़ा।
"राठौर लॉजिस्टिक्स," उन्होंने कहा। "नुक़सान की रकम चार लाख उन्नीस हज़ार।"
मेरे कान में ये आवाज़ आई जैसे कोई लोहे की प्लेट पर हथौड़ा मार रहा हो।
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